केवल सज़ा से यौन अपराध कम हो सकता है?

डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म 'इंडियाज़ डॉटर'
    • Author, द्रोण शर्मा
    • पदनाम, मनोचिकित्सक, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए

डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म 'इंडियाज़ डॉटर' ने असहज सवालों की एक लंबी फेहरिस्त सामने लाकर रख दी है. यह डॉक्यूमेंट्री यौन अपराधों के सिलसिले में दोषी करार दिए गए अपराधियों की यौन विकृतियों और सोच पर रोशनी डालती है.

बहस शुरू हो गई है और लोग इस मुद्दे पर बंटे हुए हैं कि इस फ़िल्म को दिखाने का क्या यह सही समय था.

महिलाओं की सुरक्षा के सवाल पर इससे भारत की साख पर क्या असर पड़ेगा?

लेकिन यौन अपराध एक मानसिक बीमारी भी है. ऐसे में क्या भारत के मानसिक स्वास्थ्य सेवा विधेयक-2013 में मनोविकृत यौन अपराधियों के लिए पर्याप्त प्रावधान हैं?

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महिलाओं के खिलाफ हिंसा

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जब यौन हिंसा दुनिया भर में सभी संस्कृतियों में होती है, तो क्या भारत को ही इसके लिए चिन्हित किया जाना चाहिए था ?

यह डॉक्यूमेंट्री यौन अपराधों के मानसिक स्वास्थ्य वाले पहलू को न के बराबर ही छूती है- मसलन अपराध करने वाला एक आदमी स्टिरॉइड या ऐसी ही किसी दवा के इंजेक्शन के ज़रिए अपनी बॉडी बनाना चाहता है जिससे उसके भीतर हिंसा पनपने के आसार और उसकी यौन इच्छाएं विकृतियों का रूप लेने के आसार ज़्यादा हो सकते हैं.

'असामाजिक व्यवहार'

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बलात्कार करने वाले व्यक्ति की हिंसा को ड्रग और अल्कोहल के ख़राब असर के संदर्भ में भी देखे जाने की ज़रू़रत है. जैसे इस मामले में एक दोषी व्यक्ति ने खुदकुशी कर ली थी.

इस मामले में बलात्कारी के 'असामाजिक व्यवहार की समस्या' की पड़ताल करने की महज़ बात भर की गई थी.

और चिंताजनक रूप से किशोर बलात्कारी को समाज में फिर से लौटने दे दिया जाएगा. ऐसे में उसके फिर से अपराध करने के खतरे को कम करने के लिए क्या किया जा सकता है.

कानूनी उपाय

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इसमें कोई शक़ नहीं कि समाज की सोच में बदलाव से हालात बदलेंगे लेकिन ऐसा होने में एक उम्र गुज़र जाएगी.

इस बात को लेकर गहरी फिक्र होती है कि भारत में आज यौन अपराधियों से निपटने के लिए आपराधिक न्याय प्रणाली के अलावा किसी और ज़रिए की गुंजाइश बहुत कम ही है, जैसा इस मामले में हुआ.

जहां ऐसे दूसरे उपाय हैं वहाँ भी ऐसा कोई कानूनी उपाय नहीं है जिससे अपराध करने वाले व्यक्ति को दिमागी इलाज या अन्य किसी तरह से सहायता लेने के लिए बाध्य किया जा सके.

यौन अपराध

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यह सवाल तो उठता ही है कि केवल जेल भेज देने भर से समाज को यौन अपराधियों से किस तरह से सुरक्षित बनाया जा सकता है.

अंतरराष्ट्रीय शोध से पता चलता है कि जरूरी मानसिक इलाज की सुविधा मुहैया कराने से यौन अपराधियों के इस तरह के अपराध दोबारा करने के आसार को 27 फीसदी तक कम किया जा सकता है.

सामान्य अपराधों के मामले में भी इलाज से कमी आती है.

पुनर्वास कार्यक्रम

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इस तरह के किसी विशेष पुनर्वास कार्यक्रम के अभाव में अपराध फिर से करने के मामले और इसके दोबारा साबित होने की दर पहले से ज्यादा बनी रहती है. ख़ासकर रिहा होने के पहले साल में.

यौन अपराधियों के पुनर्वास से जुड़े कार्यक्रम में उनके ख़तरे, जरूरत और प्रतिक्रिया के सिद्धांतों का ख्याल रखा जाता है. इससे फिर से अपराध करने के मामलों में बड़े पैमानों पर कमी होती है.

