डूबते लेफ़्ट को येचुरी का सहारा!

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सीताराम येचुरी मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के नए महासचिव चुन लिए गए हैं.
सीपीएम के पांचवें महासचिव के तौर पर येचुरी का चयन निर्विरोध हुआ है. इसके साथ ही वामदलों की इस अगुवा पार्टी के चौथे महासचिव प्रकाश करात का युग खत्म हो गया.
नए महासचिव के सामने कई ऐसी चुनौतियां होंगी जिनसे उनकी पार्टी जूझ रही है. एक तबके में सीपीएम को बुजुर्गों की पार्टी के तौर पर देखा जाता है.
बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्यों में पार्टी ने अपनी ज़मीन खो दी है. संसदीय राजनीति में भी वाम दलों की जगह सिकुड़ रही है.
पार्टी का विस्तार किस तरह से किया जाए और नौजवानों को पार्टी से कैसे जोड़ा जाए ये बड़ी चुनौती है.
नए चेहरे

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विशाखापत्तनम में पार्टी की 21वीं कांग्रेस के अंतिम दिन रविवार को पार्टी महासचिव प्रकाश करात ने उनका नाम प्रपोज़ किया और पार्टी की सेंट्रल कमेटी ने उन्हें तीन साल के लिए पार्टी महासचिव चुना.
हालांकि सीताराम येचुरी नए महासचिव चुन लिए गए हैं लेकिन इस पद के लिए एस रामचंद्रन पिल्लई का नाम भी चर्चा में था.
एक ओर जहां रामचंद्रन सीपीएम के ज़िला स्तर के कैडर से उठकर पोलित ब्यूरो तक पहुंचने वाले नेता माने जाते हैं, वहीं येचुरी की जड़ें छात्र राजनीति में रही हैं.
21वीं कांग्रेस में पार्टी को युवाओं के बीच और हिंदी पट्टी में फिर से खड़ा किए जाने की बात भी उठी.
और ये सवाल भी सियासी हलकों में चलता रहा कि 90 के दशक के उत्तरार्द्ध में राष्ट्रीय राजनीति पर दबदबा रखने के बावजूद करात के दस साल के कार्यकाल में सीपीएम कहां से फिसल कर कहां आ गई.
प्रकाश युग

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करात की सीपीएम के लिए बुरे वक्त की शुरुआत शायद यूपीए-वन की सरकार से समर्थन वापस लेने के साथ शुरू हुई.
पार्टी के वरिष्ठ नेता सोमनाथ चटर्जी ने प्रकाश करात की इच्छा के विरुद्ध लोकसभा स्पीकर पद से इस्तीफ़ा देने से इनकार कर दिया.
और इस पूरे प्रकरण में पार्टी को ख़ासी शर्मिंदगी का सामना करना पड़ा.
न्यूक्लियर डील के मुद्दे पर मतभेदों की वजह से यूपीए-वन से समर्थन लेने के फैसले की कीमत भी पार्टी को 2009 में चुकानी पड़ी.
इस लोकसभा चुनाव में पार्टी की सीटें 43 से घटकर 16 रह गईं और उसके बाद 2014 में मोदी लहर में सीपीएम को महज नौ सीटों से संतोष करना पड़ा.
सुरजीत का दौर

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तब संयुक्त मोर्चा सरकारों का ज़माना था और पार्टी के तीसरे महासचिव हरकिशन सिंह सुरजीत के कार्यकाल को सीपीएम के लिए एक तरह से स्वर्ण युग के तौर पर देखा जाता है.
वीपी सिंह, देवेगौड़ा, गुजराल और मनमोहन सिंह की सरकारों को सीपीएम ने बाहर से समर्थन दिया और संसद में पार्टी की ताकत बढ़ती रही.
1996 में ज्योति बसु भले ही प्रधानमंत्री बनने से रह गए पर 2004 में यूपीए-वन की सरकार को दिए समर्थन की एवज में सोमनाथ चटर्जी लोकसभा अध्यक्ष बन गए.
कॉमरेड सुरजीत से पहले ईमएस नंबूदरीपाद और पी सुंदरैया सीपीएम के महासचिव रह चुके हैं.
बड़ी गलतियां!

ज्योति बसु ने सार्वजिनक तौर पर ये स्वीकार किया था कि पार्टी ने 1996 में प्रधानमंत्री पद की पेशकश ठुकरा कर ऐतिहासिक भूल की थी.
सीपीएम ने इस मौके को अपनाया होता तो वाम पार्टियों को पश्चिम बंगाल, केरल और त्रिपुरा के बाहर अपने जनाधार के विस्तार का मौका मिला होता.
कई हलकों में ये सवाल उठता रहा है कि आखिर क्यों वामदल इन गिन चुने राज्यों के बाहर अपना विस्तार नहीं कर पाई.
हिंदी पट्टी के राज्यों में भी वामदलों ने अपनी राजनीतिक ज़मीन मंडल की ताकतों के हाथों गंवा दी.
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