'मोदी की यात्रा प्रतीकों से भरी थी'

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भारतयी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी दो दिवसीय बांग्लादेश यात्रा के आखिरी दिन एक सभा को संबोधित किया.
उन्होंने लैंड बाउंड्री एग्रीमेंट को दिलों को जोड़ने वाला समझौता बताया तो बांग्लादेश के विकास पर ख़ुशी भी जताई.
नरेंद्र मोदी की इस यात्रा का क्या हासिल रहा इसपर बीबीसी संवाददाता समीरात्मज मिश्र ने बात की पूर्व विदेश सचिव मुचकुंद दुबे से.
पढ़ें बातचीत के चुनिंदा अंश

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इस यात्रा को आप कैसे देखते हैं?
यह निस्संदेह एक महत्वपूर्ण यात्रा रही है. इसमें कुछ ऐसे क़दम उठाए गए हैं जिसके दूरगामी अच्छे परिणाम रहेंगे.
हमने बांग्लादेश को जो दो अरब डॉलर का कर्ज देने की घोषणा की है, उसकी मदद से वहाँ के ट्रांसपोर्ट और इंफ्रास्ट्रक्चर को सुधारा जाएगा.
इससे हमारी पहुँच दक्षिण-पूर्वी एशिया और पूर्वी एशिया में बेहतर हो जाएगी.
जहाँ तक लैंड बांउड्री का सवाल है, ये बहुत दिनों से स्थगित मामला था. बांग्लादेश ने इसे 1974 में ही रेक्टिफाई कर लिया था. भारत ने एक आसान मामले को दुष्कर बनाया.
भारत में कहा गया कि इसमें ज़मीन को दूसरे देश को देने का प्रश्न है, इसलिए संविधान में बदलाव की ज़रूरत है. हमने इस तरह की विषमताएँ पैदा कीं और इतना समय लिया इसे हल करने में.

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पुरानी सरकारों की तुलना में इस सरकार ने कौन से नए क़दम उठाए हैं?
मुझे नहीं लगता कि बहुत सूझबूझ दिखाई गई है, संबंधों को नज़दीक लाने की. लेकिन इस यात्रा में सिम्बोलिज्म काफ़ी रहा है. यह यात्रा प्रतीकों से भरी थी.
एक वातावरण की अच्छी सृष्टि हुई है लेकिन उस वातावरण से फ़ायदा उठाकर जो ठोस क़दम उठाए जा सकते थे उनपर बहुत ध्यान नहीं दिया गया. मुझे उम्मीद है अगले कुछ वर्षों में इसपर ध्यान जाएगा.
आर्थिक संबंधों से जुड़े 22 समझौते हुए हैं और भारतीय कारोबारियों के बांग्लादेश में बिजली परियोजना लगाने पर भी समझौता हुआ है, इसका क्या असर होगा?
जो एमओयू हुए हैं उनमें से ज्यादातर तो संस्थाओं को जोड़ने के लिए हुए हैं. कुछ नए प्रोजेक्ट हैं और वो महत्वपूर्ण हैं.
बांग्लादेश में ऊर्जा की कमी दूर करने के लिए हमारे कारोबारी अगर वहाँ बिजली परियोजना जल्द से जल्द शुरू करते हैं जिससे वहाँ की जनता को फ़ायदा होगा, तो हमें भी इसका फ़ायदा होगा.
मुझे ऐसी उम्मीद नहीं थी कि हमारे देश में उनका पूँजी निवेश हो सकता था.

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सार्क देशों के संबंध में आप इस यात्रा को कैसे देखते हैं? पाकिस्तान की एक तरह से अनदेखी की गई है.
मैं समझता हूँ ये रणनीति ठीक नहीं है. हिन्दुस्तान और पाकिस्तान दक्षिण एशिया में दो सबसे बड़े देश हैं.
इन दोनों देशों के आपसी सहयोग और आपसी कारोबार को ध्यान में रखे बिना दक्षिण एशिया में कोई बड़ी प्रगति नहीं हो सकती है. लेकिन क्षेत्रीय और उप-क्षेत्रीय सहयोग साथ साथ चल सकते हैं.
सार्क के अंतर्गत सहयोग बढ़ाने की कोशिश करने के साथ साथ भूटान, नेपाल, बांग्लादेश और हिन्दुस्तान आपस में मिलकर इंफ्रास्ट्रक्चर के क्षेत्र में काम कर सकें तो बेहतर होगा. इसमें लागत की बहुत ज़रूरत है.
इन सभी क्षेत्रों में इंफ्रास्ट्रक्चर का बड़ा अभाव है. इस लागत का बड़ा हिस्सा भारत को देना होगा. इसलिए ये बहुत आसान मुद्दा नहीं है.

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बांग्लादेश के निर्माण में पूर्व भारतीय प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की बड़ी भूमिका मानी जाती है लेकिन इस यात्रा में उनका कोई ख़ास जिक्र नहीं हुआ, इसे कैसे देखते हैं?
मैं इसे बहुत ज़्यादा महत्व नहीं दूँगा. भारत ने उस समय बांग्लादेश के लिए जो किया उसपर काफ़ी जोर दिया गया है. किसी नेता ने क्या किया है उसपर जोर देने से ये ज़्यादा महत्वपूर्ण है.
इंदिरा गांधी ने बांग्लादेश के लिए जो किया वो इतिहास का विषय है. उसे कोई भुला नहीं सकता, चाहे उनका नाम लिया गया हो, या न हो. इसलिए ये मेरे लिए ज़्यादा महत्व का विषय नहीं है.
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