मोदी वर्ष में हाशिए पर उदार सोच

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- Author, मधुकर उपाध्याय
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
केंद्र में नरेंद्र मोदी सरकार ने एक साल पूरा कर लिया है और, ज़ाहिर है, इस समय सुर्खियां उसी के कामकाज की हैं.
मोटे तौर पर इन चर्चाओं में सरकार की क्षमता, योग्यता, उपलब्धि और विफलता प्रायः इसी क्रम में बहस में आती है.
पारंपरिक जनसंचार माध्यमों में उसे मंत्रालय-वार एक से लेकर दस तक नंबर दिए जाते हैं और विपक्ष भी इन्हीं आंकड़ों में उलझकर रह गया है.
लेकिन कुछ प्रश्न इन आंकड़ों से बाहर भी बचते हैं. वे व्यापक समाज की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं पर विमर्श में शामिल नहीं होते.
उदार विचार हाशिए पर
उदाहरण के लिए यह देखा और पूछा जाना चाहिए कि क्या बहुसंख्यक समाज में उदार विचार और उसकी ज़मीन हाशिए पर चली गई है? या धकेल दी गई है?
क्या उदात्त हिंदू चिंतन और स्वर ख़ामोश हो गया है? यह कि क्या वैचारिक आक्रामकता समाज का नया स्थाई भाव है?
ये सवाल दो बार पहले भी उठे थे. अस्सी के दशक में सिख समुदाय और उसके अगले दशक में उदार मुस्लिम समाज के संदर्भ में.
यह पूछा गया था कि क्या कोई समुदाय केवल समर्थन या विरोध के दो छोटे हिस्सों से बनता है? उसमें वृहत्तर उदार समाज की आवाज़ का कोई अर्थ नहीं है?

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भारत के तीन पड़ोसी देशों - पाकिस्तान, अफ़गानिस्तान और बांग्लादेश में ऐसी स्थितियां कई बार बनीं, जिनमें अल्पसंख्यक आक्रांताओं ने यह साबित करने की कोशिश की कि उदारता कट्टरपन का जवाब नहीं हो सकती.
'सोचने की क़ुव्वत छीनना ...'
उसकी ज़मीन आसानी से छीनी जा सकती है.
रक्षामंत्री मनोहर पार्रिकर का यह बयान कि आतंकवाद से आतंकवादी लड़ेंगे, उसी सोच का विस्तार है कि नेकनीयती और उदारता की जगह लगातार सिकुड़ रही है.
शायर फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ ने इस प्रयास को ‘सोचने की क़ुव्वत छीनना और आंख बंद किया जाना’ कहा था.
कहा था कि ऐसे में ‘वह देखने, पढ़ने, सुनने की ख़्वाहिश होती है, जिसकी इजाज़त नहीं होती.’
फ़ैज़ की बेटी सलीमा हाशमी कहती हैं, ‘मुश्क़िलात सियासी हों या समाजी, जब आवाज़ें डुबोने लगती हैं तो एक तेज़ आवाज़ होती है. हालांकि उस आवाज़ को अक्सर जेलबंद कर दिया जाता है, वह लोगों की आवाज़ बनती है."
आपातकाल के दौरान भारत में ऐसी कई आवाज़ें उभरीं और जनता की आवाज़ बनीं. धर्मवीर भारती, रघुवीर सहाय, कमलेश्वर, दुष्यंत कुमार उनमें से कुछ नाम थे. हरिशंकर परसाई थे, जिनके व्यंग्य से आहत संघ के कार्यकर्ताओं ने उन्हें पीट दिया.

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लेकिन यह चालीस साल पुरानी बात है. तब से स्थितियां बदली हैं और आक्रांता पहले की तुलना में अधिक सतर्क हैं. वे यह लड़ाई ख़ामोशी से, सोशल मीडिया जैसे नए हथियारों के साथ जीतना चाहते हैं. इसमें सतह पर जो दिखता है, उससे अधिक नीचे होता है.
'दबा दी गईं आवाज़े ... '
लेखिका अरुंधती रॉय संभवतः इसी बदलाव की ओर इशारा करते हुए कहती हैं, ‘दरअसल बेआवाज़ कोई नहीं है. बस, कुछ आवाज़ें जानबूझकर दबा दी जाती हैं और कुछ को सोच-समझकर अनसुना कर दिया जाता है.’
पारंपरिक जनसंचार माध्यमों में कॉर्पोरेट दबाव, जगह की कमी और उनका भोथरापन उदार समाज को आभासी माध्यमों की ओर धकेलता है, जो प्रायः छापामार शैली में काम करते हैं.
लेकिन वहां संख्याबल किसी उदात्त अवधारणा को बेरहमी से कुचल सकता है. बदसलूकी और बदज़ुबानी उदार समाज को इन माध्यमों से दूर करती है.
अख़बार, पत्रिकाएं और समाचार चैनल बेहद इकतरफ़ा नज़र आते हैं और चाय-पान की दूकानों की चर्चा का खुलापन ख़तरे में दिखाई देता है.
इसकी वजह पर बात नहीं होती लेकिन साफ़ लगता है कि कोई अकारण वैचारिक आक्रांताओं की चपेट में नहीं आना चाहता.
चीनी रणनीतिकार सुन ज़ा ने ढाई हज़ार साल पहले कहा था कि शांति का रास्ता युद्ध के मैदान से होकर जाता है. लेकिन अब युद्ध के नियम बदल गए हैं.
लड़ाई केवल निर्धारित मैदान या तय समय पर नहीं होती. बल्कि उसका ज़्यादा बड़ा मैदान समाज होता है, वैचारिक लड़ाई उसका हिस्सा होती है और चौबीसों घंटा लड़ी जाती है.
यह लड़ाई इस हद तक सार्वजनिक होती है कि उसके एक-एक पल की ख़बर सबके पास होती है. मोबाइल कैमरों से तस्वीरें खींची जाती हैं, साझा होती हैं. पीठ भी मोबाइल पर थपथपाई जाती है. सब कुछ मय दस्तावेज़.
ऐसे में एक सवाल उठता है कि आक्रामकता की ‘सेल्फ़ी’ समाज की नई तस्वीर है या उदार सोच का ‘ग्रुप फ़ोटो’? इसका जवाब कई देशों में कई बार मिल चुका है और फिर मिलेगा लेकिन फ़िलहाल तो समाज सेल्फ़ी युद्ध काल में लगता है.
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