सोपोर हत्याएँ: मुफ़्ती सरकार पर उठे सवाल

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- Author, उर्मिलेश
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
भारत प्रशासित कश्मीर की सियासत में सोपोर को लेकर फिर सियासी तूफ़ान उठा हुआ है.
लज़ीज़ सेबों के लिए मशहूर इस क़स्बे में बीते एक महीने में छह लोगों की रहस्यमय ढंग से हत्या हुई है.
हाल ही में मुफ्ती सरकार ने इन हत्याओं के कथित अभियुक्तों के नाम और फोटोग्राफ जारी किए हैं.
इनके नाम हैं अब्दुल कय्यूम नज़र और इम्तियाज अहमद कांडू. इन्हें चरमपंथी संगठन हिज़्बुल मुजाहिदीन से अलग हुए नए गुट - ‘लश्कर-ए-इस्लामी’ का कमांडर बताया गया है. राज्य सरकार का कहना है कि ये गुट ख़ुद को ज़्यादा कट्टर साबित करना चाहता है.
लेकिन सोपोर और कश्मीर घाटी के ज़्यादातर लोग सरकार के बजाय अलगाववादियों की इस दलील पर ज़्यादा भरोसा कर रहे हैं कि ये हत्याएं नए तरह के ‘इख़्वानों के दस्तों’ ने की है.

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इख़्वान आत्मसमर्पण कर चुके ऐसे पूर्व चरमपंथियों को कहा जाता है, जो सरकारी एजेंसियों की मदद से राज्य में सक्रिय चरमपंथियों से लोहा लेते हैं.
हिज़्बुल मुजाहिदीन के प्रवक्ता सदाकत हुसैन ने भी मीडिया को जारी एक बयान में दावा किया, "सरकारी आरोप पूरी तरह बेबुनियाद हैं. हिज्बुल का कोई विद्रोही गुट नहीं है."
अघोषित कर्फ्यू और बंद
सोपोर के हालात और इन हत्याओं के ख़िलाफ़ घाटी में अब तक कई रैलियां और हड़तालें हो चुकी हैं.
शुक्रवार को अलगाववादी संगठनों जेकेएलएफ़ और डेमोक्रेटिक फ़्रीडम पार्टी ने ‘सोपोर चलो’ का आह्वान किया था. लेकिन सरकार ने श्रीनगर-सोपोर हाइवे, ख़ास तौर पर बारामूला से सोपोर के बीच अघोषित कर्फ़्यू सा माहौल पैदा करके ‘सोपोर चलो’ आह्वान को विफल कर दिया.

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अलगाववादी नेताओं को या तो हिरासत में ले लिया गया या उन्हें घरों मे ही नज़रबंद रखा गया.
उमर भी मैदान में
पूर्व मुख्यमंत्री और मुख्य विपक्षी दल नेशनल कांफ्रेंस के कार्यकारी अध्यक्ष उमर अब्दुल्ला ने भी मुफ़्ती सरकार के खिलाफ अपना अभियान तेज़ कर दिया है.
पिछले हफ़्ते श्रीनगर के लाल चौक पर उमर की अगुवाई में नेशनल कॉन्फ़्रेंस ने सरकार के खिलाफ बड़ी रैली निकाली.
उमर ने एक बयान में कहा कि सरकार सोपोर की रहस्यमय हत्याओं के मामले में इस बात की जांच क्यों नहीं करा रही है कि कहीं इनके पीछे ‘कांटे से कांटा निकालने’ की रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर की दलील का खेल तो नहीं है?
मुफ़्ती सरकार पर सवाल

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असल में हाल के दिनों में सोपोर में जिन लोगों की हत्याएं हुईं उनसे भी सवाल उठे हैं.
सोपोर में बीते दिनों पोस्टर लगे थे, जिनमें टेलीकॉम कंपनियों से कहा गया था कि वे कश्मीर घाटी से कारोबार बंद करें. सबसे पहली हत्या मोबाइल सिम का कारोबार करने वाली एक कंपनी के एक कर्मचारी की ही हुई.
इसके बाद हुर्रियत नेता सैयद अली शाह गिलानी के समर्थक और उनके संगठन के एक कार्यकर्ता की भी उसी तौर तरीके से हत्या हो गई.
इससे लोगों को लगने लगा कि इन हत्याओं के पीछे चरमपंथी नहीं हो सकते. वे भला हुर्रियत वालों पर क्यों हाथ उठाएंगे?

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फिर बीते मंगलवार को अनंतनाग में एक पुलिस अधिकारी के मातहत पीएसओ की हत्या कर दी गई. इन सभी हत्याओं का पैटर्न और तौर-तरीका एक सा बताया गया है.
सोपोर की हत्याओं से राज्य की मुफ़्ती मोहम्मद सईद सरकार की छवि को धक्का लगा है.
हत्याओं और अन्य कारणों से कश्मीर घाटी में मुफ़्ती सरकार की लोकप्रियता गिरी है. वहीं नेशनल कॉन्फ़्रेंस के नेता उमर अब्दुल्ला की सक्रियता को भी घाटी में उत्सुकता से देखा जा रहा है.
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)
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