लालू का देसी अंदाज़, नीतीश की नफ़ासत रंग लाएगी ?

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- Author, बद्री नारायण
- पदनाम, कवि एवं समाजशास्त्री, बीबीसी हिंदी के लिए
बिहार में आगामी विधानसभा चुनाव में भाजपा का मुक़ाबला करने के लिए नीतीश कुमार और लालू यादव ने हाथ मिलाया है.
लेकिन इन दोनों का गठबंधन, मात्र दो दलों का न होकर बिहार की राजनीतिक संस्कृति की दो राजनीतिक भाषाओं का गठबंधन है.
एक राजनीतिक भाषा ‘विकास एवं सुशासन’ के प्रतीक को सामने रखकर अगड़े पिछड़े दोनों को जोड़ने का राजनीतिक तिलिस्म विकसित करती है.
ऐसी भाषा नीतीश कुमार बोलते रहे हैं, हालांकि वो भी विकास के प्रतीक के पीछे जातियों का गठबंधन विकसित करते हैं, लेकिन उन्होंने जागरूक बिहार के लोगों में बिहारी अस्मिता जगाने की कोशिश भी की है.
दूसरी तरफ लालू यादव की राजनीतिक भाषा मूलतः अनपढ़, पिछड़ों एवं मुसलमानों को मिलाकर चलने वाले प्रतीकों एवं शब्दावलियों से भरी है.
लालू यादव की ठेठ भाषा

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सामाजिक न्याय और धर्म निरपेक्षता के प्रतीकों को लालू यादव देसज बोली (भोजपुरी उनकी मातृभाषा है) के लहजे और उसके शब्दों का बेहद रचनात्मक इस्तेमाल करते हुए अपने वोटरों को जगाते और जोड़ते रहे हैं.
लोक मुहावरे, लोक व्यंग, वर्नाकुलर ड्रामा और बॉडी लैग्वेज उनकी राजनीतिक भाषा की शक्ति रही है. और यही कई वर्षों तक लालू यादव को सत्ता में बने रहने का एक महत्वपूर्ण कारण रही है.
उसमें एकजुट करने की आज भी क्षमता है.
नीतीश कुमार की राजनीतिक भाषा शहरी मध्यवर्ग से लेकर गांव की तक की जागरूक जनता को जोड़ती रही है.
लालू यादव की बोली अनपढ़ ग्रामीणों, मध्यवर्गीय किसान, निम्न वर्ग एवं पिछड़ों में सामाजिक आत्मविश्वास जगाती रही है.
लालू यादव ने 70 के दशक के बिहार के रेडियो स्टेशन से प्रसारित होने वाले एवं घर-घर सुने जाने वाले 'लोहासिंह' नाटक की भोजपुरी, हिंदी, अंग्रेजी की मिलीजुली चासनी में अपने राजनीतिक विचारों को पगा कर बेहद लोकप्रिय बनाया.
बिहारी ठसक

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अभी भी 70-80 के आस-पास रेडियो सुनने वाले रामेश्वर सिंह कश्यप के नाटक ‘लोहासिंह’ का प्रसिद्ध वाक्य- ‘अरे सुनते हो! खदेड़न को मदर’! याद होगा.
नाटक मे लोहा सिंह इसी मिलीजुली भाषा को फ़ौजी लहजे में बोलता है. उसकी बोली में लोक व्यंग के पुट लगातार सुनाई पड़ते हैं.
लालू यादव अपने कॉलेज के दिनों में इसी नाटक की नकल कर पटना यूनिवर्सिटी में छात्र नेता के रूप में अनेकों बार भाषण देते रहे थे.
आगे चल उन्होंने इस भाषा एवं शैली को और धारदार बनाया और इसमें ‘सामाजिक न्याय’ का विचार डाल कर इसे और ताक़तवर बना दिया.
भले ही यह पहचान मात्र एक आडंबर बनकर रह गया हो, पर आज भी इसमें राजनीतिक गोलबन्दी की पर्याप्त क्षमता है.
यह भाषा अपने संवादों में बिहारी ठसक एवं गँवई जनता के ‘स्वाभिमान’ की भावना का इस्तेमाल करती रही है.
नीतीश की संतुलित भाषा

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पिछले चालीस-पचास सालों में बिहार काफी बदला है. शिक्षा बढ़ी है, पलायन बढ़ा है.
जनतंत्र के प्रसार एवं विकास आकांक्षा के बढ़ने से ‘महात्वाकांक्षी समूहों’ का विकास हुआ है.
शहरीकरण बढ़ा तो एक नई राजनीतिक भाषा की जरूरत आई और इसे लेकर आए नीतीश कुमार.
लेकिन आज भी बिहार में एक बहुत बड़ी आबादी ऐसी है, जो नीतीश की नई भाषा से ज़्यादा लालू की मिलीजुली गँवई ठसक वाली भाषा पसंद करती है.

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अस्मिता का भाव इस भाषा में आकर आज भी चमत्कारिक असर डालता है.
बिहार अन्तर्विरोधों से भरा राज्य है, चेतना एवं विकास के अनेक स्तरों पर यहां की जनता बंटी है.
इसलिए ज़रूरी है कि आगामी चुनाव अभियान में नीतीश कुमार की राजनीतिक भाषा के साथ लालू यादव की राजनीतिक भाषा का संतुलन हो.
इन दोनों में कोई भी असंतुलन बिहार के चुनावों के राजनीतिक परिणामों को प्रभावित कर सकता है.
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