बावर्चियों को पद्म पुरस्कार तो ठीक, पर...

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- Author, पुष्पेश पंत
- पदनाम, राजनीतिक विश्लेषक
दुनिया की सभी बड़ी सभ्यताओं की पहचान भाषा, साहित्य-स्थापत्य, वेशभूषा की तरह उनके खान-पान के साथ जुड़ी है.
फ्रांस ही नहीं, इटली, चीन, जापान, और मैक्सिको के नाम भी इस संदर्भ में वैसे ही याद आते हैं जैसे आइफ़िल टावर, लूव्र का कला संग्राहालय, सिस्टीन चैपेल, ग्रेट वॉल, किमोनो, सामुराई, बौंजाई, इंका पिरामिड वगैरह.

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सदियों से पाकशास्त्र को कला के रूप में मान्यता दी जाती रही है. इस कला को न केवल शादी के नज़रिए से महिलाओं के लिए जरूरी समझा जाता रहा है बल्कि कई पुरुषों के यश के किस्से भी इससे जुड़े हैं.
महाभारत में राजा नल का जिक्र अद्भुत खाना पकाने वाले व्यक्ति के रूप में भी मिलता है. बहरहाल यहां बिना ज्यादा भटके मुख्य मुद्दे की तरफ लौटना जरूरी है.
क्या खान पान के क्षेत्र में महारत रखने वाले बावर्चियों, रसोइयों को भी पद्म सम्मान से नवाज़ा जाना चाहिए?
क्या उनके हुनर को भी उन विषयों की सूची में शामिल किया जा सकता है जिसमें क्रिकेट या फिल्म संगीत प्रवेश कर चुके हैं?

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ये सवाल इसलिए उठा है क्योंकि फिलहाल मौसम पद्म सम्मान लौटाने का है और यह सवाल कुछ अटपटा इसलिए लगता रहा है कि जनतंत्र में ये सम्मान सामंती खिताबों की याद दिलाते हैं.
याद आते हैं पंडित हृदयनाथ कुंजरू जिन्होंने संविधान बनाने वाली सभा में इस व्यवस्था का मुखर विरोध किया था और बाद में जब उनके लिए भारत रत्न का प्रस्ताव रखा गया गया तो उन्होंने सविनय इसे नकार दिया था.
तब से अब तक बहुत खून-पानी गंगा-जमुना में बह चुका है और मरणोपरांत सम्मानित किए जाने वाले अब तक उपेक्षित पात्रों की सूची बहुत लंबी हो चुकी है.

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यह जगजाहिर है कि राजकीय सम्मान और इनकी वापसी दोनों के साथ राजनीति जुडी है. पर जब रेवड़ियां बंटती ही रहेंगी तब क्यों रसोई में खटने वाले ‘कलाकारों’ की उपेक्षा की जाए?
दरअसल सांस्कृतिक मामलों के मंत्रालय ने सिफ़ारिश की है कि ख़ानसामों को भी पद्म पुरस्कार दिए जाएँ.
आज कल अक्सर किसी देश की सॉफ्ट पावर की चर्चा होती है. सॉफ्ट पावर पर्याय है किसी देश के सांस्कृतिक आकर्षण और प्रभाव का और खान पान इसका प्रमुख हिस्सा है.
ज़ाहिर है भारत के खान-पान की चर्चा जब बाहर होती है तो इससे देश का यश भी बढ़ता है.

बात अगर खान-पान की सेहत पर असर की करें तो झटपट कचरा (फास्ट जंक फूड) खाने से आम आदमी कतराने लगा है. इसमें बड़ा योगदान मशहूर सेलेब्रिटी शैफ का है जो छोटे पर्दे पर अब अक्सर दिखाई देते हैं.
संजीव कपूर, मनीष मल्होत्रा, ऋतु डालमिया, विकास खन्ना, सैबी गोराई, रणवीर बरार, गगन जैसे लोग किसी अभिनेता, खिलाड़ी या अन्य क्षेत्र में चमकते सूरज या उभरते सितारों से कम नहीं समझे जाते.
ये ना शौहरत के मोहताज हैं ना इनाम बख्शीश से मिलने वाली दौलत के. देश और विदेश सभी जगह अपने काम से इन लोगों ने भारत का माथा ऊंचा किया है. हमें यह बात नागवार लगती है कि इनको सार्वजनिक रूप से सम्मानित करने में सरकार संकोच बरतती है.
इसका एक कारण तो यह है कि हाथ से काम करने वाले को भारत में अब भी हेय दृष्टि से देखा जाता है- नौकर-चाकर जैसा.

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पर अवकाश प्राप्त नौकरशाहों और राजनेताओं से मुक्ति मिले तब तो किसी और व्यक्ति को सम्मान देने के बारे में सोचा जा सकेगा. जिसे कहीं और नहीं खपाया जा सकता वह ‘समाज सेवक’ घोषित कर पद्म अलंकरण के लिए योग्य मान लिया जाता है.
जब तक यह पुरस्कार दिए जा रहे हैं तब तक खाना पकाने, खिलाने वालों को भी इनका अधिकारी समझा जाना चाहिए.
साथ ही यह जोड़ना जरूरी है कि सम्मानित किए जाने वालों को चुनने की प्रक्रिया पारदर्शी होनी चाहिए. और हां, ध्यान रहे प्रधानमंत्रियों, राष्ट्राध्यक्षों के मनपसंद या पाँचसितारा छाप होटलों के महारथी ही सब कुछ न बटोर ले जाएं!
(यह लेखक निजी विचार हैं.)
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