क्या आम आदमी पार्टी टूट की ओर बढ़ रही है?

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    • Author, ओम थानवी
    • पदनाम, संपादक, जनसत्ता

आम आदमी पार्टी की आज की स्थिति देखकर काफ़ी हताशा होती है. जो सिरफुटव्वल नज़र आ रही है वह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है.

लोग एक-दूसरे के बारे में बोलें इसमें कोई हर्ज़ नहीं है. एक पारदर्शी और प्रगतिशील पार्टी में तो इसकी भी छूट होनी चाहिए कि लोग पार्टी के ख़िलाफ़ भी बोलें. जो भी लोग पार्टी के ख़िलाफ़ बोलते हैं वह पार्टी के दुश्मन नहीं होते.

अगर अंदर के आदमी को आप दुश्मन मान लेंगे तो सवाल उठाने की परंपरा को आप ख़त्म कर देंगे. ऐसे में चापलूसों की जमात तैयार हो जाएगी. और ऐसी पार्टियां हमारे यहां पहले ही बहुत हैं.

इसलिए अलग तरह की पार्टी का जो ख़ाका पार्टी ने पेश किया था उसे इस सबसे ठेस पहुंची है.

'टूट जाएगी पार्टी'

 केजरीवाल

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केजरीवाल के बारे में मेरा मानना है कि वह बहुत अच्छे प्रशासक साबित हो सकते हैं और जितने वक्त रहे हैं उसमें साबित हुए भी हैं.

लेकिन सरकार चलाना अलग बात है और संगठन चलाना अलग बात. संगठन के मोर्च पर उन्होंने अब तक खुद को विफल साबित किया है -ख़ासतौर पर राजनीतिक मामलों की समिति से इन दोनों नेताओं को निकालने की जो कार्रवाई हुई है.

इस तरह से निकालना तो सबसे बड़ी सज़ा होती है. लेकिन फिर भी जो हुआ उसमें वह खुद मौजूद रह सकते थे.

वह दिल्ली में मौजूद थे और नहीं गए बैठक में- फिर उनके विश्वस्त लोगों ने जिस तरह से कार्रवाई की वह भी ख़राब था. और ऐसा भी नहीं था कि केजरीवाल को मालूम नहीं था कि क्या हो रहा है.

योगेंद्र यादव

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इसके अलावा उन्होंने दोनों पद अपने पास रखे हुए हैं. मुख्यमंत्री भी वह हैं और पार्टी के मुखिया भी.

सरकार नए ढंग से चलनी चाहिए थी तो पार्टी भी. पार्टी में जिन लोगों ने उन पर सवाल खड़े किए वह उनके अपने लोग थे.

उन लोगों की छुट्टी करने से क्या संदेश जाता है कि आप वही कीजिए जो केजरीवाल को अच्छा लगता है.

यह उसी किस्म की राजनीति होगी जिससे बचने के लिए लोगों ने उन्हें वोट दिया था.

प्रशांत भूषण

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अब भी अगर केजरीवाल पारदर्शी तरीके से चीजों को नहीं संभालते हैं तो पार्टी टूट की प्रक्रिया की तरफ़ ही बढ़ रही है.

आज दो लोग जा रहे हैं, कल दस जाएंगे, बीस निकाल दिए जाएंगे तो यह पार्टी वह पार्टी तो नहीं रह जाएगी जिसके लिए लोगों ने उन्हें सत्ता सौंपी है.

(बीबीसी संवाददाता निखिल रंजन से बातचीत पर आधारित)

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