मैं मरूंगी नहीं, लिखूंगीः शर्मीला सैयद

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- Author, इमरान क़ुरैशी
- पदनाम, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
ऐसा लगता है कि बांग्लादेश और भारत के बाद, मुस्लिम कट्टरपंथी अब श्रीलंका में अभिव्यक्ति की आज़ादी पर अपना ग़ुस्सा निकाल रहे हैं.
पूर्वी श्रीलंका की एक तमिल मुस्लिम लेखिका शर्मीला सैयद को निर्वासन में रहने पर मजबूर होना पड़ रहा है.
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सैयद का अपराध सिर्फ़ इतना था कि उन्होंने एक साक्षात्कार के दौरान रिपोर्टर के सवाल के जवाब में कहा था कि देह व्यापार को क़ानूनी बनाने से सेक्स वर्कर्स को सुरक्षा देने में मदद मिलेगी.
इस साक्षात्कार को बीबीसी तमिलओसाई रेडियो पर प्रसारित हुए ढाई साल हो चुके हैं, लेकिन शर्मीला को अब भी सोशल मीडिया पर निशाना बनाया जा रहा है.
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मन्नार वुमेन्स डेवेलपमेंट फ़ेडरेशन (एमडब्ल्यूडीएफ़) के संस्थापक सिथारा शरीन अब्दुल सरूर ने बीबीसी हिंदी को बताया, “सबसे बुरी बात यह है कि उन्होंने इस्लाम के बारे में कुछ नहीं कहा था. लेकिन उनके परिवार को भी निशाना बनाया गया.”
एमडब्ल्यूडीएफ़ श्रीलंका में युद्ध की शिकार महिलाओं के लिए काम करता है.
उस साक्षात्कार के बाद शर्मीला को सोशल मीडिया पर ‘बलात्कार किया गया’ और ‘हत्या किया हुआ’ दिखाने की हद तक निशाना बनाया गया.
जब यह विवाद खड़ा हुआ तो इसके तुरंत बाद उन्होंने स्पष्टीकरण जारी किया. इसके बावजूद मुस्लिम धर्मगुरुओं ने इस मुद्दे पर माफ़ी मांगने के लिए उनके परिवार पर दबाव डाला.
'वो बौखला गए हैं'

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शर्मीला अपनी इस बात से डिगी नहीं कि उन्होंने धर्म के ख़िलाफ़ कुछ भी नहीं कहा है और एक सामाजिक समस्या के सवाल का उन्होंने सिर्फ़ जवाब दिया था.
शर्मीला को निर्वासन में जाना पड़ा और उनके परिवार को भी वहां से हटना पड़ा. लेकिन, ये परिस्थितियां भी उन्हें कुछ महीने पहले प्रकाशित उनके नए उपन्यास 'उम्मत' में कट्टरपंथियों की आलोचना से रोक नहीं पाईं.
इस बार, सोशल मीडिया पर श्रीलंका, तमिलनाडु और पश्चिमी एशिया से बहुत ही संगठित रूप में उन्हें निशाना बनाया गया. कुछ सप्ताह ऑनलाइन पर उनके 'बलात्कार' और 'हत्या' तक की बातें की गईं. इस आशय वाली दो तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल हो गईं.
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अज्ञात स्थान से शर्मीला ने फ़ोन पर बीबीसी हिंदी को बताया, “वो मुझपर सवाल खड़े कर रहे हैं क्योंकि मैं सिर नहीं ढंकती. इसलिए, वो बौखला गए हैं कि मुस्लिम महिला को कैसा होना चाहिए, इस मुद्दे पर मैं उनकी धुन पर नाच नहीं रही. मैं मुस्लिम के रूप में पैदा हुई और पली बढ़ी. मैं मुस्लिम धर्म के रीति रिवाजों को मानती हूँ.”
पूर्वी श्रीलंका में बट्टीकालोआ में एरावुर की रहने वाली शर्मीला के उपन्यास 'उम्मत' से पहले दो कविता संग्रह आ चुके हैं.
अभिव्यक्ति की आज़ादी

