प्याज़ पर होता है हंगामा, आलू पर क्यों नहीं?

इमेज स्रोत, THINKSTOCK
- Author, ज़ुबैर अहमद
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, नई दिल्ली
प्याज़ पर राजनीति होती है, सरकारें गिर जाती हैं और जमाखोरी के इल्ज़ाम से घिरे नेताओं-व्यापारियों के गठजोड़ के बावजूद सरकार कुछ नहीं कर पाती और लगभग हर साल इसी समय इसके दाम बढ़ जाते हैं.
प्याज़ भारत के सबसे धर्मनिरपेक्ष भोजनों में से एक है. इसे हिंदू भी उतने ही चाव से खाते हैं जितने कि मुसलमान. इसका ज़ायक़ा शाकाहारी भी लेते हैं और मांसाहारी भी.
ये अगर किचन के अंदर रसोइए को आंसू बहाने पर मजबूर कर देता है तो सरकारों के पसीने भी छुड़ा देने की क्षमता रखता है.
कहा जाता है कि आपातकाल के बाद जनता पार्टी की सरकार प्याज़ की बढ़ती कीमत पर काबू न पा सकी, जिसका इंदिरा गांधी ने खूब फायदा उठाया और 1980 में चुनाव में जीत के बाद सत्ता दोबारा हासिल कर ली.
प्याज़ पर हंगामा, आलू पर नहीं?

इमेज स्रोत, AFP
नासिक में प्याज़ के किसानों के अधिकारों के लिए लड़ने वाले किसान कार्यकर्ता गिरिधर पाटिल कहते हैं कि आलू 12 महीने पैदा किया जाता है.
राष्ट्रीय बागवानी अनुसंधान एवं विकास संस्था के चेयरमैन डॉक्टर आरपी गुप्ता कहते हैं कि प्याज़ एक सियासी फ़सल है. उनके अनुसार 1977 में एक बार अटल बिहारी वाजपेयी प्याज़ की बढ़ती कीमत के ख़िलाफ़ विरोध में इसकी माला पहन का संसद गए थे. तब से प्याज़़ दो-तीन सरकारें गिरा चुका है.
गुप्ता कहते हैं कि प्याज़ की पहचान ग़रीबों से है. वो कहते हैं, "आपने देखा होगा ग्रामीण इलाक़ों में ग़रीब रोटी और प्याज़ खाकर गुज़ारा करते हैं. समझा ये जाता है कि प्याज़ ग़रीबों का अनाज है."
ज़्यादा संवेदनशील है प्याज़़

राजीव मनियार नवी मुंबई में प्याज़ और आलू के व्यापर से जुड़े हैं. वो प्याज़ और आलू के व्यपारियों के संगठन के मानद सचिव हैं. वो कहते हैं प्याज़ की अहमियत बढ़ाने की मीडिया ज़िम्मेदार है.
वो कहते हैं, "प्याज़ का दाम बढ़ने पर मीडिया लोगों में दहशत फैला देता है जिससे आम उपभोक्ता बढ़े दाम पर प्याज़ खरीदने पर मजबूर हो जाता है."
मनियार सवाल उठाते हैं, "उत्तर प्रदेश में आलू के व्यापारी फसल बर्बाद होने से परेशान हैं. मीडिया ने इस पर कुछ क्यों नहीं कहा?"
प्याज़ आलू से कहीं ज़्यादा संवेदनशील है, ये जल्द ख़राब हो जाता है और इसे अधिक समय तक स्टॉक नहीं किया जा सकता.
प्याज़ संकट के ज़िम्मेदार कौन?

