भ्रष्टाचार एक 'जुगाड़' है और मान्य भी....

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- Author, शिव विश्वनाथन
- पदनाम, समाजशास्त्री
भारतीय राजनीति में ड्रामा बहुत ज़्यादा पसंद किया जाता है लेकिन ड्रामा ख़ासकर 'मेलोड्रामा' असल बहस को ढँक देता है.
इसका ताज़ा उदाहरण ललित मोदी और मध्य प्रदेश का व्यापमं घोटाले से जुड़ा विवाद है.
पूरे विवाद में असल मुद्दा छुप गया है. बहस तो इस बात पर होनी चाहिए कि आम भारतीय जनजीवन में अच्छाई और बुरे के बीच महीन तालमेल कैसे बैठाया जाता है.
इसे समझने के लिए सबसे बढ़िया उदाहरण 'द हिन्दू' अख़बार के वरिष्ठ पत्रकार पनीरसेल्वियन देते हैं.
उन्होंने मुझे एक बार दक्षिण भारत के एक बड़े नेता से जुड़ा मज़ेदार क़िस्सा सुनाया.
डीएमके के एक बड़े नेता ने पूरी गंभीरता से पनीरसेल्वियन से पूछा था कि आम भारतीय किस हद तक भ्रष्टाचार बर्दाश्त कर सकते हैं.
वो नेता जी ख़ुद अपने तरीके से राजनीतिक ज़रूरत और लालच के बीच का गांधीवादी बैलेंस खोज रहे थे.
भ्रष्टाचार या जनसेवा

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राजनेताओं और उनसे जुड़े लोगों के लिए भाई-भतीजावाद या किसी को राजनीतिक संरक्षण देने से जुड़े भ्रष्टाचार उनकी व्यावहारिक ज़रूरत हैं. ये एक तरह की सेवा ही है.
ऐसी सेवा जिससे संभावनाओं के नए दरवाज़े खुल जाते हैं, जिससे सिस्टम की सुस्त मशीन में रफ़्तार आ जाती है.
ऐसा भ्रष्टाचार भारत में आम जीवन की मुश्किलों को हल करने का एक 'जुगाड़' जैसा तरीका है.
दूसरे क्षेत्रों में भारतीय 'जुगाड़ों' की तो मैनेजमेंट एक्सपर्ट भी तारीफ़ करते हैं लेकिन प्रशासन के मामले में सुशासन के पैरोकार ऐसे भ्रष्टाचार को कोसने लगते हैं.
हाँ, वसुंधरा राजे पर लगा आरोप भाजपा को घेरने के लिए एक अच्छा मुद्दा था लेकिन ऐसा आरोप लगना कोई बड़ी बात नहीं.
मुझे यकीन है कि आम भारतीयों को वसुंधरा राजे पर लगे आरोपों में कोई नई या बुरी बात नहीं लगी होगी.
दोस्तों और रिश्तेदारों का मदद करना तो भारतीय समाज में आम बात है. बहुतों के हिसाब से राजे ने भी बस यही तो किया है.
भ्रष्टाचार और ढोंग

देश का उच्च वर्ग तो हमेशा ही उच्च वर्ग के दूसरे लोगों की मदद करता है.
सरकार और प्रशासन से जुड़े मामले में गिफ़्ट और रिटर्न गिफ़्ट स्कॉलरशिप या किसी काम का ठेका देने के रूप में ही दिए जाते हैं.
मीडिया हमेशा ही भ्रष्टाचार से जुड़े विवादों में असल मुद्दा छुपाने का काम करता है.
घोटाले और घोटाले की राजनीति करने वाले ऐसा दिखावा करते हैं कि भ्रष्टाचार कोई आम बात नहीं है, ये कभी-कभार होता है.
सुषमा स्वराज-वसुंधरा राजे से जुड़ा ड्रामा देखने वालों के लिए भ्रष्टाचार प्रशासन का ही एक अलहदा तरीका है. ये राजनीति का एक छुपा हुआ अंग है.
ऐसे मामले में किसी एक व्यक्ति को खलनायक बनाना या पूरी बहस को एक-दो लोगों पर केंद्रित कर देना किसी को भुलावा देना जैसा है. भ्रष्टाचार हमेशा ही सामूहिक और सामाजिक काम होता है.
एक सीबीआई अफ़सर ने कभी मुझे बताया था कि तस्कर जैसी कोई भी चीज़ नहीं होती. तस्करी एक सामुदायिक काम है.
तस्करी का सोना जिस गांव में भी उतरता है उसे उतारने में आधा गांव मदद करता है. इसी वजह से एक्सपोर्ट-इम्पोर्ट में ऐसे सभी काम आ जाते हैं.
घपले की चेन

