'बिहार का नतीजा जो हो, घाटे में होगी कांग्रेस'

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- Author, रशीद किदवई
- पदनाम, राजनीतिक विश्लेषक, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
बिहार चुनाव के नतीजों पर लालू-नीतीश-कांग्रेस के महागठबंधन और भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली एनडीए का बहुत कुछ दांव पर लगा है लेकिन आठ नवंबर को जो भी नतीजे आएं, कांग्रेस निश्चित रूप से घाटे में रहेगी.
अगर जनता दल-यूनाइटेड(जेडी-यू) और राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) को सफलता मिलती है तो नरेंद्र मोदी की भाजपा को हराने का कांग्रेस का नशा जल्द ही काफ़ूर हो जाएगा.
बिहार की जीत, नीतीश कुमार और लालू यादव को राष्ट्रीय स्तर पर बीजेपी विरोध की अगुवाई का दावेदार बना देगी और राहुल गांधी के कांग्रेस के क़द को आभासी ही सही लेकिन महत्वहीन बना देगी.
अगर ऐसा होता है तो नीतीश कुमार मोदी को असली चुनौती देने वाले नेता के रूप में उभरेंगे और लालू और अरविंद केजरीवाल भी राष्ट्रीय पहचान के लिए होड़ लगाने लगेंगे.
पंजाब को छोड़ दें तो कांग्रेस के लिए विधानसभा चुनावों में ख़ासकर राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण तीन राज्यों- उत्तर प्रदेश, बंगाल और तमिलनाडु में अपनी खोई हुई ज़मीन वापस मिलने की आस कम ही है.
कांग्रेस विचारधारा और संगठन, दोनों ही मामलों में कांग्रेस इतनी कमज़ोर हो गई है कि उसके सामने अब क्षेत्रीय पार्टियों या तीसरे मोर्चे के अगुवों के साथ तालमेल बिठाने में ख़ासी मुश्किल खड़ी हो गई है.

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दूसरी तरफ़, बिहार में बीजेपी नीत एनडीए की जीत कांग्रेस के लिए एक तगड़ा झटका साबित होगा, ख़ासकर सेक्युलरवाद और बहुलता के उन नेहरुवादी आदर्शों के संदर्भ में, जिसे कांग्रेस किसी तमग़े की तरह इस्तेमाल करती रही है.
मज़बूत और उभरती हुई बीजेपी, कांग्रेस के लिए एक बुरी ख़बर जैसी है, जो अभी भी मध्यवर्ग, युवा, ऊंची जाति और महिलाओं को अपने पाले में आने की आस लगाए हुए है.
हिंदी इलाक़े में बीजेपी की सफलता कांग्रेस की सभी वर्गों को लेकर चलने की ख़ासियत के मुद्दे को और कमज़ोर करेगी.
कांग्रेस नेतृत्व में तीखे मतभेदों, स्पष्टता की कमी और क्षेत्रीय क्षत्रपों की ग़ैरमौजूदगी को देखते हुए, सोनिया और राहुल के नेतृत्व में कांग्रेस को कई मोर्चों पर लड़ाई लड़नी पड़ेगी.
एक संभावित सहयोगी के रूप में कांग्रेस में क्षेत्रीय दलों की रुचि जाती रहेगी.
सीमित पहुंच और संसद व विधान सभाओं में सीमित सीटों के कारण सिमटी जगह में कांग्रेस के पास ख़ुद को एक ‘उदारवादी लोकतांत्रिक’ चैंपियन के रूप में पेश करने के विकल्प भी सीमित हो जाएंगे.

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बिहार के नतीजों के बाद जो डरावनी सूरत बनने वाली है, शायद इसे ही देखते हुए कांग्रेस में बहुत असंतोष है, जिसे दबा दिया जा रहा है.
नेहरू गांधी परिवार के वफ़ादार एमएल फ़ोतेदार का अनुमान कि भविष्य में पार्टी में विभाजन हो सकता है, पूरी तरह काल्पनिक नहीं है.
फ़ोतेदार का राहुल पर तीखा हमला, उनपर ज़िद्दी होने और नेतृत्व के गुणों के न होने का आरोप लगाना बहुत महत्वपूर्ण है.
कश्मीर से आने वाले निचले स्तर के इस नौकरशाह को अपने संस्मरण ‘दि चिनार लीव्स’ में ये सब लिखने से पहले काफ़ी साहस जुटाना पड़ा होगा, जो इंदिरा और राजीव गांधी का बहुत क़रीबी हुआ करता था.
उन्होंने लिखा है, “कांग्रेस अध्यक्ष के चारों ओर मौजूद चाटुकारों ने ये धारणा बनाने की कोशिश की कि 2009 लोकसभा चुनावों में पार्टी की बढ़ी हुई सीटों का कारण, राहुल गांधी की युवा छवि और चुनाव प्रचार में उनकी सक्रिय भागीदारी थी. सोनियाजी ने डॉ सिंह को इसका श्रेय न देकर, इस धारणा को और मज़बूत होने दिया.”

