ये बिहारी कुंवारे ही रह जाएंगे

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- Author, नीरज सहाय
- पदनाम, पटना से, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को अक्सर बिहार को सड़कों का मुँह वापस दिखाने का श्रेय दिया जाता है.
लेकिन राजधानी पटना से महज 250 किलोमीटर दूर एक पंचायत ऐसी भी है जहाँ गाँववालों का दावा है कि सड़क न होने से यहाँ के ज़्यादातर युवक-युवतियाँ कुंवारे हैं.
बिहार के कैमूर ज़िले के बड़वान कला और बड़वान खुर्ज गाँव में खरवार और चीरो आदिवासी बहुसंख्यक हैं.
पंचायत के पूर्व मुखिया राम दयाल सिंह खरवार कहते हैं, "गाँव के क़रीब 120 लड़के और लड़की कुँवारे हैं."
शादी न होने की वजह पूछने पर खरवार कहते हैं, "सड़क के अभाव में नीचे के लोग गाँव में शादी करने से इनकार करते हैं.
एक <link type="page"><caption> अध्ययन</caption><url href="http://www.medindia.net/health_statistics/general/marriageage.asp" platform="highweb"/></link> के मुताबिक भारत में पुरुषों की औसत विवाह आयु 26 साल और महिलाओं की 22.2 साल है. लेकिन इस गाँव में अधेड़ उम्र के कई कुँवारे मिल जाते हैं.
सड़क नहीं तो शादी नहीं

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सड़क न बन पाने की मुख्य वजह है कि ये गाँव ऊंची पहाड़ी पर बसे हैं और चारों तरफ़ जंगल से घिरे हुए हैं.
गाँव के लोगों को किसी भी काम के लिए स्थानीय बाज़ार तक जाने के लिए पहाड़ी से पैदल उतरना पड़ता है. इसलिए मैदानी इलाक़े के लोग यहाँ अपने बेटे-बेटियों की शादी करने से कतराते हैं.
खरवार कहते हैं, "इस साल के लगन में एक भी शादी नहीं हुई. पिछले साल दो शादियाँ हुई थीं."
खरवार के अनुसार अगर गाँव में कुछ लोग अदल-बदल कर शादी कर रहे हैं. यानी लड़की या लड़के की शादी के बदले में अपने लड़के या लड़की की शादी की जा रही है.
गाँव के 30 साल के कुँवारे युवक दिनेश कुमार सिंह कहते हैं, "आज़ाद रहते हुए भी हम आज़ादी महसूस नहीं कर पा रहे हैं. कुँवारा कौन रहना चाहता है?
पहाड़ी के नीचे बसे भगवानपुर इलाक़े के मंजीत मिश्रा की बहन की शादी बड़वान कला गाँव में तय हुई थी.
मंजीत कहते हैं, "बहन की शादी तय होने पर वहाँ गया तो घंटों पहाड़ पर चढ़ना पड़ा. गाँव में पानी और रहने का प्रॉब्लम है. इसलिए ब्याह कट गया."
सड़क बनाने की कोशिश

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इन गाँवों में कुँवारे रह जाने की समस्या ज्यों-ज्यों बढ़ती गई गाँववालों की राज्य या केंद्र सरकार से सड़क की उम्मीद भी त्यों-त्यों कम होती गई.
सरकार से निराश गाँववालों ने साल 2008 में अपने बलबूते पर सड़क बनाने की ठानी.
दिनेश कुमार सिंह ने बताया, "कुँवारेपन से निजात पाने के लिए ही हम चट्टान से लड़ रहे हैं."
गाँववालों ने सात साल में पहाड़ी काटकर क़रीब छह किलोमीटर लंबी एक कच्ची सड़क बनाई है.
सड़क बनाने में शामिल गाँव के परमा सिंह खरवार कहते हैं, "हम पहाड़ तोड़ते-तोड़ते थक चुके हैं. दुनिया कहाँ से कहाँ जा चुकी है और हम सड़क के लिए संघर्ष कर रहे हैं. लेकिन, हम हिम्मत नहीं हारे हैं."
ये गाँव सासाराम संसदीय क्षेत्र में आते हैं जो अनुसूचित जाति के लिए सुरक्षित सीट है.
दलित नेताओं का गढ़

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वरिष्ठ दलित कांग्रेसी नेता जगजीवन राम यहाँ से आठ बार सांसद रह चुके हैं. उनकी बेटी और लोक सभा की पूर्व अध्यक्ष मीरा कुमार भी यहाँ से दो बार सांसद रह चुकी हैं.
2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा के छेदी पासवान, मीरा कुमार को हराकर तीसरी बार यहाँ के सांसद बने. लेकिन इन गाँवों के हालात नहीं बदले.
गाँव की निवासी 40 वर्षीय फुलझड़ी देवी कहती हैं, "हमारे बाल-बच्चे कुँवारे रह जाते हैं लेकिन सरकार को यह दिखाई नहीं देता."
पहाड़ बसे इन गाँवों के लोगों के लिए शादी एक पहाड़ बन चुकी है. जब हमने इस बारे में गाँव की कुँवारी लड़कियों से बात करना चाहा, तो कोई लड़की बात करने को तैयार नहीं हुई.
सड़क और पानी से महरूम इन गाँवों के लिए बिजली तो अब भी दिल्ली जितनी दूर है. सड़क, बिजली, पानी नहीं तो शादी भी नहीं.
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