'ज़िंदा रहेंगे, तभी तो रोटी चाहिए होगी'

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- Author, शकील अख़्तर
- पदनाम, बीबीसी उर्दू संवाददाता, पूर्णिया से
"ये जो भाजपा नेताओं के बयान आ रहे हैं, जो भाषण दिए गए हैँ उनसे मुसलमान बहुत दुखी हें. वह भी सभी के दिमाग़ में है. आप जब दिल जीतिएगा तब वोट लीजिएगा न!" ये कहना है पूर्णिया के मोहम्मद हनीफ़ का.
मोहम्मद हनीफ़ की ही तरह सीमांचल के अधिकतर मुस्लिम लालू प्रसाद, नीतीश कुमार और कांग्रेस के महागठंबधन के साथ हैं.
बिहार में मुसलमानों की आबादी लगभग 17 प्रतिशत है और राज्य की चुनावी राजनीति में उनका ख़ासा महत्व है.
मुसलमान पिछले 25 सालों से लालू और नीतीश को वोट देते आए हैं. सुरक्षा उनकी पहली तरजीह है.

लालू के निकट सहयोगी रहे शिवानंद तिवारी कहते हैं, “एक पार्टी मुसलमानों को मारने की बात करती है, दूसरा दल उसे बचाने की बात करता है. मुसलमान इसी में फंसा हुआ है. यह बचाने वाले के हित में है कि मारने वाली पार्टी भी बची रहे.”
लालू और नीतीश के दौर में बिहार में धार्मिक दंगे नहीं हुए. मुसलमानों को सुरक्षा और सम्मान मिला लेकिन शिक्षा और आर्थिक विकास में वो बहुत पीछे रह गए.
पटना के बुद्धिजीवी अनीश अंकुर कहते हैं कि इसकी एक वजह यह भी है कि मसुलमानों की राजनीति प्रगतिशील नहीं रही है.

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उनके मुताबिक़, "उनकी राजनीति मुल्ला, मस्जिद मॉडल पर है. उन्हें फ़ैज़ और फ़िराक़ मॉडल का नेतृत्व तैयार करना होगा. वह हर काम इस्लाम के नाम पर करता है. वोट देना इस्लामिक काम थोड़े ही है, ये तो नागरिक काम है. मुसलमान अपने नागरिक मसले को भी धार्मिक मसला बना देते हैं. नौकरी, रोज़गार, पढ़ाई इन सब पर बहस ही नहीं है."
लालू और नीतीश के दल इस बार एक साथ चुनाव लड़ रहे हैं.
राजनीतिक विश्लेषक सैबाल दासगुप्ता कहते हैं कि सुरक्षा का प्रश्न अब समाप्त हो चुका है, “लोकसभा चुनाव में मुसलमानों के सामने एक स्वाभाविक दिक़्क़त थी कि किसको चुनें. एक ने उन्हें सुरक्षा दी और दूसरे ने गवर्नेंस. अभी लालू और नीतीश की एकता हो जाने से मुसलमान मानसिक सुकून में हैं.”

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बीजेपी ने सभी को साथ लेकर चलने का वादा किया है. लेकिन पार्टी के कई नेताओं के विवादास्पद बयानों और असहिष्णुता की कुछ हालिया घटनाओं से बीजेपी के बारे में मुसलमानों के शक व शुबहे बने हुए हैं.
बीजेपी ने मुसलमानों का समर्थन हासिल करने की कोई कोशिश भी नहीं की.
बड़ी सरकारी नौकरी पर कार्यरत ग़ालिब ख़ान कहते हैं कि लालू और नीतीश के दल ही उनके लिए सही हैं.

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वह कहते हैं, “यह एक माइंडसेट है कि पहले सुरक्षित रहो, अगर सुरक्षित रहे तो कहीं मज़दूरी करके खा लेंगे. पंजाब, हरियाणा में काम कर लेंगे, ज़िंदा रहेंगे तभी तो रोटी चाहिए होगी.”
लालू और नीतीश के 25 साल के राज में मुसलमानों में आत्मविश्वास अवश्य पैदा हुआ है. लेकिन वह शिक्षा, स्वास्थ्य और आर्थिक विकास में दलितों की ही तरह काफ़ी पीछे हैं.
चुनावों में आज भी उनके ज़हन में सबसे अहम प्रश्न यही बना हुआ है कि वह किसके राज में सुरक्षित रहेंगे.
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