बिहार में भाजपा को किस 'मोदी' का सहारा!

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    • Author, उर्मिलेश
    • पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिन्दी डॉटकॉम के लिए

बिहार विधानसभा के 243 सीटों के लिए चुनाव सितंबर-अक्तूबर में होने वाले हैं.

मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवारों की दौड़ चल रही है. एक साथ कई नेता पद के लिए दावेदारी कर रहे हैं.

लेकिन भाजपा ने अब तक ये साफ़ नहीं किया है कि बिहार में उनका चुनावी चेहरा कौन होगा.

ऐसे में सवाल ये भी उठता है कि जहां और दलों ने अपने-अपने प्रत्याशियों के नाम की घोषणा कर दी है, भाजपा अपने उम्मीदवार का ऐलान क्यों नहीं कर रही?

पढ़ें उर्मिलेश का विश्लेषण.

अगर भाजपा के वरिष्ठ नेता और बिहार के सांगठनिक प्रभारी अनंत कुमार के बयान को प्रामाणिक मानें तो बिहार विधानसभा चुनाव में पार्टी मुख्यमंत्री पद के लिये किसी भी

बिहार के नेता का चेहरा आगे नहीं करेगी.

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प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी ही उसके चुनावी-चेहरे होंगे. उन्हीं के राष्ट्रीय नेतृत्व और कामकाज को आधार बनाकर भाजपा बिहार में चुनाव लड़ेगी.

ऐसा लगता है, दिल्ली विधानसभा चुनाव में अपनी शर्मनाक पराजय से पार्टी ने सबक लिया है. वह ऐसे किसी राज्य में मुख्यमंत्री पद के पार्टी प्रत्याशी के नाम का ऐलान नहीं

करना चाहती, जहां एक साथ कई नेता मुख्यमंत्री पद के प्रबल दावेदार हों.

राजनीतिक प्रयोग

दिल्ली विधान सभा चुनाव के लिए पार्टी ने अन्ना-आंदोलन में सक्रिय रहीं किरण बेदी को मुख्यमंत्री पद के प्रत्याशी के तौर पर पेश किया था.

किरण बेदी को प्रत्याशी बनाने के लिए पार्टी ने अपने तीन-चार प्रमुख नेताओं की दावेदारी को दरकिनार कर दिया था.

कई नेताओं की दावेदारी के विवाद से निपटने का पार्टी का यह राजनीतिक प्रयोग बुरी तरह पिट गया.

ऐसा लगता है कि बिहार में भाजपा नेतृत्व किसी पिटे-पिटाए प्रयोग को आजमाना नहीं चाहती. वह कामयाब फ़ॉर्मूले को लागू करना चाहती है.

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शायद इसीलिए भाजपा मोदी के चेहरे पर चुनाव लड़ना चाहती है. हरियाणा आदि राज्यों में उसने ऐसा ही किया था.

चुनावी नतीजे के बाद ही वहां राज्य के मुख्यमंत्री के नाम का फ़ैसला हुआ.

बिहार में भी शायद वह ऐसा ही करना चाहती है यानी आधे दर्जन दावेदारों से उबरने का रास्ता ढूंढना!

भाजपा के प्रमुख दावेदार

बिहार भाजपा के प्रमुख नेता और राज्य के पूर्व उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने मंगलवार की शाम मीडिया से कहा कि भाजपा ने मुख्यमंत्री पद के प्रत्याशी के मामले में

अभी कोई फ़ैसला नहीं किया है. पार्टी का संसदीय बोर्ड यह फ़ैसला करेगा.

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राज्य में इस वक्त सुशील कुमार मोदी के अलावा जिन नेताओं को पार्टी की तरफ़ से मुख्यमंत्री पद का दावेदार समझा जाता है, उनमें डा.सीपी ठाकुर, नंद किशोर यादव, रविशंकर प्रसाद, राजीव प्रताप रूडी, मंगल पांडे और चंद्रमोहन राय सहित कई नेताओं के नाम शामिल हैं.

क्या पार्टी ने इन नेताओं की पद संबंधी दावेदारी के विवाद से बचने के लिये यह नुस्खा अपनाने का फैसला किया है या करने वाली है?

‘अगड़ों’ और ‘पिछड़ों’ में मान्य

इसमें कोई दो राय नहीं कि प्रांतीय नेताओं में किसी एक के नाम का अगर चुनाव से पहले ऐलान हो गया तो बाक़ी नेता पार्टी के चुनाव-प्रचार अभियान में गहरी

दिलचस्पी लेना छोड़ देंगे.

