महादलितों के भरोसे ही है मांझी की नैया?

- Author, सलमान रावी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, नवादा से
गया ज़िले के इमामगंज विधानसभा क्षेत्र के बांके बाज़ार इलाक़े में आज काफ़ी गहमा-गहमी है क्योंकि आज यहाँ हिन्दुस्तानी अवाम पार्टी यानी 'हम' के मुखिया और पूर्व मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी की रैली थी.
अंदरूनी इलाक़ों से बड़ी संख्या में ग्रामीण उन्हें सुनने पहुंचे थे.
भीड़ में मौजूद उनके एक समर्थक का कहना था, "हमने ही उनसे इमामगंज सीट से लड़ने को कहा था. इसलिए उन्होंने आख़िरी वक़्त में यहाँ से अपना नामांकन दाख़िल किया था."
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भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन(एनडीए) में इस समय बिहार की दो दलित पार्टियां शामिल हैं. रामविलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी और जीतनराम मांझी की 'हम'.
हालांकि दलित और महादलित की हाल ही में शुरू हुई राजनीति में एनडीए के दोनों घटकों में कौनसा बीस है यह कहा नहीं जा सकता.
महादलितों का नया नेता

रामविलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी को बीजेपी ने मांझी के मुक़ाबले ज़्यादा सीटें दी हैं, मगर इमामगंज आकर इतना तो समझ आता है कि महादलितों को मांझी के रूप में एक नया नेता मिला है.
एक दूसरे समर्थक का कहना है, "कुर्सी दी और फिर खींच लिया. कितना बड़ा अपमान किया महादलितों का."
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महादलित शब्द का ईजाद ख़ुद नीतीश कुमार ने ही किया था, जब उन्होंने अनुसूचित जाति में दुसाध को छोड़कर बाक़ी सबको महादलित का विशेष दर्जा देने की घोषणा की थी.
राजनीतिक हलक़ों में ऐसा कहा जा रहा है कि यह सबकुछ नीतीश कुमार ने 'महादलितों' में अपनी पैठ बनाने की नीयत से किया था.
मगर जीतन राम मांझी ने नीतीश के दांव को नीतीश पर ही चला दिया. आज जीतन राम मांझी अपनी जाति के हीरो बन चुके हैं.
अपमान की चोट

इमेज स्रोत, Shailendra Kumar
रैली से अपने घर लौट रहे एक युवक ने कहा कि वो कभी किसी राजनीतिक दल से नहीं जुड़े रहे. यह पहला मौक़ा है जब वो किसी पार्टी में बतौर सदस्य दाख़िल हुए हैं.
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वो कहते हैं, "मुझे कभी भी किसी राजनीतिक दल के प्रति कोई आकर्षण नहीं रहा. मैं बस अपनी पढ़ाई में ही लगा रहा. मगर जीतन राम मांझी के साथ जो कुछ हुआ उससे मुझे लगा कि यह मेरी जाति का अपमान हुआ है. और अब मैं उन्हें जिताने के लिए मेहनत कर रहा हूँ."
वैसे सवाल उठता है कि जीतनराम मांझी ने मख़दूमपुर की सीट से लड़ते हुए इमामगंज सीट को क्यों चुना?
उनके क़रीबी लोगों का कहना है कि वो विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष और जनता दल (युनाइटेड) के नेता उदय नारायण चौधरी से बदला लेना चाहते हैं क्योंकि चौधरी ने ही उन्हें और उनका साथ दे रहे बाग़ी विधायकों की सदस्यता ख़त्म कर दी थी.
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मगर क्षेत्र की राजनीति पर नज़र रखने वाले लोगों को लगता है कि ऐसा मांझी ने इसलिए किया है क्योंकि उन्हें मख़दूमपुर सीट पर इस बार कड़ी टक्कर का सामना करना पड़ सकता है.
दो जगहों से चुनाव

इमामगंज में मुसहर और दुसाध (पासवान) जाति के वोट काफ़ी मायने रखते हैं. इस बार राम विलास पासवान एनडीए में मांझी के साझीदार हैं.
इसलिए मांझी को भरोसा है कि उन्हें अगर इन दोनों जातियों का वोट मिल जाता है तो उदय नारायण चौधरी को वो मुश्किल में डाल सकते हैं.
हालांकि इस सीट पर लगातार जीत दर्ज करवाते रहने वाले चौधरी उतने भी कच्चे राजनीतिज्ञ नहीं हैं.
उन्हें हराना भी मांझी के लिए इतना आसान काम नहीं रहेगा. लेकिन पासवान और मुसहरों की निर्णायक भूमिका मांझी के लिए वरदान भी साबित हो सकती है.
मगर यह तो वक़्त ही बताएगा कि मांझी ने इमामगंज से भी लड़ने का जो फ़ैसला किया है वो कितना रंग लाता है.
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