बिहार: नीतीश के शराबबंदी वाले बयान के मायने

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- Author, मनीष शांडिल्य
- पदनाम, पटना से, बीबीसी हिन्दी के लिए
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने पिछले दिनों ऐलान किया कि अगली बार वे सत्ता में आए तो सूबे में पूर्ण शराबबंदी लागू करेंगे.
क्या नीतीश कुमार का यह ऐलान एक चुनावी वादा भर है, राज्य की माली हालत पर इसका क्या होगा असर और ऐसा करने की राह में क्या हैं चुनौतियां?
गुरुवार को पटना के श्रीकृष्ण मेमोरियल हॉल में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार एक कार्यशाला में भाषण खत्म करने के बाद बैठे ही थे कि कुछ महिलाओं ने शराब का मुद्दा उठा दिया.
वे मांग करने लगीं कि राज्य में शराबबंदी लागू हो.
नीतीश वापस माइक पर गए और घोषणा की कि अगली बार सत्ता में आने पर वे पूर्ण शराबबंदी लागू करेंगे.
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ये वही नीतीश कुमार हैं जो कुछ साल पहले इस मामले पर अलग राय रखते थे.
साल 2012 में उन्होंने एक कार्यक्रम में कहा था, "जो पीना चाहते हैं वो टैक्स देकर पीयें. टैक्स का पैसा आएगा तभी हम कई जनहित योजनाएं शुरू कर पाएंगे."
इसी कार्यक्रम में नीतीश ने यह भी कहा था कि शराब पर बैन लगाने के बाद भी पीने वाले तरीका ढूंढ ही लेते हैं.
दरअसल, नीतीश कुमार ने गुरुवार को भले ही शराबबंदी का वादा किया हो. लेकिन उनकी सरकार ने सत्ता में आते ही अवैध शराब की बिक्री को रोकते हुए राजस्व संग्रह बढ़ाने की नीति अपनाई थी.
इसके तहत बड़ी संख्या में पंचायतों से लेकर शहरों तक में देशी-विदेशी शराब की दुकानें खोलने के लाइसेंस दिए गए. यही नहीं, इनके लिए बिक्री का लक्ष्य भी तय किया गया.
दस गुना बढ़ोतरी

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बिहार सरकार के आर्थिक सर्वेक्षण के मुताबिक बीते दस साल में शराब की बिक्री से होने वाले राजस्व में दस गुना से भी अधिक की बढ़ोतरी हुई है.
वित्तीय वर्ष 2014-15 में तो सरकार को इससे तीन हजार करोड़ रुपए से भी अधिक का राजस्व मिला.
यह राशि इसी वित्तीय वर्ष में राज्य द्वारा अपने स्रोतों से जुटाए गए राजस्व का करीब 13 प्रतिशत थी.
हालाँकि शराब की खपत बढ़ने की सबसे ज़्यादा कीमत महिलाओं को चुकानी पड़ी.

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जबकि माना जाता है कि 2010 के विधानसभा चुनाव की कामयाबी के पीछे नीतीश कुमार को महिलाओं का मिला जबरदस्त समर्थन भी था.
ऐसे में महिलाओं ने जब खुद मुख्यमंत्री ने सामने शराबबंदी की मांग की तो चुनावी साल में नीतीश कुमार ने भी शर्तों के साथ इसकी घोषणा कर दी.
बिहार राजस्व छोड़ सकता है?

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ऐसे में एक सवाल यह है कि क्या बिहार जैसा ग़रीब राज्य अभी इतने बड़े राजस्व को छोड़ने की स्थिति में है?
क्या इससे सूबे में चल रही कल्याणकारी योजनाओं पर असर नहीं पड़ेगा?
इन सवालों पर पटना विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफ़ेसर और अर्थशास्त्री नवल किशोर चौधरी कहते हैं, "टैक्स वसूली में और मुस्तैदी लाकर, इसकी चोरी रोककर और सार्वजनिक उपक्रमों को लाभकारी बनाकर इस नुकसान की बहुत हद तक भरपाई की जा सकती है."
नवल किशोर का ये भी कहना है कि शराब से विशाल राजस्व भले हो मिल रहा हो, लेकिन इससे समाज को हो रहा नुकसान कहीं ज्यादा बड़ा है.
'समस्या बढ़ेगी'

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सवाल ये भी है कि शराबबंदी को लागू कर पाना कितना व्यावहारिक होगा?
माना जा रहा है कि क़ानून और व्यवस्था के लिहाज से जटिल बिहार में पूर्ण नशाबंदी की भी अपनी चुनौतियां हैं.
इससे यहां भी गुजरात और केरल जैसी समस्याएं पैदा हो सकती हैं.
सामाजिक-राजनीतिक विश्लेषक महेंद्र सुमन बताते हैं, "अभी पूर्ण शराबबंदी व्यवहारिक नहीं है. इससे अवैध शराब, जहरीली शराब की समस्या और बढ़ेगी."
साल 2012 के दिसंबर में भोजपुर ज़िले में जहरीली शराब पीने से 30 से अधिक लोगों की मौत हो गई थी.
महेंद्र सुमन के मुताबिक अभी शराब की बिक्री को नियंत्रित करना ज़्यादा ज़रूरी है.
'अभी क्यों नहीं?'

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बिहार में शराबबंदी का फ़ैसला अलग-अलग आर्थिक और सामाजिक असर छोड़ सकता है.
फिलहाल तो नीतीश कुमार की घोषणा का राजनीतिक असर दिखाई दे रहा है.
विपक्ष का कहना है कि चुनावी साल में नीतीश झूठे वादे कर रहे हैं.
इतना ही नहीं विपक्ष उन्हें चुनौती भी दे रहा है.
पूर्व मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी तो सीधे कह रहे हैं कि अगली बार क्यों, नीतीश अभी सत्ता में हैं तो अभी से शराबबंदी लागू क्यों नहीं कर देते हैं.
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