...तो होते रहेंगे पठानकोट जैसे हमले

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पठानकोट में चरमपंथियों के ख़िलाफ़ जारी अभियान के बीच जिस एक बात पर रक्षा विशेषज्ञ एक मत लग रहे हैं वो ये है कि इस पूरे ऑपरेशन में सामंजस्य की कमी दिखी.
बीबीसी संवाददाता वात्सल्य राय ने लेफ्टिनेंट जनरल (रिटायर्ड) राज काद्यान से जानना चाहा कि क्या इस चरमपंथी हमले में घायलों की संख्या कम हो सकती थी? और क्या इस ऑपरेशन को जल्दी ख़त्म किया जा सकता था?
सेवानिवृत लेफ्टिनेंट जनरल राज काद्यान का आकलन
सुरक्षाबलों को पठानकोट में ऑपरेशन ख़त्म करने की कोई जल्दी नहीं है.
ऑपरेशन को जितना जल्दी ख़त्म करने की कोशिश की जाएगी, उतनी ज़्यादा जानें जाएंगी.
आखिर वह चरमपंथी बिना नींद के कितनी देर रह सकता है? वह ज्यादा से ज्यादा 72 घंटे बिना सोए बिता सकता है, उससे ज़्यादा नहीं.

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इसके लिए ख़तरा उठाने की ज़रूरत नहीं है. अगर पूरा देश जल्दी नहीं मचा रहा होता कि इतना समय क्यों लगा रहे हैं, तो कुछ मौतों को टाला जा सकता था.
चरमपंथी हमलों की पूर्व सूचना नहीं मिला करती. यह बहुत अच्छा था कि इस बार हमारे पास यह सूचना थी. हमें बेहतर रूप से तैयार होना चाहिए था.
अंदर घुसने के लिए उन्होंने तार के बाड़ काटे. हालांकि सवाल यह है कि वहां इलेक्ट्रॉनिक सर्विलांस क्यों नहीं था? इस पूरे ऑपरेशन में कहां ग़लती हुई इसका विश्लेषण तो उसके ख़त्म होने के बाद ही किया जाएगा. लेकिन यहां एक बात तो तय है कि हमारे पास पहले से सूचना थी, हमें तैयार रहना चाहिए था.
इससे ये सबक सीखना चाहिए कि सामंजस्य की जो कमी दिख रही है, उसे दूर करना चाहिए.

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हमला पठानकोट में हुआ था. वहां सेना की दो डिवीजन तैनात हैं. तो सबसे पहले सेना को बताना चाहिए था, वे सब काबू में कर लेते.
लेकिन रूल बुक के हिसाब से पहले किसी दूसरी फ़ोर्स को बुलाया गया, फिर तीसरी को बुलाया गया और फिर आर्मी को बुलाया गया. अगर सीधे ही सेना को बुलाया जाता तो शायद चरमपंथी इतना नुक़सान नहीं कर पाते.
पाकिस्तान में ऐसे बहुत से तत्व हैं जो नहीं चाहते कि भारत-पाकिस्तान में बातचीत हो. जिस दिन बैंकॉक में दोनों देशों के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार मिले थे, हमले की योजना शायद उसी दिन बन गई थी.

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अगर भारत पाकिस्तान के साथ विदेश सचिव स्तर की बातचीत आगे बढ़ाने का निर्णय कर लेता है तो ऐसे हमले और भी हो सकते हैं. युद्धविराम का उल्लंघन भी हो सकता है.
जब तक पाकिस्तानी सेना इस प्रक्रिया में शामिल नहीं होती, जब तक पाकिस्तान चरमपंथ को अपनी सरकारी नीति का हिस्सा बनाना बंद नहीं करता, ये हमले होते रहेंगे. इन हालातों में दोनों देशों के संबंधों में सुधार नहीं आ सकता.
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