नीतीश के लिए अच्छे संकेत नहीं हैं नतीजे

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- Author, राजेन्द्र तिवारी
- पदनाम, बीबीसी हिन्दी के लिए
बिहार में विधान परिषद की 24 सीटों पर हुए चुनाव में एनडीए 13 पर, जदयू-राजद-कांग्रेस महागठबंधन 10 पर और एक निर्दलीय बाहुबली उम्मीदवार ने जीत दर्ज की.
पहले इन सीटों में 12 जदयू के, 5 भाजपा के और चार राजद के पास थीं और तीन निर्दलीय थे.
हालांकि इस चुनाव में वोट का गणित अलग तरह से ही चलता है फिर भी नतीजे कुछ बहुत ही स्पष्ट संकेत दे रहे हैं.
जिन क्षेत्रों में महागठबंधन का दबदबा रहने की बात कही जा रही है, उन क्षेत्रों के नतीजे कुछ और ही कहानी कह रहे हैं.
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मिथिलांचल में भाजपा कमजोर मानी जा रही थी, लेकिन भाजपा ने मधुबनी, दरभंगा, समस्तीपुर और लोक जनशक्ति पार्टी ने सहरसा की सीट जीत कर यह संकेत दिया है कि वह कमजोर नहीं है बल्कि मजबूत होकर निकली है.
सारण में भाजपा ने तीनों सीटें जीत लीं. भोजपुर की सीट भाजपा को मिली. मगध और पूर्वी बिहार में भाजपा का दबदबा रहा.
सिर्फ उत्तर बिहार के इलाके में महागठबंधन प्रभावी दिखाई दिया जहां बेतिया पर कांग्रेस, वैशाली और सीतामढ़ी पर राष्ट्रीय जनता दल और मुजफ्फरपुर की सीट जदयू के पास गई.
भाजपा को सिर्फ मोतिहारी की सीट पर सफलता मिली.
नतीजे बनेंगे नज़ीर

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भाजपा और एनडीए के लिए ये नतीजे उसके कार्यकर्ताओं में उत्साह भरने वाले हैं. अब तक पिछले साल विधानसभा की 10 सीटों पर हुए उपचुनाव को संकेत के तौर पर प्रस्तुत किया जाता था.
इन उपचुनाव में भाजपा सिर्फ चार सीटें ही जीत सकी थी. उसके बाद हुए दिल्ली विधानसभा चुनाव भाजपा के लिए 'वाटरलू' था.
अब विधान परिषद चुनाव के ये नतीजे नज़ीर बनेंगे. सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस चुनाव में वोट देने वाले लोग ही विधानसभा चुनाव में वोट मैनेजरों की भूमिका में होंगे और ये वोट मैनेजर बड़ी संख्या में भाजपा के पक्ष में दिखाई दे रहे हैं.
भाजपा नेताओं का कहना है कि यह चुनाव विधानसभा के फ़ाइनल के पहले का सेमीफ़ाइनल था और हमने यहां जीत दर्ज की है.
हालांकि अपनी इस जीत को वे नीतीश कुमार के अहंकार का नतीजा भी मानते हैं. वरिष्ठ भाजपा नेता सुशील मोदी का कहना है कि जनता ने सत्ता के इस सेमीफाइनल में ही अपना रुख बता दिया है.
जदयू में असमंजस

इऩ नतीजों से जनता दल यूनाइटेड में असमंजस होना स्वाभाविक है. पिछले करीब 20 दिन से जदयू का प्रचार अभियान बड़े स्तर पर चल रहा है.
पार्टी अपने जिन कार्यक्रमों (‘परचा पर चर्चा’ और ‘घर-घर दस्तक, हर घर दस्तक’) को बहुत सफल बताती रही है, उनका इन चुनाव परिणामों में कोई असर दिखाई नहीं दिया.
पार्टी नेताओं में महागठबंधन को लेकर आशंकाएं भी बढ़ी हैं. जदयू के प्रदेश अध्यक्ष वशिष्ठ नारायण सिंह का कहना है कि राजद के वोट जदयू को ट्रांसफर नहीं हो पाए और इसी के चलते हमारी सीटें कम हुई हैं.
वशिष्ठ बाबू की यह बात कुछ हद तक सही नज़र आती है.

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यदि हम छपरा और पटना के नतीजों पर नजर डालें तो ये दोनों सीटें यादव बहुल हैं और दोनों पर जदयू का उम्मीदवार हार गया.
छपरा में विधान परिषद के उपसभापति सलीम परवेज जदयू के टिकट पर थे लेकिन वहां भाजपा के सच्चिदानंद राय ने जीत दर्ज की.
पटना में जीत दर्ज की है निर्दलीय के तौर पर चुनाव लड़ने वाले बाहुबली रीतलाल यादव ने जो इस समय जेल में बंद हैं.
अभी हाल तक जदयू में रहे रंजन यादव ने कहा, ''मैंने पहले ही नीतीश को चेताया था कि राजद के साथ जाने से नुकसान होगा. अब भी समय है उनके पास अपने फैसले पर पुनर्विचार के लिए.''
लालू की पकड़ कमज़ोर हुई

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नतीजे स्पष्ट संकेत कर रहे हैं कि लालू प्रसाद यादव की पकड़ अब यादव वोट पर पहले जैसी नहीं रही.
सारण की तीनों सीटें और भोजपुर और पटना की सीटों से इसके स्पष्ट संकेत दिखाई दे रहे हैं.
कुछ लोग यह भी कह रहे हैं कि लालू प्रसाद यादव ने यादव वोट जदयू को ट्रांसफर करने की कोशिश नहीं की.
लालू की पकड़ ढीली हुई हो या लालू ने गंभीरता से यादव वोट जदयू को ट्रांसफर करने का प्रयास न किया हो.
दोनों ही स्थितियां महागठबंधन के लिए गंभीर चिंता का विषय तो होंगी ही, साथ ही परस्पर अविश्वास को खाद-पानी देने वाली भी साबित हो सकती हैं.
चुनवा पैसे का खेल?

हालांकि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा है कि यह चुनाव अलग प्रकार के हैं और इसके नतीजों से खुश होने जरूरत नहीं है और इससे गठबंधन पर कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है.
मतदान होने के बाद भाजपा के एक वरिष्ठ नेता भी कुछ इसी तरह की बात कह रहे थे. उनका कहना था कि इस चुनाव में पैसे का खेल होता है और जो ज़्यादा खर्च कर लेता है, वह जीत जाता है.
इसलिए इसके परिणाम यदि हमारे पक्ष में आते हैं तो उनका मतलब सिर्फ कार्यकर्ताओं में उत्साह भरने तक का ही है, विधानसभा चुनाव का टर्फ ही अलग है.
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