आम धारणा ये है कि प्याज़ का दाम उसी समय बढ़ता है जब थोक व्यापारी जमाखोरी पर आमादा हो जाते हैं. लेकिन सच क्या है?
व्यापारी राजीव मनियार कहते हैं कि जमाखोरी का इल्ज़ाम ग़लत है. "प्याज़ मंडी में सुबह आता है और शाम तक बिक जाता है. आप गोदाम देखकर आएं. वहां प्याज़ नहीं है. जमाखोरी संभव नहीं." उनके अनुसार सरकार ऐसा सोचती है लेकिन. ये सही नहीं हैं
किसान कार्यकर्ता गिरिधर पाटिल कहते हैं इसके ज़िम्मेदार केवल थोक व्यापारी हैं. वो कहते हैं, "अगस्त-सितम्बर में किसानों के पास कोई कांदा (प्याज़) नहीं होता. सब व्यापारियों के पास होता है. वो दाम तय करते हैं. सरकार का इस पर कोई कंट्रोल नहीं होता."

पाटिल महाराष्ट्र सरकार के रविवार को उठाये क़दम का उदाहरण देते हुए कहते हैं कि जब सरकार ने अपने अफसर गोदामों पर छापे मारने नासिक भेजे तो मंडी में अचानक प्याज़ आने लगे. उनके अनुसार प्याज़ के दाम बढ़ने का फायदा केवल व्यापारियों को होता है, किसानों को नहीं.
डॉक्टर गुप्ता के अनुसार उत्पाद की कमी नहीं है. रबी की फ़सल की 30 प्रतिशत पैदावार गोदामों में रखी जाती है जिसे अगस्त-सितम्बर में मंडियों में लाया जाता है. उनके अनुसार ख़रीफ की फसल ठीक नहीं हुई है जिसका असर अक्टूबर-नवंबर में होगा. उसको ध्यान में रखते हुए व्यापारी धीरे-धीरे करके प्याज़ मार्किट में भेज रहे हैं जिसके कारण दाम बढ़ गया है.
दाम कैसे कम होगा?

केंद्र सरकार ने 10 हज़ार टन प्याज़ आयात करने का ऐलान किया है. लेकिन इससे कोई विशेष लाभ होने की संभावना कम है.
आयात किए हुए प्याज़ मंडी में 15 सितम्बर तक आ सकेंगे. थोक मंडी में आयात किये हुए एक किलो प्याज़ का दाम 45 रुपए से कम नहीं होगा जो आज बिक रहे प्याज़ की कीमत के बराबर होगा.
ज़ाहिर है इससे कोई विशेष फायदा नहीं होगा. डॉक्टर गुप्ता कहते हैं सवाल प्याज़ की उपलब्धता का नहीं है. वो कहते हैं, "प्याज़ का स्टॉक काफी है. उसे मंडी में प्रयाप्त मात्र में लाने की ज़रुरत है."

इमेज स्रोत, Alamy
राजीव मनियार कहते हैं प्याज़ का आयात निजी व्यापारी पहले से ही कर रहे हैं. मनियार कहते हैं, "मिस्र और अफ़ग़ानिस्तान से रोज़ प्याज़ आयात हो रहा है. आयात और मात्रा में तो फायदा है लेकिन सरकार ने आयात की शर्तें इतनी सख्त रखी हैं कि इसका व्यापारियों को ख़ास फायदा नज़र नहीं आता."
गिरिधर पाटिल के मुताबिक़ आयात बढ़ने या निर्यात पर रोक लगाने से केवल थोड़े समय के लिए फायदा होगा. ज़रुरत इस बात की है कि सरकार 'खुला बाज़ार' बनाए जिसमें सरकार का कोई काम न हो.
<bold>(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप <link type="page"><caption> यहां क्लिक</caption><url href="https://play.google.com/store/apps/details?id=uk.co.bbc.hindi" platform="highweb"/></link> कर सकते हैं. आप हमें <link type="page"><caption> फ़ेसबुक</caption><url href="https://www.facebook.com/bbchindi" platform="highweb"/></link> और <link type="page"><caption> ट्विटर</caption><url href="https://twitter.com/BBCHindi" platform="highweb"/></link> पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)</bold>












