अमरीकी पटेल क्या कहते हैं पटेल आरक्षण पर?

- Author, सलीम रिज़वी
- पदनाम, न्यूयॉर्क से, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
भारत से अमरीका आने वाले पटेल समुदाय के लोग पिछले कई दशकों से विभिन्न व्यवसाय औऱ पेशे में कार्यरत रहे हैं.
और खासकर मोटल या छोटे होटल के उद्योग में तो अमरीका भर में अब एक दशक से अधिक समय से पटेल समुदाय की तूती बोलती है.
अनुमान है कि अमरीका में आधे से अधिक मोटल के मालिक पटेल समुदाय के लोग ही हैं.
इसके अलावा अमरीका के कई प्रांतों में पटेल समुदाय के लोग विभिन्न बड़े होटल जैसे मैरिएट, हिल्टन आदि भी चलाते हैं.
इसके अलावा कई छोटे बड़े उद्योग में पटेल समुदाय ने अपनी छाप छोड़ी है. इसमें जनरल मर्चेंट स्टोर से लेकर अख़बार बेचने वाले स्टैंड सभी शामिल हैं.
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ख़ासकर न्यूयॉर्क, न्यू जर्सी, शिकागो जैसे इलाकों में पटेल समुदाय द्वारा चलाए जाने वाले स्टोर, रेस्त्रां औऱ न्यूज़पेपर स्टैंड बड़ी संख्या में मिल जाएंगे.
और इनमें से कुछ स्टोर तो 4 दशक से अधिक समय से पटेल समुदाय के लोगों ने ही शुरू किए थे.
पटेल समुदाय के लोग पेशेवर क्षेत्रों में भी मौजूद हैं जिनमें से कई डॉक्टर और दूसरे क्षेत्रों में कामयाब हैं.
अमरीका में पटेल समुदाय के क़रीब दो लाख लोग रहते हैं. और उनमें से कई बहुत धनी और कामयाब हैं.
पर पटेल समुदाय के भीतर भी दो भाग माने जाते हैं जैसे अधिकतर शिक्षित और धनी लेवा पटेल में गिने जाते हैं और अधिकतर कम पैसे वाले और कम शिक्षित कडवा पटेल होते हैं.
अमरीका में अधिकतर पटेल समुदाय के लोग तो भारत के गुजरात राज्य से ही आए हैं और इनमें से कुछ गैरक़ानूनी तौर पर भी अमरीका में रहते और काम करते हैं.
1970 के दशक में अमरीका में पटेल समुदाय के बहुत से लोग अफ़्रीका के युगांडा से भी आए. उस समय वहां के शासक इदी अमीन ने भारी संख्या में एशियाई लोगों को युगांडा से निकाल दिया था.
आरक्षण की मांग का समर्थन
गुजरात में तो पटेलों या पाटीदार जाति के लोगों को शिक्षा और नौकरियों में आरक्षण देने की मांग के साथ लाखों लोग प्रदर्शन कर रहे हैं लेकिन अमरीका में इस मुद्दे पर पटेल समुदाय में मिली जुली प्रतिक्रिया देखने में आ रही है.
जहां कुछ लोग आरक्षण की मांग कर रहे पटेल आंदोलन को भरपूर समर्थन दे रहे हैं तो कुछ लोग आंदोलन के तरीक़े और यहां तक की जाति के आधार पर आरक्षण की मांग पर भी सवाल उठा रहे हैं.

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मनोज पटेल न्यूयॉर्क के जैकसन हाईट्स इलाक़े में एक न्यूज़पेपर स्टैंड चलाते हैं. वह तो पटेल आंदोलन को भरपूर समर्थन देते हैं.
मनोज पटेल कहते हैं, "हमारे बच्चों को अच्छी शिक्षा नहीं मिलती, युवाओं को नौकरियां नहीं मिलतीं. इतने वर्ष हो गए किसी ने कोई सुनवाई नहीं की. अब हम लोग आंदोलन न करें तो क्या करें? इसी तरह सुनवाई होगी और हमारे हालात बदलेंगे."
मनोज पटेल बताते हैं कि वह फ़ोन से अपने गांव और परिवार वालों से बराबर संपर्क में रहते हैं औऱ उनके सभी दोस्त रिश्तेदार इस पटेल आंदोलन में भाग ले रहे हैं.
मनोज पटेल ने बताया कि इस आंदोलन के लिए वो आर्थिक तौर पर भी मदद भेज रहे हैं.
न्यूजर्सी में एक बीमा कंपनी में काम करने वाले जगदीश पटेल मानते हैं कि सभी को न्याय मिलना चाहिए और इसके लिए जिनको अब तक आरक्षण दिया जा रहा है उनके आरक्षण की प्रतिशत को घटा दिया जाना चाहिए.
'आरक्षण सीमित हो'