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शर्मीला मानती हैं, “अभिव्यक्ति की आज़ादी पर समझौता नहीं किया जा सकता. लेकिन धार्मिक विश्वासों पर सवाल खड़ा करना एक बड़ी चुनौती है. धार्मिक विश्वासों और समाज पर हम कैसे सवाल कर सकते हैं. दोनों में घालमेल हो गया है. धार्मिक विश्वासों में कोई तर्क नहीं है.”
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वो कहती हैं, “जैसे इन दिनों चलन में आई दहेज प्रथा इस्लामी संस्कृति का हिस्सा नहीं है, लेकिन फिर भी यह रस्म बन चुकी है. कई महिलाएं हैं जिन्हें दहेज का पैसा कमाने और एक अच्छा पति ख़रीदने के लिए विदेशों में घरेलू नौकरानी के रूप में काम करने के लिए ज़बरदस्ती भेजा जाता है. लेकिन कट्टरपंथी इस सामाजिक सच्चाई को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हैं और न ही इसका हल ढूंढने के लिए तैयार हैं.”
असहिष्णुता

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हाल ही में बांग्लादेश में एक लेखक और ब्लॉगर को मार दिया गया और मुंबई में एक उर्दू अख़बार की मुस्लिम महिला सम्पादक को शार्ली एब्डो के विवादित कार्टून की नक़ल के लिए तीखी आलोचना की गई.
लेकिन, मुस्लिम मुद्दों के जानकार, वरिष्ठ पत्रकार हसन सुरूर, पुराने विचारों वाले मुस्लिमों की बजाय उदार मुस्लिमों के रुख़ से ज़्यादा चिंतित हैं.
वो कहते हैं, “भारत के मुक़ाबले, पाकिस्तान के उदार मुस्लिमों में दख़ल देने और खुलकर बोलने की ज़्यादा प्रवृत्ति है. यह असहिष्णुता पूरे दक्षिण एशिया को अपने गिरफ़्त में ले रही है, जबकि यहां इस्लाम बहुत विनम्र और सहिष्णु है.”
सुरूर को ख़ुद सोशल मीडिया पर आलोचना और निशाना बनाए जाने का शिकार होना पड़ा.
व्याख्याओं

उन्होंने हाल ही में एक बड़े अख़बार में लिखे अपने लेख में मौजूदा आत्मघाती रास्ते से हटने का तर्क दिया था.
उन्होंने लिखा था, “जिस चीज़ को सबसे पहले ख़त्म करने की ज़रूरत है वो है, पूरे इस्लाम के बारे में एक ही नज़रिया थोपने के विचार से निजात पाना.”
सुरूर कहते हैं, “पवित्र क़ुरान की कई व्याख्याएं हुई हैं. इसके कुछ अस्पष्ट आयतों का कट्टरपंथी दुरुपयोग करते हैं. मेरा मानना है कि इस्लाम के विद्वानों को सही संदर्भों में इन आयतों की व्याख्या करने की ज़रूरत है.”
उनके अनुसार, “हर कोई सोचता है कि इस्लाम एक हिंसक धर्म है और यह शांति का धर्म नहीं है क्योंकि यह वही है, जो पूरी दुनिया में मुस्लिम कर रहे हैं.”
'मैं लिखूंगी'

कुछ समय पहले ही तमिल लेखक पेरुमल मुरुगन ने अपने ख़िलाफ़ कट्टरपंथियों के हिंसक प्रदर्शनों से नाराज़ होकर एक लेखक के रूप में अपनी मौत की घोषणा कर दी थी.
मुरुगन की किताब छापने वाले प्रकाशक कानन सुंदरम कहते हैं, “यह एक महिला और उसकी ज़िंदगी जीने के तौर-तरीकों पर हमला है. यह स्वाभाविक है कि एक महिला जो अपने उसूलों पर जी रही है, पुरुष यह बर्दाश्त नहीं कर सकते.”
शर्मीला उन लोगों को पहचान नहीं सकतीं, जो उन्हें निशाना बना रहे हैं, लेकिन उन्हें संदेह है कि इसके पीछे कोई समूह है, न कि कुछ व्यक्ति.
वो कहती हैं, “मुझे पक्का यक़ीन है कि ये श्रीलंका के हैं, क्योंकि जिस तरह की भाषा का वो इस्तेमाल कर रहे हैं, उससे पता चलता है कि वो पूर्वी श्रीलंका के हैं.”
लेकिन क्या मुरुगन की तरह वो भी अपने लेखक की मौत होने की घोषणा करेंगी, वो कहती हैं, “नहीं, अपनी सभी मुश्किलों के साथ मैं लिखना जारी रखूंगी.”
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