आम आदमी पार्टी की 5 अहम चुनौतियां

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    • Author, उर्मिलेश
    • पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिन्दी डॉटकॉम के लिए

अपने सांगठनिक जीवन के तीन साल पूरे कर लेने के बावजूद आम आदमी पार्टी (आप) ने अभी तक अपना ठोस और सुस्पष्ट राजनीतिक-आर्थिक नीति आधारित सांगठनिक कार्यक्रम घोषित नहीं किया है. यह उसकी सबसे बड़ी राजनीतिक समस्या और चुनौती है.

उसकी राजनीतिक-सांगठनिक छवि अभी तक ले-देकर एक ऐसे ख़ास संगठन की है, जो समाज से भ्रष्टाचार उन्मूलन चाहता है. राजधानी-राज्य दिल्ली में उसकी सरकार है लेकिन यहां भी उसका ज़्यादा ध्यान अभी तक सिर्फ़ स्थानीय मुद्दों और भ्रष्टाचार के पर्दाफ़ाश या उन्मूलन के क़दम पर है.

यह सब मुद्दे बहुत ज़रूरी हैं. पर एक राजनीतिक पार्टी के तौर पर उसके सामने इनके अलावा भी बहुत सारे मुद्दे और सवाल हैं, जिन्हें वह नज़रंदाज़ नहीं कर सकती. हमने अभी तक ‘आप’ को भारत-पाकिस्तान रिश्तों, न्यूक्लियर मामले, आर्थिक सुधार के अगले क़दमों, स्वास्थ्य और शिक्षा क्षेत्र के अंधाधुंध निजीकरण या दलित-आदिवासी मुद्दे पर अपना विचार प्रकट करते नहीं सुना.

उनकी वेबसाइट पर कुछ बातें ज़रूर कही गईं हैं पर उनसे किसी सुसंगत सोच या विचार का संकेत नहीं मिलता, जो एक राजनीतिक पार्टी के लिये बेहद ज़रूरी है.

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कौन नहीं जानता कि ‘आप’ के शीर्ष नेतृत्व की राष्ट्रीय-राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं भी हैं, वह अपने को सिर्फ़ दिल्ली तक सीमित नहीं रखना चाहते. ऐसे में इस नए राजनीतिक दल से ठोस नीतिगत कार्यक्रम और राष्ट्रीय महत्व के मसलों पर सुस्पष्ट सोच की उम्मीद करना लाज़िमी है.

इसलिए मेरा मानना है कि वर्ष 2016 में ‘आप’ के समक्ष सबसे बड़ी राजनीतिक-वैचारिक चुनौती है - अपने सांगठनिक दायरे को विस्तार देते हुए एक अलग राजनीतिक पार्टी का कार्यक्रम पेश करना. ‘आप’ के पास लोकसभा में चार सदस्य हैं.

इस नाते भी उसे राष्ट्रीय-अंतरदेशीय महत्व के मसलों पर अपनी साफ़ राय बनानी होगी. कुछ ही महीनों बाद 2017 के शुरू में पंजाब में चुनाव होने हैं, जहां वह बड़ी ताक़त के साथ मैदान में उतर रही है.

दिल्ली से बाहर किसी राज्य में विधानसभा चुनाव पूरे दमख़म के साथ लड़ने का यह पहला मौक़ा होगा. स्वयं कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष कैप्टेन अमरिन्दर सिंह भी कह चुके हैं कि पंजाब में उनकी लड़ाई सिर्फ़ ‘आप’ से है, अकालियों-भाजपाइयों से नहीं.

ऐसी स्थिति में उसे न केवल ड्रग के फैलते विषैले व्यापार अपितु कृषि नीति, धर्म और राजनीति के घालमेल, सांप्रदायिकता, सरहदी सूबों की समस्या और भारत-पाक रिश्तों की दिशा पर भी अपनी ठोस राय जनता के सामने लानी होगी.

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दूसरी महत्वपूर्ण बात है - भारत में राजनीतिक सुधार की. भ्रष्टाचार सिर्फ़ आचार का सवाल नहीं कि किसी एक लोकपाल से रफ़्फ़ूचक्कर होगा. इसके लिये राजनीतिक सुधार की ज़रूरत और उसकी बुनियादी शर्त है - चुनाव सुधार. क्या ‘आप’ 2016 में इसे मुद्दा बनाएगी? उसने शुरूआती दौर में अपने वक्तव्यों, रैलियों और वेबसाइट्स में चुनाव सुधार पर कुछ टिप्पणियां की थीं.

