'गाय पालने से डर रहे हैं मुसलमान'

- Author, सलमान रावी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, बिसाहड़ा गांव से
राजधानी दिल्ली से लगे उत्तर प्रदेश के दादरी के इलाक़े में रहने वाले मुसलमान अब अपने घर दूध के लिए भी गाय रखने से डर रहे हैं.
उनका कहना है कि अगर वो अपने घरों में गाय रखते हैं तो किसी भी रोज़ उन पर हमला हो सकता है.
दादरी इलाक़े के कई ऐसे गाँव हैं जहाँ रहने वाले मुसलामानों का कहना है कि ये हमले पिछले छह महीनों में बढ़ गए हैं और वो भी तब जब दो नए संगठनों ने इस इलाक़े में अपने पाँव पसारने शुरू कर दिए हैं.

जारचा गाँव के प्रधान एहसान चौधरी ने बीबीसी से बात करते हुए कहा कि पिछले 6 महीनों से हालात ऐसे हो गए हैं कि "कोई गाय ख़रीदकर अपने घर नहीं ला सकता है क्योंकि उस पर रास्ते में ही हमला हो जाएगा और उसकी जान भी जा सकती है".
तीन लोगों पीट-पीटकर हत्या
अगस्त महीने में ही जारचा के पास ही गाय की तस्करी के आरोप में तीन मुसलमानों की पीट-पीट कर हत्या कर दी गई थी.
एहसान चौधरी कहते हैं, "वो तो व्यापारी थे. उन पर आरोप लगाया गया कि वो वध के लिए गाय ले जा रहे थे. अब क्या करें हम ? अपने बच्चों को गाय का दूध भी ना पिलाएँ? अब हम गाय ख़रीदकर ला नहीं सकते. ऐसे हालात बना दिए जा रहे हैं."

दादरी के इलाक़े में कम-से-कम दो ऐसे संगठन हैं जिनका हाल ही में जन्म हुआ है. इनमें से एक है 'राष्ट्रवादी प्रताप सेना' और दूसरा है 'समाधान सेना'.
पिछले सोमवार को बिसराड़ा गाँव में हुए हमले के पीछे राष्ट्रवादी प्रताप सेना का हाथ होने का आरोप लगाया जा रहा है.
घटना में मारे गए अख़लाक़ के परिवार के सदस्य अफ़ज़ाल का आरोप है कि प्रताप सेना के लोगों ने ही शाम से ही सोशल मीडिया के ज़रिए लोगों को उकसाने का काम किया और बाद में मंदिर के माइक से लोगों को उकसाया.
बिसराड़ा में हुए हमले के अगले दिन एनटीपीसी कालोनी में एक धार्मिक स्थल पर हुए हमले में भी इसी संगठन के लोगों का हाथ होने का आरोप लगाया जा रहा है.

गौतम बुद्ध नगर के अतिरिक्त ज़िला अधिकारी राजेश कुमार कहते हैं कि "प्रशासन इस तरह के संगठनों की भूमिका की जाँच कर रहा है और जल्द ही इनके ख़िलाफ़ कार्यवाई की जाएगी".
छह महीनों में बढ़े हमले
गाँव के लोगों का आरोप है कि इन दोनों संगठनों के लोग अब हर गाँव में बैठकें करते हैं और जुलूस भी निकलते हैं.
कलोंदा गाँव के प्रधान अस्मत ख़ान का आरोप है कि इन संगठनों ने 16 से लेकर 20 साल तक के नौजवानों को अपने साथ करने की कोशिश की है.
वो कहते हैं, "ये लोग बच्चों को उकसाते हैं. भाषणों में कहते हैं कि यहाँ के रहने वाले मुसलमानों के पूर्वज हिंदू थे, और अब इनकी घरवापसी का वक़्त आ गया है."
जारचा और कलोंदा के ग्रामीणों का कहना है कि अब बच्चों की खेल-कूद के दौरान हुई मामूली धक्का-मुक्की भी सांप्रदायिक हिंसा का रूप ले रही है क्योंकि समाज में नफ़रत का ज़हर घोला जा रहा है.
उकसावे के भाषण
उनका यह भी आरोप है कि "अपनी बैठकों में ये संगठन बच्चों को बताते हैं कि सब मुसलमान गोमांस खाते हैं तो कभी वो मस्जिदों में लगे लाउडस्पीकरों का विरोध करने के लिए उन्हें उकसाते हैं".
जारचा के लोग बताते हैं कि जिस तरह पिछले सोमवार को बिसराड़ा गाँव में हमला हुआ उस तरह के हमले दादरी के इलाके में आम हो गए हैं.
पिछले महीने जारचा के प्रधान के घर भी इसी तरह हमला हुआ था.

प्रधान ने बीबीसी से बात करते हुए कहा, "उसी तरह हथियारों से लैस लोगों ने हमला किया मेरे घर पर. हालाँकि मेरे गाँव के ही हिंदुओं ने उनसे मुक़ाबला किया."
एहसान चौधरी के घर पर हुए हमले के सिलसिले में पुलिस ने समाधान सेना के मुखिया गोविंद चौधरी को गिरफ़्तार किया था.
वो फिलहाल ज़मानत पर रिहा हैं. पुलिस का कहना है कि गोविंद संघ परिवार से जुड़े हैं और बढौत में हुई सांप्रदायिक हिंसा में आरोपी होने के नाते उन्हें तड़ीपार कर दिया गया था.
पुलिस का कहना है कि गोविंद चौधरी नौजवानों को हिंसा के लिए भड़काते हैं.
हक़ की लड़ाई

इन आरोपों को गोविंद चौधरी सिरे से ख़ारिज करते हैं. उनके गाँव वीरपुरा में मेरी उनसे मुलाक़ात हुई तो उन्होंने कहा कि यह आरोप प्रशासन का लगाया हुआ है क्योंकि वो लोगों के हक़ की मांग को लेकर संघर्ष कर रहे हैं.
उन्होंने बीबीसी से कहा, "मेरे गाँव में मुसलमानों की आबादी सबसे ज्यादा है. उनसे जाकर पूछ लीजिए. यह आरोप राजनीति से प्रेरित हैं और कुछ भी नहीं. मैंने यहाँ बिजली और मूलभूत सुविधाओं की लडाई लड़ी है. लोगों को रहत पहुँचाने का काम किया है."
चौधरी मानते हैं कि वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक हैं और जहाँ तक गोहत्या का सवाल है तो उस पर प्रतिबंध लगा हुआ है. "गाय से आस्था जुडी है हमारी. उसका वध होना स्वीकार नहीं है."
चुनाव से पहले दंगे?
हालांकि स्थानीय लोगों को अंदेशा है कि जिस तरह लोकसभा चुनावों से पहले पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सांप्रदायिक तनाव फैल गया था, उसी तरह राज्य में 2017 में होने वाले विधानसभा चुनावों से ठीक पहले धर्म के आधार पर ध्रुवीकरण की कोशिश की जा सकती है और इस तरह के हमले बढ़ भी सकते हैं.
उनको लगता है कि शायद इसी मक़सद से इस तरह के नए संगठन खड़े किए जा रहे हैं.
गृह मंत्रालय के आंकड़ों को अगर देखा जाए तो पिछले नौ महीनो में उत्तर प्रदेश में छोटे और बड़े दंगों के 68 मामले दर्ज किए गए हैं जिनमें अब तक 10 लोगों की मौत हुई है और 224 घायल हुए हैं.
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