मानसून सत्र तो धुल गया, अब आगे क्या?

संसद, भारत

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    • Author, प्रमोद जोशी
    • पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए

उम्मीद नहीं है कि संसद के मानसून सत्र के आखिरी दिन चमत्कार होगा. जो दो महत्वपूर्ण बिल सामने हैं, उनमें से भूमि अधिग्रहण विधेयक अगले सत्र के लिए टल चुका है.

राज्यसभा की प्रवर समिति के सुझावों को शामिल करके जो जीएसटी विधेयक पेश किया गया है, उस पर कांग्रेस ने विचार करने से ही इनकार कर दिया है.

अब आख़िरी दिन यह पास हो पाएगा इसकी उम्मीद कम है.

इस सत्र को नकारात्मक बातों के लिए याद किया जाएगा. राज्यों में आई बाढ़, महंगाई और गुरदासपुर के चरमपंथी हमले जैसे सवालों की अनदेखी के लिए भी.

अब सोचना यह है कि अगले सत्र में क्या होगा? सुषमा स्वराज का इस्तीफा नहीं हुआ तो क्या शीतकालीन सत्र भी जाम होगा?

शायद बिहार के चुनाव परिणाम भावी राजनीति की दिशा तय करेंगे.

शून्य संसद

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इस सत्र में पास करने के लिए आठ विधेयक थे. सबसे महत्वपूर्ण थे जीएसटी, भूमि अधिग्रहण, व्हिसल ब्लोवर संरक्षण और भ्रष्टाचार रोकथाम (संशोधन) विधेयक.

भूमि अधिग्रहण विधेयक पर संयुक्त समिति का प्रतिवेदन अब शीत सत्र में ही पेश होगा, इसलिए आखिरी दिन उसकी संभावना नहीं है.

मानसून सत्र में 11 अगस्त तक संसद के दोनों सदनों में 7 विधेयक पेश हुए. तीन वापस लिए गए और चार पास हुए. इनमें से केवल दिल्ली हाईकोर्ट संशोधन बिल ही दोनों सदनों से पास हुआ है. शेष तीन लोकसभा से पास हुए हैं.

इस लोकसभा का पहला साल संसदीय काम के लिहाज से अच्छा रहा. पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च के अनुसार इस साल का बजट सत्र पिछले 15 साल में सबसे अच्छा था.

लोकसभा ने अपने निर्धारित समय से 125 फीसदी और राज्यसभा ने 101 फीसदी काम किया. पर मानसून सत्र में ऐसा नहीं हो सका.

अखाड़ा राजनीति

सुषमा स्वराज और शिवराज सिंह

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कांग्रेस की छापामार शैली ने नरेंद्र मोदी की दृढ़ता और भाजपा के संख्याबल में सेंध लगा दी. पर गारंटी नहीं कि यह राजनीति वोटर को भी भाएगी और इसके सहारे क्षीणकाय कांग्रेस अपने पैरों पर खड़ी हो जाएगी.

सवाल यह भी पूछा जाएगा कि इस राजनीति के लिए क्या संसद का इस्तेमाल उचित है?

सवाल भाजपा को लेकर भी हैं. गतिरोध तोड़ने के लिए उसने भी कुछ नहीं किया. प्रधानमंत्री सामने नहीं आए. लोकसभा में कार्य-स्थगन के जवाब में उनके सामने आने की उम्मीद थी, जो नहीं हुआ.

भाजपा ने लंबे समय तक विदेशी पूँजी निवेश, बैंकिग और इंश्योरेंस-सुधार और जीएसटी के रास्ते में भी अड़ंगे लगाए थे. संसदीय पवित्रता की दुहाई वह किस मुँह से दे सकती है?

बदलती रणनीति

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सत्र शुरू होने तक कांग्रेस की रणनीति गतिरोध की नहीं थी. वह व्यापम और ललित मोदी को लेकर सरकार पर दबाव बनाना चाहती थी.

सत्र से पहले सर्वदलीय बैठक में कांग्रेस सहित सभी दल मुद्दों पर चर्चा चाहते थे. कांग्रेस ने तो चर्चा के लिए कार्य स्थगन प्रस्ताव का नोटिस भी दिया था.

सरकार बहस के लिए और सुषमा वक्तव्य के लिए तैयार थीं. पर कांग्रेस का इरादा बदल गया. पूरा सत्र धोने के बाद अचानक अंतिम दिन इरादा फिर बदल गया.

6 अगस्त को सुषमा स्वराज ने लोकसभा में जो पहला बयान दिया वह आक्रामक नहीं था. उसमें सफाई थी. पर बुधवार को कांग्रेस के स्थगन प्रस्ताव पर जो कहा, वह बेहद आक्रामक था. उसमें निशाना गांधी परिवार था.

जिस वक्त सुषमा स्वराज बोल रहीं थीं, कांग्रेस के सदस्य नारेबाजी कर रहे थे, पर सोनिया गांधी अपने हैडफोन पर हाथ रखकर सुषमा की बातें गौर से सुन रहीं थीं.

आर्थिक प्रगति

अरुण जेटली

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11 अगस्त को राज्यसभा में वित्त मंत्री अरुण जेटली ने जीएसटी से जुड़े संविधान के 122वें संशोधन विधेयक को पेश किया. विधेयक पेश करते वक्त उन्होंने कहा कि जीएसटी लागू होने से अर्थव्यवस्था में 1 से 2 फ़ीसदी की वृद्धि होगी.

यह संविधान संशोधन विधेयक है इसलिए इस पर विशेष मतदान होगा. विधेयक पर प्रवर समिति ने जो सिफारिशें की हैं उनके आठ बिंदुओं पर कांग्रेस की आपत्ति दर्ज है. उन पर विचार के लिए समय चाहिए, जो अब बचा नहीं है.

जीएसटी टलने का मतलब है कि यह अप्रैल 2016 से लागू नहीं होगा. वित्त मंत्री का कहना है कि ‘दो नेता’ इसे रोककर विकास में अवरोध पैदा करना चाहते हैं. सवाल है कि इस आर्थिक प्रगति के लिए भाजपा भी एक क़दम पीछे क्यों नहीं हटी? यह सत्र सवाल ही सवाल छोड़ गया है.

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