क्या नीतीश भूमि सुधार लागू कर पाएंगे ?

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- Author, संजीव चंदन
- पदनाम, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
नीतीश कुमार एक बार फिर बिहार के मुख्यमंत्री बन चुके हैं.
पर क्या कारण है कि उन्होंने भूमि सुधार की अपनी महत्वाकांक्षी योजना को ठंडे बस्ते में डाल दिया है. अपने शुरुआती शासन में नीतीश ने भूमि सुधार का वादा करते एक आयोग का गठन किया था.
आयोग ने जातिगत संघर्षों के पीछे भूमि संबंधी असंतोष को जिम्मेदार बताया था लेकिन आयोग की रिपोर्ट को लेकर नीतीश के अपने भी विरोध करने लगे थे.
अब नई पारी में क्या मुख्यमंत्री नीतीश कुमार इसे लागू कर पाएँगे?
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नीतीश के पुराने दोस्त और तत्कालीन विधान पार्षद प्रेम कुमार मणि कहते हैं, "नीतीश कहा करते थे कि 'मैं वह काम करने जा रहा हूं, जो कम्युनिस्ट भी नहीं कर पाए."
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मणि सवाल उठाते हैं, "फिर ऐसा क्या हुआ कि इतनी महत्वपूर्ण योजना की फ़ाइल धूल खाने लगी. विधानसभा में आयोग की रिपोर्ट रखे जाने के बावजूद उसे लागू नहीं किया जा सका."
मणि के अनुसार, रिपोर्ट पढ़ने के बाद नीतीश ने आयोग के अध्यक्ष डी बंदोपाध्याय से मिलने से इनकार कर दिया और उनके वेतन का भुगतान तक नहीं हो पाया.
आयोग के आकलन के अनुसार बिहार में कृषि आधारित खूनी संघर्षों का चरित्र जातीय न होकर आर्थिक रहा है.
आयोग ने रिपोर्ट में बताया है कि सातवें और आठवें दशक में हुए 15 खूनी नरसंहारों में से आठ कुर्मियों ने किए.
क्यों बौखलाए नीतीश?

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इसके कारणों में वे सब आर्थिक-सामाजिक कारण शामिल हैं, जो बाद के दिनों में भी बड़े भू सामंतों के द्वारा हुए नरसंहारों के मूल में थे. यानी खेत मजदूरी, भूमि विवाद से लेकर सामाजिक शोषण के ख़िलाफ़ प्रतिरोध को दबाने के प्रयास.
मणि कहते हैं कि ‘यही वह कारण है, जिसे पढ़कर नीतीश कुमार बौखला गए.'
दरअसल, नीतीश खुद कुर्मी जाति से आते हैं, जो उनका बड़ा वोट बैंक भी है.
2008 तक आते-आते नीतीश अपने शासन के पहले दौर को ‘सुशासन’ की छवि देते हुए दलितों के बीच अपना जनाधार बनाने में लग गए थे.
रिपोर्ट का यह हिस्सा उनके लिए इसी कारण बौखलाने वाला था.
मध्यजातियों का राज

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भूमि सुधार आयोग के कई शोधों में शामिल रहे अर्थशास्त्री शैबाल गुप्ता कहते हैं, "सत्ता में पिछले कई दशकों से मध्य जातियों का दबदबा है और यही नेतृत्व भूमि सुधार का दबाव पैदा करता रहा है."
वो कहते हैं, "अब चूंकि यह सत्ता में है, इसलिए दबाव जैसी कोई बात नहीं रही."
प्रेम कुमार मणि शैबाल गुप्ता से असहमत होते हुए कहते हैं, "नब्बे के दशक के पहले तक द्विज जातियां ही सत्ता में थीं और भूमि सुधार की मांग बहुत पुरानी है."
आयोग ग्रामीण गरीबों के साथ सामाजिक और प्रशासनिक उत्पीड़न पर भी अपने दृष्टिकोण रखता है.
इच्छाशक्ति का अभाव

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यह रिपोर्ट स्थानीय स्वशासन का भी अहम दस्तावेज़ है. फिर क्या कारण है कि सामाजिक न्याय की सरकार ने आयोग की सिफारिशें एक किनारे रख दी.
जनता दल (यू) के पूर्व सांसद शिवानंद तिवारी के अनुसार, "इसके लिए ज़िम्मेवार है सामाजिक न्याय विरोधी शक्तियों द्वारा बनाया जाने वाला दवाब और सत्ता की इच्छाशक्ति का अभाव."

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बंदोपाध्याय आयोग की रपट आते ही नीतीश कुमार के ख़िलाफ़ उनके अपनों ने ही मोर्चा खोल दिया था.
उनके बेहद करीबी ललन सिंह सहित दूसरे सवर्ण नेताओं ने इसकी सिफ़ारिशें लागू किए जाने के ख़िलाफ़ अभियान छेड़ दिया था.
मणि कहते हैं, "सत्ता बचाने की चिंता मे नीतीश ने अपनी ही महत्वाकांक्षी योजना का गला घोट दिया."
फिर साहस दिखाएंगे नीतीश?

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नीतीश अब बदली स्थितियों के साथ मुख्यमंत्री हैं.
मणि कहते हैं, "अब भाजपा भी सरकार में नहीं है, जिसके कई नेता भूमि-सुधार के ख़िलाफ़ रहे हैं. लालू यादव की पार्टी और कम्युनिस्ट अब उनके साथ हैं, यदि वे सच में गरीबों के हितैषी हैं तो बंदोपाध्याय आयोग की सिफारिशें लागू करें."

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इधर, नीतीश के ही बनाए मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी ने कई लोक लुभावन फैसले किए थे, जिनमें बेघर लोगों को ज़मीन देने से लेकर 10 एकड़ तक ज़मीन रखने वाले किसानों के लिए मुफ़्त बिजली का फ़ैसला शामिल है.
अब सवाल है कि नीतीश क्या भूमि सुधार की पहल के साथ कोई बड़ी लकीर खीच पाएंगे?
हालांकि नीतीश कुमार ने इस सवाल पर लगातार चुप्पी बनाए रखने का विकल्प चुना है.
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