हाय राम! सेल्फ़ी का है ज़माना

इमेज स्रोत, THINKSTOCK
- Author, शालू यादव
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
आजकल बच्चा-बच्चा सेल्फी का मतलब जानता है और ऐसा हो भी क्यों न!
चाहे आप कहीं भी हों – मॉल, कॉफ़ी शॉप, बाज़ार, स्कूल या कॉलेज - कोई न कोई आस-पास सेल्फ़ी लेते हुए दिख ही जाता है.
सेल्फ़ी का जुनून इस कदर लोगों के सर पर सवार है कि आजकल फ़ेसबुक, ट्विटर और इंस्टाग्राम जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर हर तीसरी तस्वीर सेल्फी ही दिखाई देती है.
और तो और अब तो सेल्फी ऐप्स भी बेहद लोकप्रिय हैं जो बेहतर दिखने में मदद करती हैं.
ख़ुद से भी बेहतर दिखने की होड़

इमेज स्रोत, EPA
स्मार्टफ़ोन्स के ऐप स्टोर में सैंकड़ों ऐसे ऐप्स उपलब्ध हैं जो न सिर्फ आपके नैन-नख़्श बदल सकती हैं बल्कि आपके चेहरे का रंग भी बदल सकती हैं. कई ऐप्स आपके चेहरे के दाग-धब्बे ही नहीं हटाती बल्कि आपके बालों को भी वैसा दिखा सकती हैं जैसे किसी शैंपू के विज्ञापन में दिखते हैं.
और ये ऐप्स धड़ल्ले से डाउनलोड हो रहे हैं.
सोशल मीडिया और ब्रैंड एक्सपर्ट हरीश बिजूर का कहना है, ‘एक ज़माना था जब हमें दूसरों को देखना बहुत पसंद था, लेकिन अब भारत में आलम ये है कि यहां मानो खुदपसंदी की लहर सी चल गई हो.’
सेल्फ़ी लेना ग़लत तो नहीं

इमेज स्रोत, Getty
उनका कहना है कि सेल्फी लेने का चलन फिर भी समझ आता है लेकिन जब लोग अपनी ही छवि के साथ छेड़-छाड़ करना शुरू कर देते हैं, तो इससे ये संदेश जाता है कि लोग ख़ुद को ही पसंद नहीं करते.
बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा, "भारत में वैसे भी ज़्यादातर लोग अपनी चमड़ी के रंग को लेकर ख़ुश नहीं रहते. और इसीलिए यहां गोरा बनाने वाली क्रीम खूब बिकती हैं. लेकिन अब लोग अपने नाक, कान और होठों को भी सेल्फी ऐप में बदल कर कुछ और ही दिखना चाहते हैं. ये दुखद बात है कि आजकल लोगों के लिए उनका शरीर, उनका फ़िगर औऱ उनका चेहरा उनके दिमाग और उनके व्यवहार से ज़्यादा महत्व रख़ता है."
लेकिन फिर अगर दूसरा पहलू देखा जाए तो भला सेल्फी ऐप्स को क्यों दोष दिया जाए? आख़िर ये ऐप्स सिर्फ़ एक ज़रिया है जिससे कि लोग अपने चेहरों को लेकर थोड़ा एक्सपेरिमेंट ही तो करते हैं.
ऐप्स की क्या ग़लती?

इमेज स्रोत, Reuters
इस तर्क पर हरीश बिजूर ने कहा, "खुद की छवि के साथ थोड़ा खेल करना बिलकुल ग़लत नहीं है. लेकिन आजकल ये चलन कुछ ज़्यादा ही ज़ोर पकड़ रहा है. अलग-अलग पोज़ में सेल्फी लेना और उसमें से बेहतरीन तस्वीर को चुन कर ऐप्स में फोटोशॉप करना एक तरह का पागलपन ही समझ लीजिए. सेल्फी ऐप्स के ज़रिए मनोरंजन नहीं बल्कि हदें पार हो रही हैं. हम ख़ुद को कुछ ज़्यादा ही गंभीरता से लेने लगे हैं."
मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि सेल्फी का खुद की अभिव्यक्ति से ज़्यादा खुद में तल्लीन होने का ज़्यादा संबंध है.

इमेज स्रोत, RIA Novosti
तो क्या एक दौर ऐसा आएगा जब लोग ख़ुद से भी बोर हो जाएंगे औऱ सेल्फियां लेना बंद कर देंगे?
इसका जवाव फिलहाल न किसी मनोवैज्ञानिक के पास है और न ही किसी सोशल मीडिया एक्स्पर्ट के पास.
<bold>(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप <link type="page"><caption> यहां क्लिक कर सकते हैं</caption><url href="https://play.google.com/store/apps/details?id=uk.co.bbc.hindi" platform="highweb"/></link>. आप हमें <link type="page"><caption> फ़ेसबुक</caption><url href="https://www.facebook.com/bbchindi" platform="highweb"/></link> और <link type="page"><caption> ट्विटर</caption><url href="https://twitter.com/BBCHindi" platform="highweb"/></link> पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)</bold>













