कौन आंख फेरेगा बिहार चुनाव से

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- Author, अरविंद मोहन
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
राजनीतिक चेतना के मामले में देश को राह दिखाने का दावा करने वाले बिहार में जब अपनी विधान सभा का चुनाव हो तब वहां हर गली-नुक्कड और गांव में इसकी आहट काफी पहले से सुनाई दे यह स्वाभाविक है.
लेकिन बिहार के चुनाव की आहट नहीं बल्कि शोर बाकी देश और दुनिया में भी उसी अंदाज़ में सुनाई देने लगे यह बात जरूर अस्वाभाविक लगती है, लेकिन असल में ऐसा है नहीं.
कामकाज पर फैसला

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बिहार के चुनाव का वक्त ऐसा है जो इसको 10 साल के नीतीश शासन पर जनादेश की जगह केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार के लिए भी जनादेश जैसा बना रहा है.
भले मोदी को शिकायत रही हो कि मीडिया और विरोधियों ने उनकी सरकार की आलोचना ‘हनीमून पीरियड’ में ही शुरू कर दी लेकिन असल में पहला साल उन्होंने पार्टी, विपक्ष और मीडिया की तरफ से एकदम निश्चिंत भाव से गुजारा.
विदेश से तो उनको इतना समर्थन मिला कि देश के मोर्चे पर उनकी घटती लोकप्रियता को भी उससे बल मिला.
साल भर के अंदर जो उपचुनाव हुए और जिन विधानसभाओं के चुनाव हुए वे भी काफी कुछ मोदी लहर के प्रभाव में रहे.
कांग्रेस तो रास्ते से हट गई या हटा दी गई और बाक़ी किसी के वश में मोदी को चुनौती देना नहीं रहा. शिवसेना और किसी अन्य सहयोगी ने ज़रा भी गड़बड़ की तो भाजपा ने उसका साथ छोड़ दिया.
इन सबके बावजूद वो नए-पुराने, सभी इलाक़ों में जीतती रही. बिहार चुनाव साल भर का हनीमून पीरीयड बीतने पर ही नहीं, ललित गेट, व्यापमं समेत कई घोटालों के सामने आने और नरेंद्र मोदी के कुछ करने की जगह खामोश हो जाने के बाद पहला चुनाव है.
इसलिए जनता की अदालत मोदी के सवा-डेढ़ साल के कामकाज और इन घोटालों के सामने आने के बाद भी कार्रवाई न करने पर लोगों के फैसले को बताएगी.
दांव पर साख

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सच कहें तो नरेंद्र मोदी ने खुद भी बिहार चुनाव को अपनी राजनीति और शासन शैली पर एक जनादेश बना लिया है.
किसी स्थानीय चेहरे को प्रोजेक्ट करने की जगह अपने नाम पर चुनाव लडना, अपनी पहली दो जनसभाओं से ही लडाई को सीधे तार सप्तक पर पहुंचा देना और अमित शाह से लेकर अपने सभी विश्वस्त लोगों और साधन को चुनाव में झोंक देना उनका अपना फैसला है.
अब अगर अच्छा नतीजा आया तब भी और बुरा आया तब भी उन्हीं के सिर मढ़ा जाएगा.
बात इतनी ही होती तब शायद इतनी चर्चा और इतना महत्व न मिलता.
एकजुट विपक्ष

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बिहार में यह प्रयोग भी हो रहा है कि नरेंद्र मोदी को मात देने के लिए पूरा विपक्ष एकजुट है.
नीतीश कुमार संभवत: ऐसे पहले मुख्यमंत्री होंगे जिनके 10 साल के शासन की उपलब्धियों को उनके विरोधी भी मानते हैं. लेकिन यह भी सच है कि सारा यश लेकर भी पिछले लोकसभा चुनाव में वे 20 फीसदी वोट से भी नीचे आ गए थे और 40 में सिर्फ़ दो जगहों पर उनके उम्मीदवार जीत सके.
लेकिन उन्होंने ही मोदी से मिली पटखनी के बाद सबसे पहले अपनी रणनीति बदलने और नए तरीके से मोदी को चुनौती देने का फैसला किया.
विधान सभा के उपचुनावों, राज्यसभा चुनाव और विधानसभा के विश्वास मत मामले में तो उनकी रणनीति सफल हुई लेकिन विधान परिषद चुनाव में पिट गई.
अब देखना है कि विधानसभा चुनाव में नेतृत्व और गठबंधन की सीटों के बंटवारे का मसला अच्छी तरह निपटाने के बाद उनकी रणनीति किस हद तक सफल रहती है.
इस सवाल पर देश और दुनिया की नज़र है क्योंकि बिहार के बाद जिन राज्यों में चुनाव होने हैं, वहां भाजपा विरोधी शक्तियां बिखरी और आपस में टकराने वाली हैं.
बिहार का परिणाम अगर मोदी विरोधी गठबंधन, जिसमें अभी सिद्धांत और कार्यक्रम कम ही नजर आते हैं, की जीत के रूप में हुआ तो उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल वगैरह में भी इस तरह के प्रयोग दोहराए जाएंगे.
सियासी इम्तिहान

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नरेंद्र मोदी और उनकी प्रचार शैली ने कई तरह के मिथक बनाए हैं. जैसे वे पिछड़ा भी हैं और जात-पात से ऊपर हैं. वे विकास चाहते हैं और हिंदू हृदय सम्राट भी हैं.
वे चाय वाला भी हैं और अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा उनके दोस्त भी हैं. जाहिर है इन सबकी भी बिहार में व्यावहारिक परीक्षा हो जाएगी.
उन्होंने चाय का काम कितना किया है खुद नहीं बताते लेकिन लालू यादव तो अपने ग्वाल बालपन के किस्सों को चुनावी हथियार बनाते ही रहे हैं.
तो लालू-नीतीश पिछड़ा या मोदीजी पिछड़ा यह फैसला आधे से ज्यादा बिहारी ही देंगे जिन्हे मंडल आयोग भी पिछडा मानता है.
भाजपा भले ही संविधान से शासन करने की बात करे पर आबादी में पर्याप्त बड़ी हिस्सेदारी रखने वाला बिहारी मुसलमान इसे कितना मानेगा यह भी देखने की चीज होगी.
जब इतनी चीजें कसौटी पर हों, 25-30 साल से चल रही राजनीति मंडल-कमंडल और क्षेत्रीय ताकतों की प्रमुखता वाली राजनीति को आसानी से बदल देने वाले नरेंद्र मोदी के काम और राजनैतिक शैली की परीक्षा हो, कई मायनों में बिहार को बदलकर भी बेचारा बन गए नीतीश कुमार खुद लोगों से ‘मजूरी’ मांगने निकले हों, और एक पारी में पच्चीस साल से चल रहा पिछडों का शासन भी मुद्दा बन गया हो, तब राजनीति में रुचि रखने वाला कौन आदमी होगा जिसकी बिहार चुनाव में दिलचस्पी नहीं होगी.
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