एक गाँव जहां दीवाली बाद छा जाता है अंधेरा

- Author, अजय शर्मा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
बेंसुरा नदी के किनारे बसा है महाराष्ट्र का बीड़ ज़िला. इसके गाँव येल्दा तक जाते हुए प्रकृति मानो हर जगह आपका स्वागत करती दिखती है. पर ये भ्रम देर तक पाले रखना ठीक नहीं.
यह आज़ाद भारत का वह गाँव है, जिसकी तीन-चौथाई आबादी हर साल बंधुआ मज़दूर की तरह प्रवास करती है.
<bold>पढ़ें पहली कड़ीः </bold><link type="page"><caption> पपड़ाती ज़मीन, सूखते होंठ, जर्जर जिस्म</caption><url href="http://www.bbc.com/hindi/india/2015/10/151003_draught_karnatak_series_part_one_sr.shtml" platform="highweb"/></link>
इनकी ज़मानत ज़मीन नहीं, एडवांस होता है, जिसके नाम पर वो ख़ुद को बेच देते हैं.
येल्दा तक पहुँचते-पहुँचते आपकी आँखों पर पड़ा पर्दा हटने लगता है. सूखे से पीड़ित इस गाँव में घुसते ही तब तस्वीर और साफ़ हो जाती है जब आप तुकाराम भिंबराव कांबले से मिलते हैं.
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तुकाराम इस गाँव का वो शख्स हैं जो हर साल छह-सात महीने अपनी पत्नी के साथ कर्नाटक जाते हैं. दोनों को कंपनी अगले साल के लिए क़रीब 60 से 70 हज़ार रुपए एडवांस दे देती है.
यह पैसा इस बात का वादा है कि वो अगले साल कंपनी के कारखाने में काम करने ज़रूर पहुँचेंगे.
<bold>पढ़ें दूसरी कड़ीः </bold><link type="page"><caption> सिर्फ़ 1411 शेर बचे हैं, किसान अभी बहुत हैं!</caption><url href="http://www.bbc.com/hindi/india/2015/10/151003_draught_series_farmer_suicide_sr.shtml" platform="highweb"/></link>
गाँव के दिगंबर चव्हाण के ज़रिए मैंने जाना कि तुकाराम और उनकी पत्नी असल में कुछ कंपनियों के बंधुआ बन चुके हैं.
दो साल से पड़ रहे सूखे ने इन किसानों की कपास, सोयाबीन और ज्वार की खेती मार दी है. अब वो दूसरों के कारखानों और खेतों के मज़दूर हैं.
'तालाब है पर पानी नहीं'

जैसे ही मैंने तुकाराम से पूछा कि वो काम करने बाहर क्यों जाते हैं, उनका ग़ुस्सा छलक पड़ा.
''हमें काम मिलता नहीं, पेट भरता नहीं. बाल बच्चों को कैसे पालें. गन्ना तोड़ने के लिए बाहर जाना पड़ता है. कर्नाटक जाते हैं. शोलापुर जाते हैं. गाँव में आने के बाद कोई काम नहीं मिलता. पानी पीने को मिलता नहीं. तालाब है पर पानी नहीं है.''
<bold>पढ़ें तीसरी कड़ीः</bold><link type="page"><caption> यहाँ गांव में है सिर्फ़ कर्ज़, औरतें और बच्चे</caption><url href="www.bbc.com/hindi/india/2015/10/151008_draught_series_telangana_makrajpeta_part_three_sr.shtml" platform="highweb"/></link>
तुकाराम 55 साल के हैं और पिछले 30 साल से यहीं बंधुआ मज़दूरी कर रहे हैं. उनके बच्चे भी उनके साथ ही हर साल प्रवासी मज़दूर बनते हैं क्योंकि पीछे गाँव में उन्हें देखने वाला कोई नहीं.
तुकाराम की पत्नी गंगूबाई तुकाराम कांबले ने बताया, ''20 साल से इनके (पति के) साथ जा रही हूँ बाहर काम करने. गाँव में धंधा है नहीं. खेती खराब हो चुकी है. कमाई पूरी नहीं पड़ती. बाल बच्चों को पालने के वास्ते जाते हैं. अगर कोई बुज़ुर्ग होता है, तो ही उन्हें घर में छोड़ते हैं. नहीं तो किसके पास छोड़ें.''
बंधुआ मज़दूरी

यही हाल गाँव के शारीरिक रूप से काम करने लायक क़रीब 75 फ़ीसदी मर्दों का है.
यह बंधुआ प्रवास दीवाली के बाद शुरू होता है और इसके बाद एडवांस के साथ इन्हें अगले साल जून में छुटकारा मिलता है. फिर से एक दुष्चक्र शुरू हो जाता है.
येल्दा में गन्ने और ज्वार की जो खेती थी पिछले दो साल में बारिश न होने से बर्बाद हो चुकी है. गाँव में दो तालाब हैं.
हमारे पहुँचने से दो दिन पहले हुई बूंदाबांदी के बाद वहां नमी दिख रही थी, पर असल में ये नमी जानवरों की प्यास बुझाने के काबिल भी नहीं.

फिलहाल पानी के लिए दो किलोमीटर तक गाँव पैदल चलता है. मगर दीवाली के बाद वो सूना हो जाएगा.
पीछे रह जाएंगे कुछ बुज़ुर्ग जो अपने खेतों की प्यासी ज़मीन पर बैठकर आसमान ताकेंगे.
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