पर बीते तीन सालों के दौरान उसने चुनाव सुधार को मुद्दा बनाने की कभी गंभीर कोशिश नहीं की. मैं समझता हूं, यह सवाल देश में एक लोकपाल नियुक्त करने से भी ज़्यादा ज़रूरी है. ‘आप’ के लिये बड़ा सवाल है कि वह इस मुद्दे को कितनी संजीदगी से ले रही है?

सन 2016 में ‘आप’ के लिये एक और बड़ा सवाल है, जिसे संबोधित किए बग़ैर वह राष्ट्रीय या बहु-प्रांतीय स्तर पर एक बड़ी राजनीतिक शक्ति के रूप में नहीं उभर सकती. वह है - शहरी मध्यवर्ग और निम्न मध्यवर्ग के एजेंडे से आगे बढ़कर किसान-दलित-आदिवासी-मज़दूर और आमग़रीबों के मुद्दों को अपने राजनीतिक कार्यक्रम का हिस्सा बनाने की चुनौती.

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समावेशी विकास और सामाजिक न्याय के मुद्दे पर उसके नेताओं के बयानों और उसकी सांगठनिक वेबसाइट से पार्टी की कोई सुस्पष्ट राय नहीं उभरती. उसने छात्र-युवा संगठन तो बना लिया लेकिन अभी तक उसके पास मज़दूर या दलित-आदिवासियों के बीच काम के लिये कोई सांगठनिक मंच नहीं है.

सवाल प्राथमिकता का है. ‘आप’ ने शुरुआत दिल्ली के जंतर-मंतर से की थी, दल की स्थापना की बुनियाद तैयार करने के लिये आयोजित रैली में मध्यवर्गीय युवाओं की भारी भीड़ थी. 2016 में ‘आप’ को अगर राष्ट्रीय फलक पर आना है तो अपने मध्यवर्गीय दायरे और सीमा को तोड़ना होगा.

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चौथी बड़ी चुनौती या सवाल है -‘आप’ टकराव की राजनीति से बाहर निकलकर अच्छे गवर्नेंस और बेहतर राजनीति का दामन कब थामेगी? दिल्ली में हमने देखा कि पार्टी असंख्य मुद्दे उठाती है पर वह इन सबको आख़िरी मंज़िल तक नहीं पहुंचा पाती.

ताज़ा उदाहरण देखें, कुछ समय पहले उसने कांग्रेस की पूर्ववर्ती सरकार के भ्रष्टाचार का सवाल उठाया. पर क्या कोई ठोस कार्रवाई हो सकी? लोकपाल का ही देख लें, कहां है लोकपाल? पिछले दिनों उसने दिल्ली के पुलिस आयुक्त के कथित भ्रष्टाचार के एक मामले को उठाया, जिसमें किसी आवासीय सोसायटी में धांधलीबाज़ी की बात शामिल बताई गयी.

पर अभी तक क्या सामने आया? नया मामला है-दिल्ली क्रिकेट एसोसिएशन में ‘भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों का.’ ऐसे मामलों की संक्षिप्त सूची हमने सिर्फ़ इसलिये दी कि ‘आप’ के सांगठनिक चरित्र के इस ख़ास पहलू को सामने लाया जा सके कि वह समय-समय पर मुद्दों से खेलने में लग जाती है.

उसे उन्हें गंभीरता से संबोधित करने की ज़रूरत है. ज़रूरत है कि वह मुद्दों के बीच प्राथमिकता तय करे. अनावश्यक टकराव से बचते हुए अपने एजेंडे को अमलीजामा पहनाये. जहां सत्ता में है, वहां अच्छा शासन दें और जहां विपक्ष में है, वहां ज़्यादा रचनाशील और प्रतिरोधात्मक ताक़त बने.

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पाचवां मुद्दा है-नेतृत्व और सांगठनिक संरचना का सवाल. अभी तक पूरी पार्टी अरविन्द केजरीवाल-केंद्रित है. वह पार्टी भले बन गई हो पर उसकी सांगठनिक संरचना एक ऐसे एनजीओ जैसी है, जिसका एक सर्वशक्तिमान निदेशक है और पूरा संगठन उसके निर्देश और रहमोकरम पर चलता है.

पार्टी को एनजीओ की तरह व्यक्ति-केंद्रित बनाकर बड़े नतीजे नहीं पाये जा सकते. उसमें सामूहिकता और सामूहिक विवेक पर भरोसा बढ़ाना होगा. अगर ‘आप’ को राजधानी दिल्ली के दायरे में या इस दायरे के बाहर अपनी सुसंगत राजनीति से लोगों को लंबे समय तक प्रभावित करना है तो इन पांच प्रमुख सवालों और मुद्दों पर गंभीरता से सोचना होगा.

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