मोदी पर पाकिस्तान, बांग्लादेश में क्या राय?

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भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने कार्यकाल के पहले साल में विदेश नीति के मोर्चे पर काफ़ी सक्रिय नज़र आए.
अपने शपथग्रहण समारोह में उन्होंने सार्क देशों के राष्ट्राध्यक्षों को आमंत्रित किया.
फिर अपनी विदेश यात्राओं की शुरुआत भूटान से की और ये संदेश दिया कि पड़ोसी भी उनके लिए ख़ासे मायने रखते हैं.
भारत के चार प्रमुख पड़ोसी देशों में मोदी को लेकर क्या रुख़ है?
बीबीसी की उर्दू, बांग्ला, नेपाली, सिन्हला सेवाओं के सहयोगियों ने ये बताने की कोशिश की है कि भारत के पड़ोसी देशों में भारत की छवि कैसी है.
शकील बिन मुश्ताक़ (बांग्लादेश से)

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प्रधानमंत्री बनने के बाद से नरेंद्र मोदी बांग्लादेश में किसी ना किसी बहाने से चर्चा में रहते हैं. यहां के आम लोग, विशेषज्ञों और राजनेताओं की नज़र में भाजपा सरकार, बांग्लादेश के लिए एक 'मुश्किल' सहयोगी है.
सत्तारूढ़ अवामी दल और मुख्य विपक्षी दल बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) दोनों में ही नरेंद्र मोदी से अच्छे संबंध बनाने की होड़ सी लगी है.
मौजूदा सरकार भारत को यह संदेश देना चाहती है कि भारत के उत्तर पूर्व के सात राज्यों में अलगाववादी मुद्दों को हवा देने में उसकी कोई दिलचस्पी नहीं है.
बांग्लादेश के साथ हुए सीमा समझौते के प्रति सकारात्मक रुख अपना कर मोदी ने साफ़ संदेश दिया है और दूसरी तरफ बांग्लादेश ने भी रणनीतिक समझौतों को जारी रखा है.
दोनों देश बंगाल की खाड़ी में सोनादीया बंदरगाह की डील को लेकर भी सकारात्मक हैं.
अगर मोदी बांग्लादेश के साथ जलसंधि पर अपनी स्थिति साफ़ करते हैं तो दोनों देश के बीच दोस्ताना संबंध और मज़बूत हो सकते हैं.
अज़ाम अमीन (श्रीलंका से)

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मोदी की चुनावी जीत के बाद श्रीलंका के पूर्व राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे ने अपने यहाँ 'राष्ट्रीयता' और 'विकास' की नीति को फलते-फूलते हुए देखा.
उम्मीद जगी थी कि भारत के साथ श्रीलंका के संबंधों का नया अध्याय शुरू होने वाला है. खासतौर पर तमिल अल्पसंख्यकों के साथ सत्ता समझौते के सवाल पर.
हालांकि प्रधानमंत्री मोदी ने जल्दी ही अपने पूर्ववर्ती नेताओं का ही अनुसरण करते हुए तमिलों के लिए कुछ हद तक सत्ता हस्तांतरण की बात दोहराई.
इसका श्रीलंका के सत्ता के गलियारे में अच्छा संदेश नहीं गया. लेकिन जनवरी में महिंदा राजपक्षे की हार के बाद नई सरकार ने चीन के साथ महिंदा राजपक्षे की नीतियों को पलट कर भारत के साथ संबंधों को नई दिशा दी.
नए राष्ट्रपति मैथ्रिपाल सिरिसेना ने अपनी पहली विदेश यात्रा के रूप में भारत को चुना और उसके बाद मोदी ने मार्च 2015 में श्रीलंका की यात्रा की.
इससे दोनों देशों के बीच संबंधों में थोड़ी गर्माहट आई है.
सुरेंद्र फ़ुयाल (नेपाल से)

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नेपाल के लोग शुरू से ही मोदी के नेपाल के प्रति रुख से प्रभावित रहे हैं. कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि वे नेपाल में बढ़ते चीनी प्रभाव के मद्देनज़र नेपाल के साथ संबंधों में नए सिरे से जान फूंकना चाहते हैं.
भारत के साथ नेपाल का संबंध सांस्कृतिक, धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व का है. चाहे कोई भी वजह हो, लेकिन नेपाल में बहुत से लोग मोदी से अब भी काफ़ी प्रभावित लगते हैं.
हाल में नेपाल में आए भूकंप के बाद इस बाद की आशंका ज़ाहिर की गई थी कि भारत सरकार राहत और पुनर्निमाण कार्यों में ज्यादा दखलअंदाजी कर सकती है.
भूकंप की कवरेज करने नेपाल गए भारतीय मीडिया पर भड़के गुस्से को इसी संदर्भ में देखना चाहिए.
अंबर रहीम शम्सी (पाकिस्तान से)

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जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शपथ ग्रहण समारोह में नवाज शरीफ़ शरीक हुए तो भारत-पाकिस्तान के बीच संबंधों की एक नई शुरूआत की उम्मीद जगी थी.
लेकिन इसके छह महीने बाद नेपाल में सार्क देशों की बैठक में इन दोनों नेताओं के बीच तल्खी साफ़ दिखी थी.
पिछले साल नए संबंधों की उम्मीद की किरण उस समय धूमिल हो गई जब सीमा पर दोनों तरफ से गोलीबारी की घटना हुई और जिसमें दोनों तरफ से कई लोग मारे गए.
इस बीच कश्मीरी अलगाववादी नेताओँ के साथ पाकिस्तान के राजदूत की मुलाकात के कारण भारत ने सचिव स्तर की वार्ता रद्द कर दी.
इस साल मार्च में भारतीय विदेश सचिव के दौरे से हालात फिर से सुधरते नज़र आए.

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ऐसा लगता है कि नवाज़ शरीफ़ दोस्ती का हाथ बढ़ाने को लेकर निराश हैं. एक सउदी अखबार को दिए साक्षात्कार में नवाज़ शरीफ़ ने अपनी निराशा जताते हुए कहा, "भारत के साथ अच्छे रिश्तों की हमारी इच्छा को सही प्रतिक्रिया नहीं मिल रही है."
पाकिस्तान की सेना का भी ऐसा मानना है कि वहां हो रही चरमपंथी घटनाओं में भारत की खुफिया एजेंसी रॉ का हाथ है.
यह चिंता पाकिस्तान की विदेश नीति में भी दिख रही है. हालांकि अभी भी हर किसी ने बेहतर संबंध की उम्मीद नहीं छोड़ी है.
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