ऐसे आयोजनों से नहीं मिलेगी यमुना को सद्गति

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    • Author, सोपान जोशी
    • पदनाम, पर्यावरण विश्लेषक

आर्ट ऑफ़ लिविंग ने यमुना तट पर एक विश्व सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित करने का फ़ैसला लिया है.

दिल्ली में यमुना का जो हाल है, वह सबको पता है. लेकिन इस आयोजन को लेकर आर्ट ऑफ़ लिविंग के बयान चिंता पैदा करते हैं. एक तरफ वे कहते हैं कि नदी पहले से ही दूषित है और उसके उगने वाली सब्जियां भी दूषित होती हैं. दूसरी तरफ उन्होंने यमुना की पवित्रता की बात भी कही है.

यह आयोजन वहां करा रहे हैं तो वे एक भाव जताना चाहते हैं. लेकिन इसमें विरोधाभाष दिखता है. यदि आप नदी की पवित्रता की बात करते हैं, तो प्रदूषण की आंख से नहीं देखेंगे. और यदि आप प्रदूषण की बात करते हैं तो उसमें पवित्रता कहां से दिखेगी.

श्री श्री रविशंकर

अगर आप दोनों देख लेते हैं तो फिर उस नदी के किनारे को गिनीज़ बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स की जगह तो नहीं ही बनाएंगे. इसका दावा किया जा रहा है, पता नहीं आर्ट ऑफ़ लिविंग ने ऐसा कहा भी है या नहीं. वैसे इस बात के साथ ना तो कोई सामाजिकता जुड़ी हुई है और न ही नदी के बारे में कोई बात.

इससे अहम बात ये भी है कि आर्ट ऑफ़ लिविंग बेंगलुरू की संस्था है, श्री श्री रविशंकर भी वहीं के हैं. किसी जमाने में यह शहर तालाबों का शहर हुआ करता था. पर आज इस शहर के सारे तालाब चौपट हो चुके हैं. या तो तालाब बचे नहीं या उनमें गंदगी भरी हुई है.

यदि श्री श्री रविशंकर जल प्रदूषण के प्रति लोगों को जागरूक बनाना चाहते हैं तो पहले अपने शहर से शुरू करें. पहले अच्छा काम अपने घर में ही किया जाता है. अपने तालाब अपने जल स्रोतों को दुरुस्त करना आसान है किसी और शहर के किसी नदी को ठीक करने के.

यदि यह मान भी लें कि उनका उद्येश्य इतना बड़ा है तो क्या किसी बड़ी नदी को साफ़ करने के पहले किसी छोटे तालाब को साफ़ करने का अनुभव नहीं हासिल करना चाहिए.

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हालांकि ये स्थिति क्यों पैदा हुई, यह सवाल भी उतना ही अहम है. यमुना के तट पर कई भवन बन चुके हैं. एशियाड गेम्स विलेज़ बन चुकी है. ये आयोजन हो सकता है क्योंकि ये सब हो चुका है. आप पहले नदी का पानी निकाल रहे हैं, फिर उसी ज़मीन को जायदाद में बदल दिया जा रहा है. जो बिक सकती है, बड़े बड़े स्टेडियम बना सकते हैं, बड़े मंदिर बना सकते हैं.

इसमें भव्यता हो सकती है, दिव्यता नहीं. अगर इसमें दिव्यता होती, तो उस नदी की बात पहले करता जो शायद हमारी सभ्यता से भी पुरानी है.

मेरे ख्याल से जो भी नदी की सद्गति चाहता है, वो नदी के नाम पर ऐसी बातचीत नहीं होने देगा.

(बीबीसी संवाददाता प्रदीप कुमार से बातचीत पर आधारित)

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