ग़लत जगह निकल रहा है ग़ुस्सा: जावेद अख़्तर

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- Author, निखिल रंजन
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
निर्भया बलात्कार कांड के दोषियों में से एक मुकेश सिंह के इंटरव्यू वाली डॉक्यूमेंट्री के प्रसारण पर सरकार ने रोक लगा दी है.
बुधवार को राज्यसभा में इस बात पर बड़ा हंगामा हुआ कि फ़िल्मकार को बलात्कार के दोषी से बात करने की इजाज़त कैसे दी गई.
राज्यसभा सांसद और मशहूर शायर जावेद अख़्तर लोगों की नाराज़गी को तो सही मानते हैं लेकिन इस पूरे मामले में उनकी आपत्ति किसी और बात को लेकर है.
पढ़िए क्या कहते हैं जावेद अख़्तर
एक तरफ़ तो हम अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बात करते हैं और दूसरी तरफ़ ऐसे दस्तावेज़ को रोकने की बात करते हैं जो सच्चाई पर आधारित है.
मुझे लगता है कि लोगों का ग़ुस्सा अपनी जगह सही है क्योंकि जो घटना हुई वो भयानक और दिल को हिला देने वाली थी.

अब ये डॉक्यूमेंट्री उस घटना की याद दिला रही है, तो इसे लेकर लोगों में रोष है.
लेकिन मैं समझता हूं कि ये ग़ुस्सा कहीं ग़लत जगह निकल रहा है. ग़ुस्सा हमें ज़रूर होना चाहिए कि इस तरह का जुर्म हुआ था. इस बात पर ग़ुस्सा होना चाहिए कि वो मुजरिम अभी भी सही सलामत जेल में बैठे हुए हैं.
ग़ुस्सा इस बात पर भी होना चाहिए कि वो व्यक्ति किस तरह बात कर रहा है और कैसी बातें कह रहा है. लेकिन इस आदमी को तो इसके किए सज़ा मिलेगी.
असल ग़ुस्से की बात
हालांकि मैंने डॉक्यूमेंट्री देखी नहीं है लेकिन जो कुछ सुना है उसके मुताबिक़ ये व्यक्ति कह रहा है कि लड़की को ऐसे नहीं घूमना चाहिए, या उसने 'ऐसे कपड़े' पहने थे. या फिर जो भी उसके वकील ने ये कहा कि अगर सड़क पर गोश्त पड़ा है तो कुत्ते तो उसे खाएंगे ही.

इस तरह की ज़ुबान इस्तेमाल की जा रही है, ये ग़ुस्से की बात ज़रूर है. लेकिन सोचने वाली बात ये है जिस तरह का तर्क ये बलात्कारी दे रहा है, यही तर्क ऐसे लोग भी देते हैं जो अपने आप को समाज सुधारक समझते हैं, जो अपने आप को संस्कृति का पहरेदार समझते हैं.
वो लोग भी उसी पर इल्जाम लगाते हैं जिस पर ज़ुल्म हुआ है. कहते हैं कि महिलाओं को ऐसे कपड़े नहीं पहनने चाहिए, उन्हें जीन्स नहीं पहननी चाहिए, उन्हें टीशर्ट नहीं पहननी चाहिए. उन्हें इस तरह से बाहर नहीं निकलना चाहिए, उन्हें रात को बाहर नहीं घूमना चाहिए.
तो मतलब ये है कि ऐसे लोगों की मानसिकता और बलात्कारी की मानसिकता में कोई फ़र्क़ नहीं है. असल में ग़ुस्से की बात ये है.
मुझे इस बात पर ग़ुस्सा है कि वो कह रहे हैं कि देखा और सुना तुमने, ये बलात्कारी क्या कह रहा है. दरअसल ये वही कह रहा है जो ख़ुद को शरीफ कहने वाले बहुत से लोग भी कहते हैं. वो लोग देखें क्योंकि उनके लिए ये शर्म की बात है.
डरने की ज़रूरत नहीं
रही बात डॉक्यूमेंटरी की, अगर ये ग़ैर क़ानूनी तरीके से हासिल की गई है या इसमें क़ानून का पालन नहीं किया गया है या इंटरव्यू क़ानूनी तरीके से नहीं हुआ है तो देश का क़ानून तोड़ना बुरी बात है.

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लेकिन अगर उचित तरीक़े से, पूरी अनुमति के साथ काम किया गया है तो इसमें कुछ ख़राबी नहीं है.
जहां तक इसे लेकर सोच की बात कही जा रही है. उससे डरने की कोई ज़रूरत नहीं है.
ऐसा नहीं है कि अगर लोग इसे देखेंगे तो बलात्कारी की सोच से प्रभावित हो जाएंगे, बल्कि उन्हें इस विचार से, इस सोच से नफ़रत होगी कि ये एक बलात्कारी की सोच है और हमारे अंदर इस तरह की सोच नहीं चाहिए.
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