'डेरे का माफ़ीनामा और राजनीतिक मंशा'

गुरमीत राम रहीम

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डेरा सच्चा सौदा के प्रमुख गुरमीत राम रहीम की माफ़ी के बाद अकाल तख़्त के साथ आठ साल से चल रहा उनका विवाद ख़त्म हो गया है.

साल 2007 में गुरमीत राम रहीम की एक तस्वीर छपी थी, जिसमें वे सिखों के 10वें गुरु, गुरु गोविंद सिंह की वेशभूषा में थे और उनके जैसे ही दिख रहे थे.

इसके बाद सिखों और डेरा सच्चा सौदा के समर्थकों में हिंसक झड़पें हुई थीं, जिनमें सैकड़ों लोग जख़्मी हुए थे और एक व्यक्ति की मौत हो गई थी.

अब डेरा सच्चा सौदा के प्रमुख गुरमीत राम रहीम के 'माफ़ीनामे' को सिखों की सर्वोच्च संस्था अकाल तख़्त ने मंज़ूर कर लिया था.

डेरे ने भी अपने अनुयायियों से सिखों पर किए केस वापस लेने को कहा है.

राजनीतिक विश्लेषक हरतोष बल कहते हैं कि विवाद ख़त्म हो जाना बेशक एक अच्छी बात है, लेकिन इसके पीछे अपनी एक सियासत भी है.

राजनीतिक मंशा

डेरा सच्चा सौदा के संबंध राजनीतिक पार्टियों के साथ बढ़ रहे हैं. हरियाणा और पंजाब में उनका राजनीतिक प्रभाव बढ़ा है इसलिए लगता है कि वो विवाद के सारे मसले सुलझाना चाहते हैं.

चाहे पंजाब का चुनाव हो या हरियाणा का, हर चुनाव में डेरा सच्चा सौदा की कुछ ना कुछ भूमिका हमेशा रही है.

बाबा राम रहीम

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वर्ष 2017 में पंजाब में होने वाले विधानसभा चुनाव पर इन फ़ैसलों का बहुत असर पड़ने वाला है.

हरियाणा की तुलना में डेरा का असर पंजाब में अधिक है. ऐसे में, अकाल तख़्त और डेरे का विवाद खत्म होने का सीधा फ़ायदा अकालियों को पंजाब में मिलने वाला है.

जो कट्टरवादी संगठन डेरा सच्चा सौदा के प्रमुख को माफ़ी देने के ख़िलाफ़ हैं, उनका पंजाब में राजनीतिक प्रभाव बहुत कम है.

कट्टरपंथी सिखों और डेरा के बीच जितनी दूरी और रंजिश बढ़ती है, उसका नतीजा उतना ही ख़राब होता है.

पंजाब में चरमपंथ के उभार में भी इसकी भूमिका रही है.

इसलिए जहां तक यह दूरी घटाई जाए और इन मुद्दों को सुलझाया जाए, अच्छा ही है फिर राजनीतिक मंशा चाहे कुछ भी हो.

(बीबीसी संवाददाता वात्सल्य राय की बातचीत पर आधारित)

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