मानसून सत्रः कांग्रेस की 'अग्नि परीक्षा'

इमेज स्रोत, AP
- Author, रशीद किदवई
- पदनाम, राजनीतिक विश्लेषक, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
खुद को केंद्र में भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली नरेंद्र मोदी की एनडीए सरकार का मुख्य विरोधी और राष्ट्रीय विकल्प मानने वाली कांग्रेस के लिए संसद का मानसून सत्र 'अग्नि परीक्षा' है.
दशकों तक सत्ता में रही पार्टी के ख़िलाफ़ कांग्रेस विरोधी भावना बहुत गहरे तक विकसित हुई है. उसे देखते हुए नेतृत्व संभालने की इसकी इच्छा ज़मीनी हकीकत के बजाय ख़ुशफ़हमी पर आधारित है.
पार्टी नेतृत्व के रूप में नेहरू-गांधी परिवार की मौजूदगी एक बड़ी बाधा है. मुलायम सिंह यादव, एम करुणानिधि, जे जयललिता और तो और ममता बनर्जी और नवीन पटनायक जैसे राजनीति के पुराने खिलाड़ी सोनिया गांधी और राहुल गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस के विरोधी हैं.
पिछले कुछ समय में एडीएमके (अन्नाद्रमुक), टीएमसी और बीजेडी ने कई बार संकेत दिए हैं कि एनडीए के विरोधी होने के बावजूद वह कांग्रेस के पीछे चलने को तैयार नहीं हैं.
सोनिया-राहुल की हिचक

इमेज स्रोत, EPA
अपने स्तर पर राहुल गांधी ने गैर-भाजपा विपक्षी पार्टियों तक पहुंच बनाने की कोशिश बहुत कम या बिल्कुल नहीं की है.
जब पश्चिम बंगाल में वाम किले को ढहाकर ममता बनर्जी ने जीत हासिल की तो टीएमसी (जो उस समय यूपीए का हिस्सा थी) के नेताओं की उम्मीद के बावजूद राहुल गांधी शपथ ग्रहण समारोह में शामिल नहीं हुए.
कहा गया था कि गांधी राज्य के मुख्यमंत्रियों के शपथग्रहण समारोहों में शिरकत नहीं करते. इस तरह पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को कोलकाता भेज दिया गया था.
ममता के लिए यह किसी गाली से कम नहीं था.
उनके नज़दीकी सहयोगियों ने कांग्रेस के इस तर्क को काटते हुए याद दिलाया कि जब उमर अब्दुल्ला ने जम्मू-कश्मीर के सबसे युवा मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली थी तो राहुल और सोनिया वहां मौजूद थे.

इमेज स्रोत, AFP
जबसे सोनिया गांधी ने, 1998 में, पार्टी का नेतृत्व संभाला कांग्रेस-एडीएमके के संबंध बहुत अच्छे नहीं रहे.
उनके पति राजीव गांधी ने प्रधानमंत्री होने के बावजूद खुद गाड़ी चलाकर चेन्नई में जयललिता के घर जाने में कभी हिचक नहीं दिखाई. लेकिन सोनिया कथित वरिष्ठता और प्रोटोकॉल को लेकर बहुत सतर्क थीं.
जब 1998 में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार एक वोट से विश्वास मत हार गई. उस समय कांग्रेस-एडीएमके के संबंध अपने चरम पर थे. उस समय भी सोनिया-जया की 'चाय पार्टी' 10 जनपथ या तमिलनाडु भवन की जगह एक 'तटस्थ' स्थान अशोक होटल में हुई थी.
'असली कमज़ोरी'
सोनिया गांधी की हालिया इफ़्तार पार्टी में भी विपक्षी नेताओं में एकता की कमी दिखी.
मुलायम, लालू प्रसाद यादव, मायावती और सीताराम येचुरी किसी न किसी वजह से पार्टी में नहीं आए. सोनिया गांधी तृणमूल कांग्रेस के डेरेक ओ ब्रायन को ध्यान से सुनती देखी गईं.

इमेज स्रोत, PTI
इससे पता चलता था कि राजनीति का चक्का कैसे पूरी तरह घूम गया है. साल 1991 से 1997 के बीच ममता बनर्जी ने कई बार 10 जनपथ में सोनिया से मिलने की नाकाम कोशिशें कीं.
ममता उस समय कांग्रेस सदस्य थीं.
कांग्रेस को भले ही यह मानने में दिक्कत हो लेकिन समाजवादी पार्टी, टीएमसी, एडीएमके और बीएसपी जैसी पार्टियां बीजेपी के विपक्ष के रूप में खुद को कांग्रेस का विकल्प मानती हैं.
उदाहरण के लिए समाजवादी पार्टी का अनुमान है कि अगर लहर अच्छी रही तो उसे अकेले उत्तर प्रदेश से लोकसभा की 44 सीटें मिल सकती हैं. जबकि कांग्रेस की लोकसभा में कुल सीटें ही 44 हैं.
साल 2019 में होने वाले लोकसभा चुनाव से पहले बिहार, बंगाल, तमिलनाडु और उत्तर प्रदेश (200 से ज़्यादा लोकसभा सीटें) जैसे महत्वपूर्ण राज्यों में चुनाव होने हैं.
इन राज्यों में कांग्रेस न लड़ाई में है और न ही चुनाव नतीजों को प्रभावित करने की स्थिति में है. यही पार्टी की असली कमज़ोरी है और गैर-भाजपा क्षेत्रीय पार्टियों के उसकी उपेक्षा करने की वजह भी.

इमेज स्रोत, Reuters
राहुल गांधी के ज़्यादा ज़िम्मेदारी से सक्रिय होने, कड़ी मेहनत करने की बातें अपने भविष्य को लेकर संशकित कांग्रेसियों को भले ही ख़ुश कर दें. लेकिन उनका मुख्य रोल दरअसल राष्ट्रीय राजनीति में पार्टी की 'ऐतिहासिक भूमिका' को कमज़ोर करना ही रहा है.
<bold>(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए <link type="page"><caption> आप यहां क्लिक</caption><url href="https://play.google.com/store/apps/details?id=uk.co.bbc.hindi" platform="highweb"/></link> कर सकते हैं. आप हमें <link type="page"><caption> फ़ेसबुक</caption><url href="https://www.facebook.com/bbchindi" platform="highweb"/></link> और <link type="page"><caption> ट्विटर</caption><url href="https://twitter.com/BBCHindi" platform="highweb"/></link> पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)</bold>













