झारखंड: आसमान से मौत बनकर टूटती बिजली

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- Author, नीरज सिन्हा
- पदनाम, रांची से, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
प्रवीण लकड़ा का घर यही है, पूछने पर दस बरस का एक लड़का बाहर निकलता है.
धीमी आवाज में कहता है, "हां, पर भाई तो रहा नहीं. ऊ चला गया. मां- बाबा, दीदी सब दूर खेत पर मिलेंगे."
खेत में काम करते मिले पैरो उरांव और उनकी पत्नी एतवरिया. साथ में बेटी और बहू.

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एक ही नज़र में साफ हो गया कि गांव का यह ग़रीब परिवार सीने में तमाम ग़म समेटे जिंदगी की दिक्कतों से जूझ रहा है.
एतवरिया बताती हैं, "मिट्टी दिए चार दिन ही हुए हैं. गुलेल लेकर चिरैयों का शिकार करने प्रवीण और उनका दोस्त रोहित तिग्गा घर से कुछ ही दूर निकले थे. अचानक बारिश होने पर एक महुआ पेड़ के नीचे खड़े हुए. इस बीच बिजली गिरी और दोनों की मौत हो गई."
ये हादसा बानगी भर है. झारखंड के कस्बाई इलाकों में आसमान से मौत बनकर गिरती बिजली बड़ी आपदा साबित हो रही है.
मौत का डर

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आसमान पर बादल गरजने और बिजली चमकने से कई घरों में चित्कार मच जाता है. कई बार लोगों को संभलने का मौका तक नहीं मिलता.
राज्य के अलग- अलग हिस्सों में पिछली एक-दो जुलाई को हुई बारिश के दौरान बिजली गिरने से 13 लोगों की मौतें हुईं.
गांवों में इसे ठनका गिरना भी कहा जाता है.
राज्य के विभिन्न जिलों से मिले आंकड़े बताते हैं कि तीन महीने के दौरान बिजली गिरने से कम से कम 48 लोगों की मौत हुई है.

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सौ से ज्यादा लोग घायल हुए हैं. दर्जनों जानवरों के मारे जाने की भी खबर है.
रांची ज़िले के हेसल खीरा टोली गांव के रहने वाले प्रवीण लकड़ा और रोहित तिग्गा की मौत एक जुलाई को आसमान से गिरी बिजली की चपेट में आने से हुई.
प्रवीण नौंवी कक्षा और रोहित इंटर के छात्र थे.
कागज़ी कार्रवाई से परेशान

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फिलहाल दोनों परिवारों को बतौर सरकारी मुआवजा तीन- तीन हज़ार रुपए मिले हैं.
प्रवीण की भाभी दयमंती बताती हैं, "मां-बाबा ठहरे अनपढ़. मुआवजे के बाकी पैसे के लिए सरकारी बाबुओं ने कई कागज़ी प्रक्रिया पूरी करने को कहा है. मौसम खेती संभालने का है. अब खेत देखें या सरकारी कार्यालय जाएं, समझ में नहीं आता."
इसी गांव में रहने वाले पास्कल कहते हैं, "पहले जैसी बात नहीं रही कि बारिश होने के साथ ही हल- बैल लेकर खेतों में निकल जाएं. खेतों में काम करते जब-तब बिजली के झटके महसूस किए जाते हैं. डर लगता है कि न जाने कब ठनका गिर जाए."
बिजली गिरने से घायल हुए लोगों को गांव वाले गोबर के ढेर में भी दबा देते हैं. उनका मानना है कि इससे जान बचने की गुंजाइश रहती है.
20 जून को खूंटी जिले के मान्हू गांव में वज्रपात की घटना में गांव के लोगों ने ये नुस्खे काफी देर तक आजमाये पर एक स्कूली बच्चे को नहीं बचाया जा सका.
मुआवज़े के प्रावधान

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सामाजिक कार्यकर्ता आरती कुजूर इस इलाके को लाइटनिंग ज़ोन घोषित करने की मांग करती हैं.
वे कहती हैं, "बिजली गिरने से लगातार जान- माल का नुकसान हो रहा है."
नामकुम की अंचलाधिकारी कुमुदनी टुडू बताती हैं कि पिछले चार सालों में बिजली गिरने की 52 घटनाएं हुई हैं.
प्रशासन का कहना है कि है कि वज्रपात को लेकर बड़ी राशि भी खर्च करनी पड़ रही है.
राज्य आपदा मोचन निधि से राज्य भर में तड़ित चालक लगाने और मौत की घटनाओं में मुआवजा देने के लिए सिर्फ एक साल (2014- 15) में 7.36 करोड़ रुपए सभी जिलों को दिए गए हैं.

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मौसम विज्ञान केंद्र के निदेशक और वैज्ञानिक बीके मंडल के मुताबिक अचानक गर्मी या तापमान बढ़ने या नमी मिलने से बादल बनते हैं.
झारखंड के भूगोल और आबोहवा के मुताबिक इसके बनने के आसार ज़्यादा रहते हैं.
आपदा प्रबंधन विभाग के सचिव एनके मिश्रा कहते हैं कि बिजली गिरने की घटनाएं राज्य के लिए बड़ी आपदा का रूप ले रही हैं.
सरकार ऐसे हादसों में मरने वालों को चार लाख रुपये का मुआवज़ा दिए जाने का प्रावधान करने जा रही है.
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