क्या यह विपक्ष के समापन का समय है?

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- Author, मधुकर उपाध्याय
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
अग्निपुराण की कथा है कि एक बार दुर्वासा ऋषि के शाप से इंद्र का राजपाट चला गया.
उन्होंने विष्णु से मदद मांगी तो सीधे सहायता करने की बजाय विष्णु ने उन्हें असुरों से बात करने की सलाह दी.
उन्होंने उनसे कहा कि वह धुर विरोधियों को समुद्र मंथन में हिस्सा लेने को राज़ी करें. असुर मान गए.
लेकिन आज की राजनीति से इस कथा का क्या अर्थ है?
समुद्र मंथन में मथानी बनाने के लिए मंदराचल पर्वत उखाड़कर लाया गया. नाग वासुकी से प्रार्थना की गई कि वह रस्सी बन जाएं. तब क्षीरसागर मथा गया.
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मंथन में सबसे पहले ‘हलाहल’ निकला, जिसे कोई नहीं लेना चाहता था. उसे शिव ने पी लिया और ज़हर के असर से नीलकंठ हो गए.
समुद्र मंथन की आगे की कथा सबको पता है. मंथन से 14 चीज़ें निकलीं. कामधेनु गाय, ऐरावत हाथी और कौस्तुभ मणि के अलावा अमृत सामने आया. देवताओं और असुरों ने बग़ैर किसी विवाद के सब कुछ आपस में बांट लिया.
यह पौराणिक कथा का एक पाठ है. इसे आस्था से जोड़कर देखा-पढ़ा जाता है.
लेकिन इसका एक दूसरा पाठ भी है, जो सामयिक और शुद्ध रूप से राजनीतिक है. इसका संबंध किसी व्यवस्था में विपक्ष की आवश्यकता और उसकी भूमिका से है.
पुराणों के मुताबिक़, अगर यह मान लें कि साम्राज्य का गुमान होने की वजह से इंद्र ने सत्ता गँवा दी तो यह भी मानना पड़ेगा कि विष्णु ने उन्हें विपक्ष की ज़रूरत और उसका महत्त्व समझाया. इंद्र को अपने धुर विरोधियों के पास मदद मांगने भेजा.
सत्ता की कुंजी

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यह कल्पना से परे है कि समुद्र मंथन में अगर विपक्ष न होता तो अकेले मंदराचल, वासुकी और देवता सफल हो जाते.
सत्ताधारियों के लिए ताक़तवर विपक्ष उतना ही ज़रूरी था कि क्षीरसागर मथा जा सके.
त्रेता युग में राम और रावण और द्वापर में कृष्ण और कंस की कथा इसी तर्क का विस्तार है कि सत्ता पक्ष उतना ही प्रबल होगा, जितना विपक्ष उसे होने देगा.
मिथकीय कथाओं से लेकर आज तक सत्ता पक्ष का क़द विपक्ष ही तय करता आया है.
यह लोकतंत्र या लोकतांत्रिक शासन प्रणाली से उपजा तथ्य नहीं है, सार्वभौमिक-सार्वकालिक सत्य है.
इससे इंकार करना इंद्र की तरह अपना राजपाट खो देने का ख़तरा जानबूझकर लेना है.
विपक्ष का सम्मान सत्ता के स्थायित्व की कुंजी है. लोकतंत्र इस कथा की केवल पुष्टि करता है.
चामलिंग और केजरीवाल

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मज़बूत विपक्ष की कमी और उपेक्षा के मामले भारतीय लोकतंत्र के शुरुआती दिनों में नहीं थे. कांग्रेस के पास जवाहरलाल नेहरू जैसा क़द्दावर नेता होने पर भी उसे झाड़ूमार एकतरफ़ा राजपाट नहीं मिला.
ऐसा राजपाट इंदिरा गांधी और राजीव गांधी जैसे ताक़तवर नेताओं को भी नहीं मिला. जनता पार्टी ने उत्तर भारत के भरोसे सत्ता हासिल तो कर ली, पर दक्षिण भारत उसके ख़िलाफ़ खड़ा रहा.
राज्यों में भी कमोबेश यही कहानी दोहराई गई. भले एमजी रामचंद्रन, एनटी रामाराव या ज्योति बसु लोकप्रियता के शिखर पर रहे हों, कमज़ोर ही सही लेकिन बिना विपक्ष के नहीं थे.
इसका एकमात्र अपवाद 21वीं सदी में सिक्किम में देखने को मिला, जब सिक्किम डेमोक्रेटिक फ्रंट ने 32 सदस्यों की विधानसभा में 2004 में 31 और पांच साल बाद 2009 में सारी 32 सीटें जीत लीं.
हालांकि कवि-हृदय मुख्यमंत्री पवन कुमार चामलिंग ने इस ‘संपूर्ण और निरंकुश’ सत्ता का दुरुपयोग नहीं किया. जनता ने 2014 में उन्हें एक मज़बूत विपक्ष दे दिया. सत्ता नहीं छीनी, लेकिन नकेल ज़रूर लगा दी.
गठबंधन और बहुमत

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पिछले साल लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी के अभियान की वजह से संसद ने अब तक का सबसे खंडित विपक्ष देखा, जिसमें 10 फ़ीसद सीटें जीतकर कोई राजनीतिक दल प्रमुख विपक्षी पार्टी बनने लायक़ भी नहीं रहा. मोदी ने इस विपक्ष के प्रति कोई सदाशयता नहीं दिखाई.
इस साल, दिल्ली में आम आदमी पार्टी ने 70 में से 67 विधानसभा सीटें जीतीं. कुल जमा तीन लोग विपक्ष में रह गए.
ग़नीमत थी कि केंद्र में भाजपा के रवैये के विपरीत आम आदमी पार्टी ने तीन सीटें जीतने वाली भारतीय जनता पार्टी को विपक्ष माना.
हालांकि ऐसा कोई ख़तरा हाल-फ़िलहाल नहीं है कि विपक्ष इस लोकतंत्र में नेस्तनाबूद हो जाएगा. पर गठबंधन दौर के बाद बहुमत के साथ सत्ता की ओर खिसकती राजनीति के लिए ख़तरे की घंटी तो है ही. इसके साथ ही सत्ता पक्ष को यह याद दिलाने का वक़्त भी है कि इंद्र की सत्ता कैसे गई थी और फिर उन्हें कैसे वापस मिली.
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