दलितों ने बिहार में बनाया 'मिनी पंजाब'

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- Author, नीरज सहाय
- पदनाम, अररिया से, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
बिहार की राजधानी पटना से क़रीब 300 किलोमीटर दूर बसे हैं दलितों के कुछ ऐसे गांव जहाँ पंच ककार यानी केश, कृपाण, कंघा, कड़ा और कच्छा का पूरा पालन होता है. यही नहीं यहाँ एक गुरुद्वारा भी है.
ज़िले के ख़ास हलहलिया, नयानगर, ख़वासपुर, परमानन्दपुर, माणिकपुर और मजलत्ता गाँव में लगभग 200 ऐसे दलित महिला-पुरुष हैं, जिन्होंने सिख धर्म को अपना लिया है.

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ये सभी मूल रूप से ऋषिदेव (मांझी) समुदाय से आते हैं.
ख़ास हलहलिया गाँव में पहले फूस के श्रीअकाल तख़्त साहब गुरुद्वारा को दिसंबर, 1985 में पक्का बना दिया गया.
इस सबकी शुरुआत नरेंद्र सिंह ज्ञानी ने की थी. वो क़रीब 10 साल तक रोज़ी-रोटी के लिये पंजाब में रहे थे, ग़रीबी और बिहार में जातीय भेदभाव से पीछा छुड़ाने के लिए इन्होंने ख़ालसा पंथ अपना लिया था.
विरोध

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बाद में जब वो गाँव लौटे तो लोगों को अपने नए धर्म के प्रवचन और सत्संग सुनाए.
और लोगों में इसका प्रभाव बढ़ा वो उनके साथ होते गए.
और अस्सी के दशक में जिस बदलाव की गांव में शुरूआत हुई थी अब उसकी तीसरी पीढ़ी तैयार हो गई है.
पंजाब के कटाना साहब, खन्ना में क़रीब तीन साल काम कर चुके 35 साल के सरदार प्रमोद सिंह बताते हैं कि यह महादलितों का गाँव है.

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यहां के गुरूद्वारे में ग्रंथी का काम वीरेन्द्र सिंह ज्ञानी कर रहे हैं. और हर रोज़ पांच वाणियों का जाप होता है.
लेकिन, 'बदलाव' की शुरुआत इतनी सहज नहीं थी और स्थानीय लोगों ने इसका विरोध किया था.
बराबरी का दर्जा

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रूप सिंह कहते हैं, ''लोग कहते थे चाकू धारण कर आ गया है और ये सब वहां नहीं चलेगा. लेकिन, अब मामला ठीक है.''
हम हर साल गुरुनानक देव और गुरु गोविंद सिंह की जयंती और बैशाखी धूमधाम से मनाते हैं.
सरदार संजय सिंह के मुताबिक़ सिख धर्म बराबरी का दर्जा देता है.
संजय सिंह कहते हैं, “लंगर में एक साथ सब खाते हैं. ऊँच-नीच वाली बात इसमें नहीं है, इसलिए उन्होंने इस मत को अपनाया है.”
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