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बिहार में चारा घोटाले की जांच कर रहे एक अधिकारी ने दावा किया था कि इसमें शामिल लोगों की एक लंबी कड़ी है. उनके अनुसार इसका नेटवर्क बहुत बड़ा था.
पुलिस थानों में ऊपर से लेकर नीचे तक क़रीब सभी लोग ऐसे मामलों में शामिल होते हैं. अस्पतालों इत्यादि में होने वाले घोटालों की कड़ियाँ भी ऐसी ही होती हैं.
इस तरह मिलजुलकर आपसी सहयोग से किया गया भ्रष्टाचार एक संगठित कार्य बन जाता है.
इसका एक दूसरा पहलू भी है. एक ईमानदार नौकरशाह पूरी तरह अलग-थलग पड़ जाता है.
सिस्टम की मूल भावना बचाए रखने के लिए ऐसे ईमानदार अफ़सर का बार-बार तबादला किया जाता रहता है.
ऐसे में अक्सर कहा जाता है कि एक-दो लोगों से सिस्टम नहीं बदलता.
सुधार का रास्ता

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असल में आर्थिक सुधारों से भ्रष्टाचार के लिए नए अवसर भी तैयार होते हैं
जितने ज़्यादा रेगुलेशन होंगे उतना ही अधिक नियम-कानून बनेंगे और ऐसे में रेगुलेशन, समाजवादी दौर के लाइसेंस राज के लिए बस एक नया शब्द भर है.
एक बार किसी ने चुटकी लेते हुए मुझसे कहा था कि आम आदमी पार्टी, भाजपा और कांग्रेस में से किसी एक को चुनना बस भ्रष्टाचारों के अलग-अलग तरीकों को चुनने जैसा है.
उस शख्स के अनुसार भाजपा और कांग्रेस के बीच का अंतर तो बहुत मामूली है. कांग्रेस 2-जी और 3-जी जैसे विवादों में फंसती है, तो भाजपा सुषमा और राजे में.
भ्रष्टाचार करने की इनकी शैलियों और रणनीतियों में शायद ही कोई बड़ा अंतर हो.
क्रिकेट का गठजोड़

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एक वरिष्ठ राजनीतिक टिप्पणीकार ने कभी कहा था कि भारतीय राजनीति को जो एक चीज़ आपस में जोड़ती है वो है क्रिकेट.
क्रिकेट ही ऐसी चीज़ है जो मोदी, जेटली, पवार, डालमिया, श्रीनिवास जैसे लोग को जोड़ती है.
भारत में क्रिकेट और राजनीति का गठजोड़ वैसा ही बनता जा रहा है जैसा गठजोड़ अमरीका में राजनीति और कॉरपोरेट के बीच माना जाता है.
दुख की बात ये है कि भ्रष्टाचार को लेकर होने वाले इन ड्रामों से इसके प्रति उदासीनता पैदा हो जाती है.
आम आदमी इन्हें एक तमाशे के रूप में देखता है और ये सोचकर आगे बढ़ जाता है कि इससे कुछ बदलने वाला नहीं है.
आख़िरकार, भारत में भ्रष्टाचार रोकने के तरीक़ों से ज़्यादा नयापन तो भ्रष्टाचार करने के तरीकों में देखने को मिलता रहता है.
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