क्या भारत से ऊँट खत्म हो जाएंगे?

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- Author, कपिल भट्ट
- पदनाम, जयपुर से, बीबीसी हिन्दी के लिए
ऊँटों को राजस्थान की जीवनरेखा माना जाता रहा है लेकिन ऊँटों की तेज़ी से कम होती आबादी के कारण ये जीवनरेखा हर दिन पहले से छोटी होती जा रही है.
साल 2012 में भारत की 19वीं पशुगणना की गई जिसमें 2007 की तुलना में ऊँटों की आबादी में 22.48 प्रतिशत की गिरावट आई है. अब देश में क़रीब चार लाख ऊँट ही रह गए हैं. देश में ऊँटों की कुल आबादी के 81.37 प्रतिशत ऊँट राजस्थान में पाए जाते हैं.
2012 की पशुगणना में राजस्थान में ऊँटों की संख्या 3.25 लाख रह गई है. हालांकि लोकहित पशुपालक संस्थान के अध्यक्ष हनवंत सिंह राठौड़ मानते हैं कि राज्य में अब दो लाख से भी कम ऊँट बचे हैं.
सरकारी आंकड़ों की भी मानें तो राज्य में पिछे 15 सालों में ऊँटों की संख्या क़रीब आधी हो गई है.
ख़त्म हो सकते हैं?

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ऊँटों की संख्या में आई इस तेज़ गिरावट को देखते हुए यह सवाल भी खड़ा हो गया है कि क्या एक दिन भारत से ऊँट समाप्त हो जाएंगे?
ऊँटों के संवर्द्धन और संरक्षण की दृष्टि से केंद्र सरकार ने बीकानेर में 1984 में नैशनल रिसर्च सेंटर ऑन कैमल की स्थापना की थी.
संस्थान के निदेशक डॉ. नितिन वसंत पाटिल मानते हैं कि ऊँटों की संख्या में आई इस गिरावट का कारण है दैनिक जीवन में इनकी उपयोगिता अब बहुत कम रह गई है.
खेती और यातायात के क्षेत्र में हुए मशीनीकरण ने ऊँट को हाशिए पर धकेल दिया है. वहीं ऊँट पालने वाली राईका आदि जातियां आर्थिक दिक्कतों के कारण ऊँट पालन का पेशा छोड़ रही हैं.
तेज़ी से कम होते चारागाहों की वज़ह से ऊँट पालन एक महंगा व्यवसाय हो गया है.
राजस्थान से होने वाली ऊँटों की तस्करी भी उनकी संख्या कम होने के पीछे एक प्रमुख कारण है.
'पीपुल्स फॉर एनीमल्स' राजस्थान के अध्यक्ष बाबूलाल जाजू बताते हैं, "तस्करी का यह जाल राजस्थान के थार रेगिस्तान से शुरू होकर उत्तर प्रदेश से बांग्लादेश होता हुआ खाड़ी देशों तक फैला हुआ है. ऊँट का मांस, उसकी हडिडयाँ, खाल और बाल तक की माँग रहती है."
सरकारी उपाय

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राजस्थान सरकार ने ऊँटों की तेज़ी से कम होती संख्या को देखते हुए हाल ही में एक क़ानून बनाकर ऊँट को मारने पर पाँच साल तक की सज़ा का प्रावधान किया है. सरकार ने इसे राज्य पशु का दर्जा भी दिया है.
राजस्थान के पशुपालन मंत्री प्रभुलाल सैनी कहते हैं, "इस क़ानून का उद्देश्य ऊँटों का संरक्षण और संवर्धन करना है."
लेकिन ऊँटों के संरक्षण के काम में लगे लोग सरकार के नए क़ानूनों को ही कटघरे में खड़ा करते हुए इन्हें ऊँट विरोधी बता रहे हैं.
हनवंत सिंह राठौड़ कहते हैं, "अब तो ऊँट को नकेल डालना भी क़ानून के ख़िलाफ़ हो गया है. राज्य के करीब सात हज़ार ऊँट पालक परिवारों के सामने रोजी रोटी का संकट खडा हो गया है."
राज्य पशु बनने के बाद

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राठौड़ दावा करते हैं कि जब से सरकार ने ऊँट को राज्य पशु घोषित किया है तब से राजस्थान में करीब एक लाख ऊँट कम हो गए हैं.
बहरहाल, नैशनल रिसर्च सेंटर ऑन कैमल और लोकहित पशुपालक संस्थान जैसे संस्थान ऊँटनी के दूध एवं इससे बनने वाले उत्पादों को आम लोगों में लोकप्रिय बनाने के काम में लगे हुए हैं.
ऊँटनी के दूध से आइसक्रीम, सुगन्धित दूध एवं दही जैसे उत्पाद बनाए जा रहे हैं ताकि ऊँटों की उपयोगिता बनी रहे. लेकिन क्या ये उपाय रेगिस्तान के जहाज़ को बचाने के लिए काफ़ी होंगे?
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