क्यों ख़ास है भारत का एस्ट्रोसेट?

एस्ट्रोसेट

इमेज स्रोत, ISRO

खगोलीय शोध को समर्पित भारत की पहली वेधशाला एस्ट्रोसेट को सोमवार सुबह दस बजे आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा से प्रक्षेपित किया गया.

एस्ट्रोसेट को पीएसएलवी-सी30 रॉकेट के ज़रिए पृथ्वी की निचली कक्षा में स्थापित किया जाएगा.

एस्ट्रोसेट की ख़ासियत

  • यह सुदूरवर्ती खगोलीय पिंडों के अध्ययन को समर्पित देश का पहला उपग्रह है.
  • इसरो के मुताबिक़ यह मिशन एक ही समय में अल्ट्रावायलेट, ऑप्टिकल, लो एंड हाई एनर्जी एक्स रे वेवबैंड में ब्रह्मांड की निगरानी में सक्षम है.
  • इस वेधशाला के निगरानी कार्यक्रम में देश के सभी प्रमुख खगोलीय संस्थान और कुछ विश्वविद्यालय शामिल होंगे.
  • इसका वज़न 1513 किलोग्राम है और इसे पृथ्वी की निचली कक्षा में 650 किमी की ऊंचाई पर स्थापित किया जाएगा.
  • इसरो का मिशन ऑपरेशंस कॉम्पलैक्स (मॉक्स) इस मिशन का संचालन करेगा.
  • एस्ट्रोसेट पर पांच उपकरण अल्ट्रावायलेट इमेजिंग टेलीस्कोप, लार्ज एरिया एक्स रे प्रपोशनल काउंटर, सॉफ्ट एक्स रे टेलीस्कोप, कैडमियम जिंक टेल्यूराइड इमेजर और स्कैनिंग स्काई मॉनीटर लगे हैं.
  • इन उपकरणों से मिले वैज्ञानिक आंकड़ों को मॉक्स के जमीनी स्टेशन को भेजा जाएगा.

पीएसएलवी-सी30 एस्ट्रोसेट के अलावा विभिन्न देशों के छह उपग्रह भी अपने साथ ले जा रहा है.

इनमें अमरीका के चार नैनो उपग्रह भी शामिल हैं. भारत पहली बार अमरीका के व्यावसायिक उपग्रह को प्रक्षेपित कर रहा है.

पीएसएलवी-सी30 साथ ही कनाडा और इंडोनेशिया का भी एक-एक उपग्रह ले जा रहा है.

विदेशी उपग्रह

एस्ट्रोसेट

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भारत इससे पहले 45 विदेशी उपग्रहों को प्रक्षेपित कर चुका है और इस पीएसएलवी-सी30 की सफलता के बाद यह संख्या 51 हो जाएगी.

एस्ट्रोसेट पर सुदूर आकाशीय पिंडों के अध्ययन के लिए विशेषज्ञ उपकरण लगे हैं.

हालांकि भारतीय खगोलविद दशकों से जमीनी दूरबीनों से आकाशीय हलचलों पर नज़र रखते आए हैं लेकिन अंतरिक्ष में वेधशाला होने से उनका काम और आसान हो जाएगा.

एस्ट्रोसेट पर पांच उपकरण अल्ट्रावायलेट इमेजिंग टेलीस्कोप, लार्ज एरिया एक्स रे प्रपोशनल काउंटर, सॉफ्ट एक्स रे टेलीस्कोप, कैडमियम जिंक टेल्यूराइड इमेजर और स्कैनिंग स्काई मॉनीटर लगे हैं.

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