पटना में भिखारियों का 'अनोखा नाट्य दल'

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- Author, सीटू तिवारी
- पदनाम, पटना से, बीबीसी हिन्दी डॉटकॉम के लिए
वो अपनी साड़ी के पल्लू में मुंह छिपाकर हंसती है. रिहर्सल में अगर उनका मन नहीं है तो बार-बार समझाने के बाद भी संवाद नहीं बोलती.
एक अभिनेता का डॉयलॉग पूरा हो जाने के बाद दूसरा अभिनेता बहुत उकसाने पर बोलता है. कड़ाई से कुछ बोल दीजिए तो साफ़ कह देती हैं कि नाटक करना हमारे बस का नहीं.
लेकिन अगले पल मान मनौव्वल के बाद ये अनपढ़ औरतें नाटक करने को तैयार हो जाती हैं. अभिनय के किसी मापदंड को पूरा नहीं करने वाला ये <link type="page"><caption> नाट्य दल</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2010/04/100404_beggar_change_mb" platform="highweb"/></link> भिखारियों का है.
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इनकी प्रस्तुति आपको बेरंग लग सकती है. लेकिन एक पल को ये जानकर आप हैरान रह जाएंगे कि भिखारियों ने भिक्षावृत्ति मिटाने के लिए ये नाट्य दल तैयार किया है.
बिहार की <link type="page"><caption> राजधानी पटना</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2009/10/091030_beggar_right_awa" platform="highweb"/></link> में ये छोटी सी कोशिश हो रही है. संस्था 'शांति कुटीर' ने भिक्षावृत्ति को रोकने के लिए ये तरीका निकाला है.
संस्था भिखारियों को ही नाटक सिखाती है और ये नाट्य दल शहर की उन सार्वजनिक जगहों पर नाटक करता है जो भिखारियों के अड्डे हैं.
नुक्कड़ नाटक

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50 साल की मीना इसी नाट्य दल की सदस्य हैं.
शराब की लत का शिकार रही मीना बताती हैं, "शुरू में बहुत गुस्सा आता था. लेकिन अब मन शांत रहता है. अच्छा कपड़ा पहनते हैं, अच्छे से खाना खाते हैं."
भिखारियों के इस नाट्य दल में सात भिखारी हैं. पटना शहर के कई हिस्सों में नुक्कड़ नाटक 'जिसे कल तक देते थे बददुआ, उसे आज देते हैं दुआ' कर चुके हैं.
संस्था बिहार दिवस 2015 के मौके पर भी नाटक कर चुकी है.
काउंसलिंग

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बिहार सरकार की भिखारियों को मुख्यधारा में लाने की पहल के तहत संस्था ने जून 2014 में भिखारियों के एक समूह को नाटक सिखाना शुरू किया था.
शुरुआत में नाट्य दल तैयार करने के लिए संस्था के ट्रेनर दिग्विजय ने भिखारियों की कांउसलिंग की.
दिग्विजय बताते हैं, "हम लोगों ने तीन–चार बार हर एक से बात की और उसके बाद हमने कुछ लोगों को छांटा जो कम से कम संवाद अदायगी कर सकते हों."
नाटक के संवाद

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दिग्विजय ने कहा, "दरअसल, खराब हालात में लगातार रहने को मजबूर ये लोग सामान्य व्यवहार नहीं करते. दूसरा यह कि नाट्य दल के सभी सदस्य अनपढ़ हैं, ऐसे में नाटक के संवाद याद करना लगभग नामुमकिन है."
वे कहते हैं, "चूंकि नाटक भिक्षावृत्ति से जुड़ा हुआ है, इसलिए उन्हें इन परिस्थितियों को अपने अनुभवों से जोड़ने में ज्यादा मुश्किल नहीं होती. वो खुद संवाद अपने मन में तैयार करते हैं और बोलते हैं."
इस नाट्य दल में 10 साल से लेकर 70 साल तक की उम्र की औरतें शामिल हैं.
कलाकारों का आत्मविश्वास

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फिलहाल शांति कुटीर में 68 महिला भिखारियों को रखा गया है और उनके पुनर्वास की कोशिशें की जा रही हैं.
कभी भीख मांगने वाली सविता जब अपने साथियों को नाटक करते देखती है तो रोमांच से भर जाती है.
सविता कहती हैं, "हमें भी नाटक करने का मन करता है, लेकिन बहुत लाज आती है बोलते हुए."
संस्था की निदेशक राखी शर्मा कहती हैं, "कलाकारों के बीच का तारतम्य, उनकी संवाद अदायगी, हो सकता है कि आपको खूबसूरत न लगें. लेकिन इनके जीवन में आ रहे बदलाव और इनका आत्मविश्वास बहुत खूबसूरत है."
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