ऐसे बोलेगा कंप्यूटर फर्राटेदार हिंदी

- Author, रवि रतलामी
- पदनाम, तकनीकी जानकार और हिंदी ब्लॉगर
पहले एक सच्ची कहानी, ज़्यादा पुरानी बात नहीं है. एक दिन मेरे पास एक ईमेल आया. आईआईटी पास बंदे का पत्र था वह.
पत्र में दुखी स्वर में स्वीकारोक्ति थी कि नामी आईआईटी संस्थान से कंप्यूटर टेक्नोलॉज़ी में स्नातक होने के बावजूद वह हिंदी भाषा में लीनैक्स ऑपरेटिंग सिस्टम की उपलब्धता से अनभिज्ञ था.
और, तब तक तो हिंदी समेत अन्य प्रमुख भारतीय भाषाओं के अतिरिक्त, हमारा कंप्यूटर स्थानीय बोलियाँ - छत्तीसगढ़ी और मैथिली भी बोलने लग गया था – यानी इन भाषाओं में मुफ़्त व मुक्त स्रोत का लीनैक्स जारी हो चुका था.
जाहिर है, तंत्र में गड़बड़ियाँ हैं, और शुरू से हैं. इन गड़बड़ियों को तुरंत ठीक किया जाना चाहिए.
5 उपाय जिनसे मामला बहुत कुछ सुलझ सकता है

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1 – कंप्यूटर तकनीकी की शिक्षा में एक प्रायोगिक विषय ‘स्थानीयकरण’ (लोकलाइज़ेशन) अनिवार्य रूप से शामिल किया जाए.
विषय में हिंदी अथवा राज्य की स्थानीय भाषा शामिल की जा सकती है. छात्र अपना प्रोजेक्ट अपनी पसंद की भाषा में करे. हिंदी भाषी हिंदी में करे, तमिलनाडु का तमिल में, ओडिशा का ओडिया में.
2 – कंप्यूटिंग उपकरणों के साथ हिंदी/स्थानीय भाषा में हार्डवेयर कीबोर्ड की उपलब्धता अनिवार्य की जाए.
टच स्क्रीन मोबाइल कंप्यूटिंग उपकरणों व ट्रांसलिट्रेशन औजारों का धन्यवाद, कि अब अपने कंप्यूटिंग उपकरणों में हिंदी में लिखने के लिए अधिक जद्दोजहद नहीं करनी पड़ती.
फिर भी, अभी भी बड़ी संख्या में जनता अच्छी-खासी परेशान रहती है कि हिंदी में, आखिर, लिखें तो कैसे! हिंदी कीबोर्ड सामने रहेगा तो आदमी देख-देख कर उपयोग करना सीख ही जाएगा.
कंप्यूटिंग उपकरणों के इंटरफ़ेस व कीबोर्ड डिफ़ॉल्ट हिंदी/स्थानीय भाषा (अगर उपलब्ध हों) में ही हों. अभी होता यह है कि डिफ़ॉल्ट अंग्रेजी होता है, और हिंदी/स्थानीय भाषा का विकल्प होने के बावजूद सेटिंग में जाकर या अन्य डाउनलोड कर अथवा जुगाड़ से हिंदी/स्थानीय भाषा उपयोग में ली जाती है, जिससे लोग भाषाई कंप्यूटिंग से कन्नी काटते हैं.

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3 – सभी उत्पादों के उत्पाद निर्देशिका (यूजर मैनुअल) हिंदी/स्थानीय भाषा में उपलब्ध करवाना अनिवार्य किया जाए. इससे उत्पादों को समझना आसान होगा.
साथ ही, इस कदम से भाषायी तकनीशियन, अनुवादकों और सामग्री सृजकों की एक नई बड़ी खेप तैयार तो होगी ही, उद्योग जगत में रोजगार का एक नया, वृहद रास्ता भी बनेगा.

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4 – सीडैक आदि के तमाम कंप्यूटिंग औजार व संसाधन आम जन के लिए निःशुल्क जारी किए जाएं.
बड़े ही दुःख और बड़ी ईमानदारी से कह रहा हूँ कि अघर करदाताओं के पैसे से बने, सीडैक के तमाम भाषाई उत्पाद जैसे कि आईलीप / लीप ऑफ़िस आदि शुरुआत से ही आम जनता के लिए निःशुल्क उपयोग के लिए जारी कर दिए गए होते तो भारत की भाषाई कंप्यूटिंग का इतिहास कुछ और होता.
आज वह दस गुना ज्यादा समृद्ध होती. ख़ैर, अभी भी समय है सुधर जाने का.
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