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वो आगे लिखते हैं, “यह बिल्कुल साफ़ था कि सोनिया जी राहुल गांधी को पार्टी और देश पर थोपने का मन बना चुकीं थीं और बस सही वक़्त का इंतज़ार कर रहीं थीं. इस तथ्य के वाबजूद कि राहुल गांधी में कुछ हदतक ज़िद्दीपन है और उनमें नेता बनने की बहुत मज़बूत प्रेरणा नहीं है.”
मौजूदा स्थिति में, अगले साल पार्टी की पूरी कमान राहुल गांधी को दिए जाने जैसे महत्वपूर्ण मुद्दे पर कांग्रेस में चुप लगा जाने वालों और विरोध करने वालों की संख्या बढ़ रही है.
हालांकि कांग्रेस के अंदरूनी लोग इस बात पर ज़ोर दे रहे हैं कि सोनिया गांधी राहुल को एआईसीसी का अध्यक्ष बनाने को लेकर दृढ़ हैं क्योंकि वो 70 साल की उम्र के बाद अध्यक्ष बने नहीं रहना चाहतीं.
सोनिया नौ दिसम्बर 2016 को अपने 71वें साल में प्रवेश कर जाएंगी.
सबसे बड़ा सवाल है कि 2016 में जब सांगठनिक चुनाव होंगे तो कौन राहुल के सामने खड़ा होगा?

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कांग्रेस में कड़ी चुनावी टक्कर की कोई परम्परा या तंत्र नहीं है. हाल के सालों में सीताराम केसरी ने साल 1997 में शरद पवार और राजेश पायलट को आसानी से हरा दिया था जबकि साल 2000 में सोनिया गांधी ने 99 प्रतिशत मतों के साथ जितेंद्र प्रसाद को हराया था.
हताश कांग्रेसी बेसब्री से एक ऐसे चेहरे की उम्मीद कर रहे हैं जो मध्यवर्ग को आकर्षित कर सके और राहुल को चुनौती दे सके.
अपनी पूरी ज़िंदगी फ़ोतेदार ने नेहरू-गांधी परिवार के ‘वफ़ादार का टैग’ ओढ़े रखा.
नटवर सिंह, अर्जुन सिंह, एनडी तिवारी, शीला दीक्षित, मोहसिना क़िदवई, केएन सिंह, पी शिवशंकर और अन्य की तरह ही उन्होंने भी 1995 में नरसिम्हा राव के ख़िलाफ़ विद्रोह कर दिया था और कांग्रेस (तिवारी) का हिस्सा बन गए, जिसे हिंदी मीडिया के एक हिस्से में ‘इनका’ (इंदिरा कांग्रेस) के बरक्स ‘तिनका’ बताया गया था.

जब मार्च 1998 में सोनिया ने पार्टी की कमान संभाली, शुरू में उन्होंने फ़ोतेदार, नटवर, अर्जुन और अन्य नेताओं को तवज्जो दी लेकिन जल्द ही राव का पक्ष लेने वाले कुछ प्रभावशाली कांग्रेसी नेताओं ने ये प्रचार शुरू कर दिया कि पुराने संगठन में शामिल हुए तिवारी कांग्रेस के सदस्यों को ख़ास तवज्जो दी जा रही है. ये कहा जाने लगा कि नटवर, अर्जुन, वी जॉर्ज और एमएल फ़ोतेदार ‘गैंग ऑफ़ फ़ोर’ या सोनिया की मंडली हैं जो उन्हें ‘गुमराह’ कर रहे हैं.
कांग्रेस का मज़बूती से नेतृत्व करने की ज़रूरत को सोनिया समझ गईं थीं और धीरे से इस गैंग ऑफ़ फ़ोर की जगह अम्बिका सोनी, अहमद पटेल, एके एंटनी, प्रणव मुखर्जी और शिवराज पाटिल ने ले ली, जिन्होंने 2004 से 2014 के बीच यूपीए शासन के दौरान अहम भूमिका निभाई.
जिस तरह एक के बाद एक ‘वफ़ादार’ सहारा पाते गए, कांग्रेस के घेरे में लैला मजनूं की वो कहावत चरितार्थ होने लगी, जिसमें लैला ने जब सुना कि उसका प्यारा बग़दाद की सड़कों पर भूखा घूम रहा है, उसने अपनी एक सेविका के हाथ दूध भेजा.
एक लालची भिखारी की उस दूध पर आंख गड़ी थी, उसने ख़ुद को मजनूं दिखाते हुए ‘हाय लैला’ चिल्लाना शुरू कर दिया.

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जब लैला ने सुना की मजनूं की हालत और ख़राब हो गई है, उसने अपनी सेविका के हाथ दूध की जगह ख़ून भेजा.
इस बार भिखारी ने असली मजनूं की ओर इशारा करते हुए कहा, “हम तो दूध वाले मजनूं हैं, ख़ून वाला वो रहा.”
इस तरह के कुछ ‘वफ़ादारों’ ने सोनिया की कृपा पाने के लिए अपनी ज़ुबान बंद रखी, लेकिन मई 2014 ने सबकुछ बदल दिया.
किसी तरह के सुधार की उम्मीद खो चुके, फ़ोतेदार और भारद्वाज जैसे लोग सोनिया के ऐतिहासिक योगदान से भी इनकार करने में नटवर की नक़ल कर रहे हैं.
क्या सोनिया को अपना संस्मरण लिखना शुरू कर देना चाहिए...
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