अधिक और बीच के स्तर के खतरे वाले यौन अपराधियों को पुनर्वास कार्यक्रम से सबसे अधिक फायदा होता है.

किशोर अपराधी

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इस तरह के इलाज के दौरान मनोविकारों के सभी पहलुओं पर काम किया जाता है और दो तिहाई अपराधियों में अपराध के प्रति उनके रवैये में बदलाव देखा गया.

यह ध्यान देने वाली बात है कि अनिवार्य इलाज का वैसा ही प्रभाव देखा गया है जैसा स्वैच्छिक रूप से इलाज का विकल्प चुनने के मामलों में हुआ.

किशोर अपराधियों और खतरे की अधिक संभावना वाले अपराधियों के मामले में भी दिमागी इलाज का बेहतर असर देखा गया.

दुर्भाग्य से इस तरह के मज़बूत सबूतों के बावजूद मौत की सज़ा पाए व्यक्ति को खतरे की सूची से हटा दिया जाता है.

मानसिक स्वास्थ्य कानून!

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किशोर अपराधी और अन्य लोगों को सज़ा पूरी होने के बाद समाज में फिर से लौटने दे दिया जाता है. और उनके फिर से अपराध करने की संभावना बनी रहती है.

भारत में मानसिक स्वास्थ्य विधेयक में मानसिक रूप से अस्वस्थ व्यक्ति के अपराध करने के मुद्दे पर बहुत कम कहा गया है.

विधेयक में 'मानसिक कमज़ोरी' शब्द की परिभाषा में यह साफ़ नहीं है कि इसमें 'व्यक्तित्व की व्यावहारिक समस्या' शामिल की गई है या नहीं.

यह एक ऐसी मानसिक परेशानी है जो जेल के कैदियों में अमूमन पाई जाती है.

आपराधिक व्यवहार

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यहां तक कि यौन अपराधी के 'असामाजिक व्यवहार की समस्या' को इसकी 'कानूनी परिभाषा' के दायरे में शामिल कर भी दिया जाता है तो ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जिसके तहत दोषी ठहराए गए अपराधी को फ़ॉरेंसिक अस्पताल भेजा जा सके, जहां उनके आपराधिक व्यवहार का मूल्यांकन और इलाज किया जाए.

अगर ऐसा प्रावधान होता तो उनकी रिहाई को उनके व्यवहार को फिर से अपराध करने के खतरे से जोड़ कर देखा जाता.

वे लोग जो इलाज में सहयोग नहीं करते तो समुदाय में उन पर नज़र रखी जा सकती और खतरे का कोई निदान नहीं दिखता तो उन्हें दोबारा से अस्पताल भेजा सकता.

गंभीर ख़तरा

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हालांकि इससे संंबंधित नया विधेयक 'मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति' के इलाज के अधिकार का प्रावधान करता है.

लेकिन इसमें ऐसे अपराधी की बात नहीं कही गई है जो इलाज के बारे में कोई फैसला कर सकने की स्थिति में नहीं हैं और जो दूसरे लोगों के लिए गंभीर खतरा बने हुए हैं.

जो अपराधी इलाज का फैसला लेने की स्थिति में हैं लेकिन इसके लिए सहयोग नहीं कर रहे हैं, उनको लेकर भी नया कानून साक्ष्य आधारित अनिवार्य इलाज का प्रावधान करने में नाकाम रहा है.

जोखिम की स्थिति

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इस विधेयक में यह संभावना है कि मानसिक रूप से बीमार अपराधियों से जुड़ी खामी को दूर किया जा सकता है और इसके साथ ही देश में फ़ॉरेंसिक साइक्रेट्री (मनोचिकित्सा) से जुड़ी सेवाओं की फौरी शुरुआत का रास्ता निकाला जा सकता है.

अपने मौजूदा स्वरूप में इस कानून से बहुत कम उम्मीद है कि समाज में यौन अपराधियों के खतरे का निदान निकल पाएगा.

समस्या के समुचित मूल्यांकन को नज़रअंदाज करने से कानून बनाने वालों और इसे लागू करने वालों के लिए जोखिम की स्थिति बन गई है.

मौजूदा स्वरूप में इस विधेयक से यौन अपराधियों पर कोई लगाम लगने की संभावना कम ही है.

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