जब किसानों ने ज़मीन देने के लिए दिया धरना

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- Author, रोहित घोष
- पदनाम, कानपुर से, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
वर्तमान में कांग्रेस सहित लगभग सभी विपक्षी दल भूमि अधिग्रहण क़ानून में संशोधन के सख़्त ख़िलाफ़ हैं.
दूसरी तरफ, अन्ना हज़ारे ने भी संशोधनों को किसान विरोधी बताते हुए पूरे देश में पदयात्रा करने की बात कही है.
तमाम तरह की चिंताओं के बीच माहौल ऐसा बना है मानों किसान किसी भी कीमत पर अपनी ज़मीन बेचने को तैयार नहीं है और सरकार परियोजनाओं के लिए ‘जबरन’ किसानों की ज़मीन छीन लेगी.
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लेकिन उत्तर प्रदेश के रायबरेली इलाके में एक ऐसा उदाहरण मौजूद है जो इसके उलट तस्वीर पेश करता है.
रायबरेली के किसान एक रेल कोच कारखाने के निर्माण के लिए ज़मीन देने के लिए न सिर्फ धरने पर बैठे, बल्कि उच्च न्यायालय तक पहुँच गए.
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कहानी शुरू होती है 2004 के आम चुनावों से.
2004 में कांग्रेस के नेतृत्व में यूपीए ने केंद्र में सरकार बनाई. कांग्रेस प्रमुख सोनिया गाँधी तब रायबरेली से सांसद चुनी गई थीं.
एक स्थानीय कांग्रेसी नेता महेश शर्मा कहते हैं, "सोनिया गाँधी जैसे ही रायबरेली से जीतीं, क्षेत्रीय नेताओं और लोगों ने उन पर दबाव बनाया कि वह रायबरेली में कोई एक बड़ा कारखाना लगवाएं जिसमें हज़ारों लोगों को नौकरी मिल सके. एक बड़ी बिस्किट फैक्ट्री लगाने की बात हुई."
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शर्मा कहते हैं, "रायबरेली में मुख्यतः गेहूँ का उत्पादन होता है. यहाँ उगाए गए गेहूँ की बिस्किट फैक्ट्री में ही ख़पत हो जाती, स्थानीय लोगों को रोज़गार भी मिलता. पर बात बनी नहीं. बात किसी तरह रेल कोच बनाने वाले एक कारखाने पर आ कर रुकी."
लालगंज में ग्राम सभा की 100 हेक्टेयर के करीब ज़मीन का टुकड़ा ऊसर था और बेकार पड़ा था. लालगंज के निवासियों ने केंद्र से आग्रह किया कि इस ज़मीन को केंद्र सरकार अधिग्रहित कर ले.
नौकरी और मुआवज़ा

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किसानों ने यहां तक कहा कि रेल कोच कारखाने के लिए जो ज़मीन कम पड़ेगी वह स्वयं देंगे.
लालगंज के किसान ज़मीन देने के लिए क्यों तैयार थे इसके कई कारण हैं.
किसान इस बात से खुश थे कि जो किसान ज़मीन देगा उसे मुआवज़ा तो मिलेगा ही साथ ही उसे या उसके घर में किसी को रेलवे में नौकरी भी मिलेगी.
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राम कुमार त्रिवेदी, जिनकी जमीन रेल कोच फैक्ट्री स्थापित करने के लिए ली गई, कहते हैं, "लालगंज की ज़मीन बहुत ज़्यादा उपजाऊ नहीं है. किसानों के पास ज़मीन के छोटे टुकड़े ही थे. किसानों के सामने खेती के लिए पानी एक बड़ी समस्या थी. जिस ज़मीन की क़ीमत 25,000 रुपए प्रति बीघा भी नहीं थी, उसके बदले केंद्र सरकार ढाई लाख रुपए प्रति बीघा देने को तैयार थी."
किसान अवनींद्र पाण्डेय कहते हैं, "लालगंज के किसान इसलिए अपनी ज़मीन देने को तैयार थे, क्योंकि उन्हें लग रहा था की मुआवज़ा अच्छा मिलेगा. अगर मुआवज़ा अच्छा मिलता है तो किसान अपनी ज़मीन बेचने को तैयार हो जाता है."
वो कहते हैं, "जिन इलाकों में खेती आमदनी का स्थाई ज़रिया नहीं है वहां ये और भी ज़्यादा लागू होता है. लालगंज में किसानों को अच्छा मुआवज़ा मिल ही रहा था साथ में पक्की सरकारी नौकरी भी."
अक्सर ये देखा गया है कि किसी परियोजना के नाम पर किसानों से ज़मीन ले तो ली जाती है पर परियोजना का काम वर्षों बाद भी शुरू नहीं होता है.
सोनिया गांधी पर भरोसा

