'वन रैंक-वन पेंशन' लागू करने में कैसा डर?

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- Author, नितिन ए गोखले
- पदनाम, रक्षा विशेषज्ञ
‘एक रैंक, एक पेंशन’ का मतलब है उन सभी पूर्व सैनिकों को एक समान पेंशन का भुगतान जो समान अवधि की सेवा के बाद एक ही रैंक से रिटायर हुए हों.
इस मुद्दे को तमाम सरकारें टालती रहीं, लेकिन 2008 में दो संगठनों के बड़े प्रदर्शन करने से ये मुद्दा फिर सुर्खियों में आया.
यूपीए सरकार ने एक दशक के अपने शासन में इस मुद्दे से मुँह मोड़े रखा, लेकिन अपने दूसरे कार्यकाल के आखिर साल 2014 में इस मद में 500 करोड़ रुपए डालने का ऐलान कर दिया.
तभी भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी ने इस मुद्दे को लपका और पूर्व सैनिकों को भी ये सौदा अच्छा लगा.
वादा पूरा क्यों नहीं?

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मोदी को प्रधानमंत्री बने हुए लगभग 15 महीने हो गए हैं, लेकिन ‘वन रैंक, वन पेंशन’ का वादा वो पूरा नहीं कर पाए हैं.
इसलिए भारत के 25 लाख से अधिक पूर्व सैनिक चिंतित और नाराज़ हैं क्योंकि लगभग एक दशक से उन्हें कहा जा रहा है कि ‘एक रैंक, एक पेंशन’ की उनकी मांग मान ली जाएगी.
मोदी ने भी सार्वजनिक तौर पर कहा है कि उनकी सरकार ने ‘एक रैंक, एक पेंशन’ को सैंद्धांतिक रूप से मंज़ूर कर लिया है, लेकिन अभी तक इसे लागू नहीं कर सके हैं.
इस देरी की वजह है इस मुद्दे पर रक्षा मंत्रालय और वित्त मंत्रालय की अलग-अलग राय.
खींचतान

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वित्त मंत्रालय का आकलन है कि 'एक रैंक, एक पेंशन' लागू करने पर सालाना 7500 करोड़ से लेकर 10,000 करोड़ रुपए का ख़र्च आएगा.
रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने भी अपने विभाग से इस योजना से खजाने पर पड़ने वाले बोझ का सही-सही आकलन करने को कहा है.
लेकिन वित्त मंत्री अरुण जेटली और उनके नौकरशाह अभी तक हर तरह के फॉर्मूले को ठुकराते रहे हैं और प्रधानमंत्री को इसमें दखल देने के लिए मजबूर होना पड़ा है.
मोदी के प्रमुख सचिव नृपेंद्र मिश्रा ने हाल ही में प्रदर्शनकारी पूर्व सैनिकों से मुलाक़ात कर इस मुद्दे का जल्द समाधान का वादा किया.
पर्रिकर के भी इसी सप्ताह पूर्व सैनिकों से मिलने की उम्मीद है और इसके बाद वे उन्हें लेकर प्रधानमंत्री से मिल सकते हैं ताकि इस मुद्दे पर चले आ रहे गतिरोध को ख़त्म किया जा सके.
सेना अलग कैसे

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सवाल ये है कि अर्धसैनिक या नागरिक पुलिस बल के मुक़ाबले पूर्व सैनिकों की तादाद अधिक क्यों है. इसका सीधा जवाब ये है कि देश को युवा सेना की ज़रूरत है और इसलिए युवाओं को कम उम्र में सेना में भर्ती किया जाता है और 34-37 साल की उम्र तक ये रिटायर भी हो जाते हैं.
इसके विपरीत अर्धसैनिक और नागरिक पुलिस के जवान 60 साल की उम्र में रिटायर होते हैं.
इस तरह सेना के हर 17 पेंशनभोगी लोगों के मुकाबले में कार्यरत कर्मचारियों की संख्या 10 है. उधर अर्धसैनिक बलों और पुलिस में इसके उलट 56 पेंशनभोगी लोगों के मुकाबले में 100 कार्यरत कर्मचारी हैं.
लेकिन देश की सेना को जवान और जोशीला बनाए रखने के लिए देश को ये कीमत चुकाने की आवश्यकता है.
इसलिए ये तर्क कि पूर्व सैनिकों की ‘एक रैंक, एक पेंशन’ की मांग मान लेने के बाद दूसरे सरकारी कर्मचारी भी इस तरह की मांग करने लगेंगे, तथ्यों पर आधारित नहीं है.

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सेना के अलावा दूसरे सरकारी कर्मचारियों के पास 60 साल तक नौकरी करने का विकल्प होता है, जबकि भारतीय सेना के 80 प्रतिशत जवान बहुत पहले ही रिटायर हो जाते हैं.
आने वाले कुछ दिन न केवल पूर्व सैनिकों और उनके परिवारवालों के लिए बेहद अहम होंगे, बल्कि उनके लिए भी जो अभी सेना में हैं और जल्द रिटायर होने वाले हैं.
किसी तरह का कथित अन्याय रैंकों के भीतर ही असंतोष पैदा करेगा और निश्चित तौर पर इस तरह की हालात से मोदी सरकार बचना चाहेगी.
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