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लेकिन गुजरात में अब आरक्षण व्यवस्था के प्रति ग़ुस्सा बढ़ रहा है और हिंसा में कई लोगों की मौत भी हो चुकी है.
अमरीका में पटेल समुदाय के बहुत से लोग प्रदर्शनों के दौरान हिंसा का विरोध भी करते हैं.
भारत से अमरीका आकर तीन दशक से अधिक समय से रह रहे रमन पटेल अमरीका में कई मोटल के मालिक हैं.

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रमन आंदोलन के दौरान होने वाली हिंसा को ग़लत मानते हैं.
रमन पटेल कहते हैं, "आंदोलन का यह रास्ता जो अपनाया गया है यह तरीका ठीक नहीं है. बातचीत से समस्या का हल निकाला जाना चाहिए. हिंसा से किसी को फ़़ायदा नहीं होना है."
वो कहते हैं, "आंदोलनकारियों की मांग तो सही हो सकती है औऱ जो लोग सत्ता में हैं उन्हें भी अपना दिमाग़ बदलना होगा, क्योंकि शिक्षा और कुछ अहम क्षेत्रों में आरक्षण शायद होना ही नहीं चाहिए. और अगर हो तो सभी को बराबर से आरक्षण दिया जाए."
अमरीका में बसे पटेल समुदाय के कुछ लोगों का मानना है कि भारत में किसी को भी उसकी जाति या धर्म आदि के आधार पर आरक्षण दिया ही नहीं जाना चाहिए.
नीति बदलने की ज़रूरत

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फ़्लोरिडा प्रांत के टैंपा शहर में रहने वाले एक मशहूर चिकित्सक डॉ किरण पटेल ने सन 2005 में साउथ फ़्लोरिडा विश्विद्यालय में पटेल सेंटर फॉर ग्लोबल सूल्यूशंस नामक केंद्र की स्थापना की थी.
डॉ किरण पटेल मानते हैं कि सिर्फ़ आर्थिक स्थिति के आधार पर ही आरक्षण दिया जाना चाहिए.
वो कहते हैं, "सिर्फ़ इसलिए कि मैं किसी जाति में पैदा हुआ हूँ, इसलिए मुझे आरक्षण मिलना चाहिए, यह मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है, यह तो ग़लत है."
"चाहे वह ब्रह्मण हो या पिछड़ी जाति हो अगर उनकी आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है तो सबको बराबर मौक़े मिलने चाहिए.
अभी जो नीति है उससे तो आरक्षण का उनको भी फ़ायदा मिल रहा है जो अच्छी आर्थिक स्थिति में हैं इसीलिए नई नीति बनाने की ज़रूरत है."
हिंसा से डर

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कुछ लोगों को यह भी चिंता है कि गुजरात में हिंसा के कारण विदेशी निवेशक कहीं बिदक न जाएं.
रमन पटेल कहते हैं कि विदेशी निवेशकों के लिए सुरक्षा बहुत मायने रखती है.
वह कहते हैं, "भारत में विदेशी निवेशक आ रहे हैं, जो लोगों को रोज़गार मुहैया करा सकते हैं. लेकिन हिंसा के कारण सारे किए कराए पर पानी फिर जाएगा."
अन्य पिछड़ा वर्ग में आरक्षण की मांग को लेकर गुजरात के विभिन्न शहरों में पटेल समुदाय आंदोलन कर रहा है. इसका नेतृत्व 22 साल के हार्दिक पटेल कर रहे हैं.
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