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पाण्डेय कहते हैं, "लालगंज के किसानों को इस बात कर डर नहीं था. किसान जानते थे कि सोनिया गाँधी बड़ी नेता हैं और यूपीए की मुखिया भी. किसानों को विश्वास था की वह रेल कोच फैक्ट्री लगवा ही देंगी और और एक समय सीमा के अंदर उन्होंने लगवाई भी."
ज़मीन अधिग्रहण के मामले अक्सर राजनीति का शिकार भी होते हैं. रायबरेली में रेल कारखाना लगाने का तत्कालीन मायावती सरकार ने खासा विरोध किया.
लेकिन इसके विरोध में किसानों ने मिलकर इलाहाबाद उच्च न्यायलय की लखनऊ बेंच में एक याचिका दाखिल की कि जब किसान स्वयं ज़मीन देने को तैयार हैं तो किसी भी पक्ष को उसमें क्या आपत्ति है? किसानों को आखिरकार कोर्ट से मदद मिली.
रायबरेली रेल कोच कारखाने के अभियंता एलबी सिंह मौर्या के मुताबिक, "आधारशिला रखे जाने के आठ महीने के भीतर भूमि अधिग्रहण का काम पूरा कर लिया गया था."
मौर्या के अनुसार, रेलवे विभाग ने कुल 1434 किसानों की ज़मीन ली है.
मौर्या कहते हैं, "1106 लोगों को नौकरी दी जा चुकी है. शेष को नौकरियां दिए जाने की प्रक्रिया चल रही है. सभी नौकरियां चतुर्थ श्रेणी में दी गई हैं."
हालांकि नौकरी पाने वाले कुछ लोगों को इस बात का दुःख ज़रूर है की उन्हें अपनी योग्यता के अनुसार नौकरी नहीं मिली है.
बेकार ज़मीन का अधिग्रहण

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रेल कारखाने की कुल क्षमता हर साल 1000 कोच बनाने की है.
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हालाँकि अभी कारखाने में 200 कोच ही बन रहे हैं. ज़ाहिर है क्षमता बढ़ेगी तो नौकरियों की संख्या भी बढ़ेगी.
रायबरेली के वरिष्ठ पत्रकार राम मनोहर पाण्डेय के मुताबिक, "रायबरेली के किसानों से देश के उन किसानों को सबक लेना चाहिए जिनकी ज़मीन बहुत ज़्यादा उपजाऊ नहीं है."
"यहां किसानों ने अपनी स्वेच्छा से ज़मीन दी है. फर्क ये है यहां किसानों को विश्वास था कि ज़मीन अधिग्रहण के बाद उनको मुआवज़ा मिलेगा और नौकरी भी मिलेगी. साथ ही इलाके का विकास भी होगा."
रेल कोच कारखाना बनने के बाद लालगंज की मुरझाई मंडियों और बाज़ारों में फिर से रौनक आ गई है. कारखाने के पास ज़मीन की कीमतें अब आसमान छू रहीं हैं.
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