पतलून में नोटबुक और हेडमास्टर के बेंत

विनोद मेहता

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    • Author, सईद नकवी
    • पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार

मेरे चार भाई हैं, पर विनोद मुझे उनसे ज़्यादा अज़ीज़ थे.

उनके साथ बिताए स्कूल के दिन आज भी मेरी याद में ताज़ा हैं. इन दिनों में शरारतें और मस्ती थी.

साथ गुज़रा बचपन

विनोद मेहता

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हम दोनों लखनऊ में एक ही स्कूल में पढ़ते थे, हम एक ही क्लास में थे और एक ही शरारत में पकड़े जाते थे.

हम एक रोज़ स्कूल बंक करके हज़रतगंज जा रहे थे, हमारे प्रिंसिपल ने हमें देख लिया और अगले दिन दफ़्तर में बुलाया.

हमें पिटाई का उतना डर नहीं था लेकिन विनोद को बहुत डर था. उन्होंने पतलून में दो नोटबुक छुपा ली. जब बेंत पड़ा तो तबले की तरह बज पड़ा. प्रिंसिपल को पता लग गया और बेंत से पिटाई सबको दो बार पड़ी और विनोद को पांच बार.

विनोद का सेंस ऑफ़ ह्यूमर बहुत अच्छा था. कभी भी हमारे बीच हिंदू मुस्लिम की बात दिमाग़, गुमान, ख़्याल, ख़्वाब में भी नहीं आई.

विनोद को हमारी बहनें विनोद भैया कहकर पुकारती थीं.

फिर हमने लखनऊ से ही बीए किया उसके बाद विनोद इंग्लैंड चले गए, वहां जाकर उन्होंने एडवर्टाइज़िंग में करियर बनाया.

जब विनोद मुंबई वापस आए तो उन्होंने डेबोनायर मैगज़ीन निकाली फिर नई नई पत्रिकाएँ निकाली.

विनोद के लिए सबसे बड़ा जुनून मैगज़ीन ही था.

उसके बाद परिवार, दोस्त सबके लिए वक़्त कम निकाल पाते थे.

दोस्ती हमेशा रही मज़बूत

विनोद मेहता

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मैं पत्रकारिता में रहा इसलिए हमारी दोस्ती पुख़्ता रही. स्कूल के बाद जब मिले तो हम दोनों पत्रकार थे.

सारी ज़िंदगी हम साथ रहे लेकिन विनोद के पास हमारे लिए वक़्त नहीं रहता था वो हर वक़्त अपने काम में मसरूफ़ रहते थे.

वो 24 घंटे काम करने वाले संपादक थे, बहुत ईमानदार थे. उन्होंने कभी अपनी हैसियत या पद का फ़ायदा नहीं उठाया.

मुझे नहीं लगता कि अब ऐसा पत्रकार देश को मिल पाएगा. वो बिल्कुल पुराने ज़माने के संपादकों की तरह थे.

ईमानदार पत्रकार

विनोद मेहता, अटल बिहारी वाजपेई

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उनका मक़सद रहता था कि लोगों ने जो सरकार चुनकर भेजी है उसके काम की बिना पक्षपात समीक्षा करना.

सरकार को गिराना या उठाना उनका मक़सद कभी रहा ही नहीं. आख़िरी वक़्त तक उनका यही नज़रिया रहा.

जो भी उन्होंने छुआ उसी में उन्हें कामयाबी मिली - संडे ऑब्ज़र्वर, पायनियर और आउटलुक जिसने इतिहास बना दिया.

पत्रकारिता में जो पक्ष पत्रकार का होना चाहिए उसी पर वो क़ायम रहे उसी अदा से जिए.

उनके अस्पताल में भर्ती होने के कुछ समय बाद ही हमें लग गया था कि विनोद अब वापस नहीं आएंगे क्योंकि वो लाइफ़ सपोर्ट पर आ गए थे.

जिसके बाद उन्होंने रविवार सुबह 11:30 बजे आख़िरी सांस ली.

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