ओडिशाः कांग्रेस के पास कोई नुस्खा नहीं!

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- Author, संदीप साहू
- पदनाम, भुवनेश्वर से बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
बुधवार की शाम ओडिशा के पूर्व मुख्यमंत्री जानकी बल्लभ पटनायक का अंतिम संस्कार पुरी के स्वर्गद्वार में संपन्न हो गया.
कई कांग्रेसियों का मानना है कि उनके पार्थिव शरीर के साथ राज्य में पार्टी के पुनरुत्थान की रही सही उम्मीदें भी चिता में जल कर राख हो गईं.
इसे विडम्बना ही कहा जाना चाहिए कि लगातार चार बार चुनाव हारकर पूरी तरह से हताश और निराश हो चुकी कांग्रेस एक 89 वर्ष के नेता से पार्टी को दिशा देने की आस लगाए बैठी थी.
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यह बात जहाँ यह साबित करती है कि पार्टी के राज्य स्तरीय नेताओं में जेबी पटनायक के मुकाबले का कोई नेता नहीं है, वहीँ कांग्रेस की खस्ता हालत को भी बयान करती है.
पिछले साल 11 दिसंबर को जब जेबी पटनायक असम के राज्यपाल के रूप में अपने पांच साल का कार्यकाल पूरा कर भुवनेश्वर वापस आए थे तो आम कांग्रेसियों का उत्साह देखते ही बनता था.
हवाई अड्डे से जब वे बाहर आए तो 'जेबी पटनायक ज़िंदाबाद' के नारे से पूरा इलाका गूंज रहा था.
राजनीति में वापस

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हवाई अड्डे से जब वे एक खुली गाड़ी में अपने निवास की ओर रवाना हुए तो हज़ारों कांग्रेसी कार्यकर्ता उनके आगे पीछे चल रहे थे.
खुद जेबी ने भी स्पष्ट संकेत दिए थे कि वे सक्रिय राजनीति में वापस आएंगे. उन्होंने कहा था, "मैं राजनीति में था, हूँ और रहूँगा."
उनके इस बयान से आम कार्यकर्ताओं के मन में एक विश्वास पैदा हो गया कि अब बीजद सुप्रीमो और मुख्यमंत्री को चुनौती देने वाला कोई आ गया है.
गुटबाज़ी से परे

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आखिर ऐसा क्या था जेबी में जो दूसरे नेताओं में नहीं था?
मैंने यही सवाल युवा नेता मनोरंजन दास से पूछा तो वो बोले, "हमारी पार्टी में वे अकेले ही ऐसे नेता थे जो गुटबाज़ी से परे थे. अपनी वरिष्ठता और राजनैतिक सूझबूझ के कारण वे सभी गुटों के नेताओं को मान्य थे."
कांग्रेस के नेता और आम कार्यकर्ता भले ही उन्हें पार्टी के तारणहार मानते हों लेकिन राज्य में ऐसे लोगों की कमी नहीं है जिनका मानना है कि जेबी समस्या का हल नहीं बल्कि समस्या की जड़ थे.
राजनीति की गिरावट

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उनका दावा है कि आज कांग्रेस अगर खस्ता हालत में है तो इसके कारण हैं उनके 14 साल के मुख्यमंत्री बने रहने के समय परिवारवाद, भ्रष्टाचार और राजनीति की गिरावट.
ऐसे विचार रखने वालों में एक हैं जाने माने सामाजिक कार्यकर्ता और 'अग्रगामी' के प्रमुख अच्युत दास.
वे कहते हैं, "आज ओडिशा की राजनीति में जो विकृतियां नज़र आ रहीं हैं, उनकी शुरुआत 80 और 90 के दशकों में जेबी ने ही की थी."
जेबी के बिना

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केवल अच्युत दास ही नहीं, कई लोगों का मानना है कि सत्ता में आने और सत्ता में बने रहने के लिए जेबी ने जायज़, नाजायज़, नैतिक, अनैतिक हर हथकंडे का इस्तेमाल किया.
लेकिन जेबी के समर्थकों को उन्हें पार्टी की बुरी हालत के लिए उन्हें जिम्मेदार ठहराया जाना बिल्कुल मंज़ूर नहीं.
जेबी के अंतिम दर्शन के लिए मंगलवार को उनके निवास पर पहुंचे एक कार्यकर्ता ने कहा, "अगर यही बात है तो फिर पांच साल की उनकी गैरहाज़िरी (जब वे असम के राज्यपाल थे) में पार्टी और नीचे क्यों चली गई? साल 2009 के चुनाव में पार्टी को 27 सीटें मिली थीं और 2014 में मिली केवल 16. ऐसा क्यों?"
कांग्रेस का नुस्खा

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सच तो यह है कि ओडिशा में कांग्रेस की गिरती साख का कारण कोई कांग्रेसी नेता नहीं बल्कि राज्य की राजनीति में नवीन पटनायक का उदय है.
नवीन का मुक़ाबला करने के लिए कांग्रेस के पास कोई नुस्खा नहीं है.
जब तक पार्टी ऐसा कोई नुस्खा तैयार नहीं कर लेती, नेता चाहे कोई भी हो, पार्टी गड्ढे से ऊपर नहीं निकल सकती.
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