हिंदी उपन्यासः असमाप्त सपनों, संशयों के कथानक

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- Author, सुशील सिद्धार्थ
- पदनाम, कथाकार, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
साहित्य में उपन्यास सबसे अधिक पढ़ी जाने वाली विधा है. व्यक्ति और समाज को अधिकाधिक समग्रता में जानने की इच्छा इसका मूल कारण है.
वर्ष 2015 में हिंदी उपन्यास ने पहले से चलती आ रही रचनाशीलता को विकसित किया. संदर्भ, सरोकार और शिल्प में कोई उल्लेखनीय नया प्रयोग न दिखने के बावजूद इस साल कुछ अच्छे उपन्यास सामने आए. कथाकार संजीव लंबे समय से किसान जीवन पर उपन्यास लिख रहे थे. वह 'फांस' नाम से प्रकाशित हुआ.
गहन शोध और चौंका देने वाले समाजशास्त्रीय विश्लेषण से भरा यह उपन्यास कुछ ज़रूरी सवाल उठाता है. यह खटक रह जाती है कि यहाँ शोध रचना पर हावी है. तथ्य रचना के मूल तत्व में घुलमिल नहीं पाते.

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'जानकीदास तेजपाल मैनशन' में अलका सरावगी स्मृति और रियलिटी का द्वंद्व उभारती हैं. अमेरिका से लौटा जयगोविंद बदलते समय व समाज की बारीकी में जी रहा है. आत्मकथा लिखते हुए वह जयदीप नाम से कुछ असमाप्त सपनों और संशयों से मुठभेड़ करता है.
शीर्षक में आया मैनशन ढहने वाली व्यवस्था का प्रतीक बन गया है. निलय उपाध्याय का 'पहाड़' जीवनकाल में ही मिथक बन गए दशरथ मांझी का वृत्तांत है. प्रेम, पीड़ा,प्रतीक्षा और परिश्रम के अनेक आयाम खोलती यह रचना बेहद पठनीय है.
उल्लेखनीय यह है कि निलय ने निजता को व्यापक सामाजिकता में बदल दिया है. 'चीलवाली कोठी' में सारा राय प्रेम और पारंपरिक मूल्यों के बीच संघर्ष का कलात्मक विवेचन करती हैं.
मीनाक्षी और विक्रम के बहाने वे समकालीन रिश्तों की दास्तान सुनाती हैं. 'डॉमनिक की वापसी' कहानीकार के रूप में पुख्ता पहचान बना चुके विवेक मिश्र का पहला उपन्यास है. इसे किताबघर प्रकाशन का 'आर्य स्मृति साहित्य सम्मान' भी मिला है.
इसमें जीवन, रंगमंच और व्यवस्था की वास्तविकता सशक्त ढंग से प्रस्तुत की गई है. डॉमनिक के रूप में लंबे समय तक याद रह जाने वाला चरित्र भी पाठकों को मिलता है.

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महीप सिंह का 'धूप ढलने के बाद' उनकी उपन्यासत्रयी का अंतिम उपन्यास है. यह लगभग आत्म कथात्मक है. एक लंबा समय यहाँ छटपटाता हुआ अनुभव किया जा सकता है. यह महीप सिंह की अंतिम रचना है. अब वे हमारे बीच नहीं रहे.
'घास का पुल' रवीन्द्र वर्मा का ऐसा उपन्यास है जो उनके कुछ पिछले उपन्यासों की आवाज़ों से परेशान है. लेखक नई रचनाशीलता से तालमेल नहीं बिठा पा रहा और ख़ुद से ही पिछड़ रहा है.
'अरण्य में गिद्ध' राकेश कुमार सिंह का सशक्त उपन्यास है. राकेश बेचैन कर देने वाला कथानक चुनते हैं. अपने अनोखे शिल्प के लिए मनोज रूपड़ा मशहूर हैं.
'काले अध्याय' इसकी पुष्टि करता है. जटिल संरचना और बहुआयामी संवेदना इसकी विशेषता है.
'तुम्हें बदलना ही होगा' सुशीला टाकभौरे की महत्वपूर्ण रचना है. इसे दलित जीवन संघर्ष को समझने के लिए बार बार पढ़ा जाना चाहिए. बल्कि यह सभी वंचित समुदायों की गाथा है.

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'समीप और समीप' एक पुरानी किस्सागोई की याद दिलाता है. इसके लेखक से. रा. यात्री ने अपने परिचित अंदाज़ में रिश्तों की रामकहानी लिखी है. यह ज़रूर है कि अब यह रचना पद्धति इतिहास की चीज़ है.
स्वाति तिवारी का पहला उपन्यास 'ब्रह्म कमल' कुछ हटकर है. कारण यह कि इसमें प्रेम, प्रकृति और पारिवारिक मूल्यों को परंपरागत तरीकों से साधने की कोशिश है. पवित्रता का आग्रह भी कुछ अधिक है.
हो सकता है लेखिका के मन में कोई शुचितावादी अवधारणा रही हो. यह ज़रूर है कि कुदरत के कुछ अच्छे विवरण यहाँ पढ़ने को मिलते हैं.
ज़ाहिर है कुछ उपन्यास और भी हैं जो इस साल आए. पठनीय भी लगे हैं. ऐसे कई उपन्यास हर साल आते हैं. ये संख्या बढ़ाने का ज़रूरी काम भी करते हैं. बहरहाल, कुछ अच्छे उपन्यासों के लिए यह वर्ष स्मरणीय रहेगा.
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