संभव है केंद्रीय नेतृत्व ने अनंत कुमार के बयान के जरिए प्रांतीय नेताओं को इस बाबत ख़ास संकेत दिया हो!

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एक बात और, पार्टी नेतृत्व को लगता है कि बिहार में उसे ‘अगड़ों’ और ‘पिछड़ों’ दोनों के बीच स्वीकार्यता चाहिए.

सुशील मोदी, सीपी ठाकुर और नंद किशोर यादव आदि की स्वीकार्यता सभी वर्गों में नहीं है.

बिहार के मोदी और नीतीश

लेकिन राज्य के पूर्व उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी अनंत कुमार के बयान से असहज दिख रहे हैं.

सुशील मोदी के समर्थक चाहते हैं कि मुख्यमंत्री पद के पार्टी प्रत्याशी के तौर पर उनके नाम का ऐलान जल्दी कर दिया जाए.

यही बात नंद किशोर यादव, रवि शंकर प्रसाद और राजीव प्रताप रूडी के समर्थक भी कहते पाए जा रहे हैं.

भाजपा के कई प्रमुख नेताओं की इस बाबत ठोस दलील भी है.

प्रमाणिकता पर सवाल

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भाजपा के नेताओं की दलील है कि राजद-जद(यू) गठबंधन पर उनकी पार्टी ने मुख्यमंत्री पद के अपने प्रत्याशी के नाम का ऐलान करने का लगातार दबाव बनाया था.

इस दबाव में राजद-जद(यू) ने आनन-फानन में नीतीश कुमार के नाम का ऐलान कर दिया.

अब अगर भाजपा स्वयं ही अपने उम्मीदवार के नाम का ऐलान नहीं करेगी तो पार्टी की राजनीतिक प्रमाणिकता पर गंभीर सवाल उठेंगे. भाजपा के विरोधी इसे मुद्दा भी बना सकते हैं!

इसलिए राज्य के मुख्यमंत्री पद के पार्टी दावेदार के नाम का ऐलान ज़रूर होना चाहिए, सिर्फ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के राष्ट्रीय नेतृत्व के ‘प्रोजेक्शन’ से बात नहीं बनेगी.

कांटे की टक्कर

बिहार का चुनाव बेहद कांटे का है. चुनावी आंकड़ों की रोशनी में भी देखें तो लोकसभा चुनाव के दौरान बिहार में राजद-जद(यू)-कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन को 45 फ़ीसदी से भी

ज़्यादा वोट पड़े थे, जबकि भाजपा को सिर्फ 29.41 फ़ीसदी वोट पड़े और उसे लोकसभा की 40 में 22 सीटों पर क़ामयाबी मिली.

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राजद 20 फ़ीसदी से कुछ ज़्यादा वोट पाकर सिर्फ 4 सांसद जीता सका, जबकि जद(यू) और कांग्रेस को क्रमशः 15.8 फ़ीसदी व 8.4 फ़ीसदी वोटों के साथ सिर्फ़ दो-दो संसदीय सीटों से संतोष करना पड़ा था.

इस तरह नरेंद्र दामोदरदास मोदी की अगुआई में भाजपा ने बिहार में भी अभूतपूर्व सफलता पाई. लेकिन तब राजद-जद(यू) का गठबंधन नहीं था.

पिछड़े-अल्पसंख्यक-दलित वोटों में जबरदस्त विभाजन हुआ था.

भाजपा-गठबंधन पर भारी

इस हिसाब से देखें तो लालू-नीतीश अपने प्रतिद्वन्द्वी भाजपा-गठबंधन पर भारी पड़ते दिख रहे हैं.

लेकिन भाजपा अध्यक्ष अमित शाह, जो जोड़-घटाव के उस्ताद हैं, उनकी बात एक हद तक सही है कि सियासत में दो और दो मिलकर हमेशा चार नहीं होते.

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साथ ही सियासत में दो और दो मिलकर हमेशा ‘जीरो’ ही होंगे, यह भी नहीं कहा जा सकता.

ऐसे में इस चुनाव के नतीजे बहुत हद तक दोनों गठबंधनों की रणनीति, प्रचारतंत्र की दक्षता, उम्मीदवारों के चयन और विभिन्न समूहों से तालमेल या गठबंधन पर निर्भर होंगे.

राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी को अपने साथ लाकर उसने एक बड़ी कामयाबी हासिल की है.

मुख्यमंत्री पद के प्रत्याशी के नाम का सवाल भी अहम है. कई बार नाम घोषित करने का फ़ायदा होता है तो कई बार वह बड़ी गलती बन जाती है.

ऐसे में भाजपा कोई जोखिम नहीं लेना चाहती.

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