बिहार: हत्या, असुरक्षा और पहचान का संकट

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- Author, मनीष शांडिल्य
- पदनाम, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
बिहार की राजधानी पटना के क़रीब पिछले रविवार (14 दिसंबर) कथित तौर पर रंगदारी न देने के कारण चार मछुआरों की हत्या कर दी गई.
मछुआरों का कहना है कि राज्य सरकार उनसे टैक्स तो लेती है लेकिन सुरक्षा नहीं देती.
कथित रंगदारी के सवाल पर मछुआरों की हत्या की यह कोई पहली घटना नहीं है. इस विवाद में सबसे बड़ी घटना 1987 में भागलपुर के बटेश्वर स्थान में घटी थी.
राज्य के मछुआरे चाहते हैं कि सरकार जल्द से जल्द उनकी सुरक्षा के लिए क़दम उठाए और मृतकों की नियत समय में मुआवज़ा देने का वादा पूरा करे.
पढ़ें रिपोर्ट विस्तार से

सोमवार की अंधेरी रात एक ट्रक पटना ज़िले के मुंगिला गांव के बिंद टोले में आकर रुका.
रात क़रीब दस बजे इस ट्रक में पोस्टमार्टम के बाद गांव के चार लोगों की लाश पहुंची थी.
ट्रक रुकते ही रोने की आवाजें तेज़ हो गईं. कोई अपने भाई को रो-रो कर याद कर रहा था तो कोई अपने बेटे तो कोई पति को.
ये शव मुंगिला गांव के उन मछुआरों के थे जिनकी रविवार रात पटना-अरवल जिले की सीमा पर गोली मार कर हत्या कर दी गई थी.
मारे गए सभी मछुआरे गांव से लगभग चार किलोमीटर दूर भैंसासुर आहर यानी की बड़े से तालाब में मछली मारने गए थे. घटना में एक व्यक्ति घायल भी हुआ है.
कथित रंगदारी

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यह घटना कथित रूप से मछली की रंगदारी के सवाल से जुड़ी बताई जा रही है.
घटना के संबंध में पटना के पुलिस अधीक्षक (ग्रामीण) हरिकिशोर राय ने बताया, "एफ़आईआर में मृतकों ने परिजनों ने यह बात दर्ज कराई है कि मृतक जब रंगदारी में मांगी गई मछली नहीं दे पाए तो उनकी हत्या कर दी गई."
आरोपों को देखते हुए पटना ज़िला पुलिस बल का रंगदारी सेल विशेष तौर पर अभियुक्तों की गिरफ़्तारी के लिए छापेमारी कर रहा है.
लेकिन अब तक किसी अभियुक्त की गिरफ़्तारी नहीं हुई है.
इस घटना ने एक बार फिर यह सच सामने लाया है कि मछुआरों को अक्सर मछली मारने के एवज़ में दबंगों को रंगदारी चुकानी पड़ती है.
जैसा कि घटना में मारे गए मनीष बिंद के पिता कुंदल बिद बताते हैं, "दबंग पहले भी कई बार किलो-दो किलो मछली लेकर पैसे नहीं देते थे. पैसे मांगने पर वे कहते थे कि हमारे खेत से होकर नदी बहती है और हम पैसा देंगे?"
सरकार की असफलता

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गंगा मुक्ति आंदोलन से जुड़े पटना हाइकोर्ट के वरीष्ठ अधिवक्ता प्रभाकर कुमार मानते हैं कि ऐसी घटनाएं सरकार की विफलता को दिखाती हैं.
प्रभाकर कहते हैं, "सरकार मछलियों के नाम पर राजस्व तो लेती है लेकिन इसके बदले मछुआरों को सुरक्षा देने में लगातार विफल साबित हो रही है और रंगदारी मांगने से जुड़े विवाद कई बार पिछले रविवार जैसी घटना के रूप में भी सामने आते हैं."
मत्स्य समितियां

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बिहार में 2003 के पशुधन जनगणना के अनुसार मछुआरों की आबादी लगभग 50 लाख है. लेकिन इस समुदाय के जानकारों के अनुसार ये संख्या लगभग एक करोड़ है.
दूसरी ओर बिहार में लगभग एक लाख के क़रीब छोटे-बड़े तालाब भी हैं. इनकी बंदोबस्ती प्रखंड स्तरीय मत्स्य सहयोग समितियों के माध्यम से होती है.
लेकिन ये समितियां भी मछुआरों के हितों की रक्षा करने में बहुत हद तक विफल साबित हुई हैं.
मछुआरा आयोग के सदस्य अरविंद निषाद के अनुसार ग़ैर मछुआरे इसके सदस्य बन कर मछुआरों का हक़ मार रहे हैं.
अरविंद इस पर रोक लगाने के लिए सरकार से जल्द-से-जल्द पारंपरिक मछुआरों की सूची जारी करने की मांग करते हैं.
पहचान पत्र

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मछुआरों को नदियों में निःशुल्क मछली शिकार करने का अधिकार है.
लेकिन प्रशासन द्वारा इसके लिए मछुआरों को सुरक्षा मुहैया कराना तो दूर उन्हें पहचान पत्र जैसी मूलभूत चीज़ें भी उपलब्ध नहीं कराई जाती हैं.
मछुवारे के साल में तीन महीने 15 जून से 15 सितंबर तक मछली मारने पर रोक रहती है.
लंबे समय से मछुआरे इस प्रतिबंधित समय के लिए मुआवज़े की मांग करते रहे हैं.
बिहार के मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी ने इस साल दस जुलाई को अंतरराष्ट्रीय मछुआरा दिवस पर प्रतिबंधित समय के लिए मुआवज़ा देने की घोषणा की लेकिन इस घोषणा का ज़मीन पर उतरना अभी बाकी है.

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बाढ़ के समय सरकार राहत कार्य के लिए मछुआरों की सेवाओं के सहारे भी रहती है.
लेकिन आज इस बड़े समुदाय को अपनी समस्याओं से उबरने के लिए सरकार और संगठनों का पूरी तरह सहारा नहीं मिल पा रहा है.
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