कैसी होगी विपक्ष के बिना विधानसभा?

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- Author, ज़ुबैर अहमद
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
ज़रा सोचिए दिल्ली विधानसभा के पहले अधिवेशन के पहले दिन का मंज़र.
एक तरफ ज़बरदस्त चुनावी जीत के बाद आम आदमी पार्टी के विधायकों की एक बड़ी भीड़. दूसरी तरफ विपक्ष के खेमे में केवल भारतीय जनता पार्टी के तीन विधायक.
'आप' की सरकार के मंत्रियों और विधायकों को चुनौती देने या उनपर अंकुश लगाने वाले ये मुट्ठी भर विपक्षी विधायक वहां बैठने से भी कतराएंगे.
भाजपा के दो कद्दावर नेता, नरेंद्र मोदी और अमित शाह, टीवी पर विधान सभा की ये कार्रवाई शायद देख भी न पाएं. वो पूछेंगे ये सब कैसे हो गया?
चुनावी रणनीति

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हम तो सरकार बनाने की सोच रहे थे. अब तो विपक्ष के लायक भी नहीं रहे.
नौ महीने पहले अजेय समझे जाने वाले और छप्पन इंच सीना रखने वाले मोदी जी दिल्ली विधान सभा में पार्टी को ठोस विपक्ष की जगह भी न दिला पाए.
चुनावों की रणनीति के माहिर अमित शाह अपनी पार्टी को चुनाव के ज़रिए 'लीडर ऑफ़ दी ऑपोज़िशन' या नेता विपक्ष का दर्जा दिलाने में भी कामयाब न हुए.
लेकिन 'अराजकतावादी' अरविंद केजरीवाल ने भाजपा की लाज रख ली.
नेता विपक्ष

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चुनाव के नतीजों से जब ये समझ में आने लगा कि भाजपा को 70 सीटों वाले दिल्ली विधान सभा में औपचारिक तौर पर विपक्ष के लीडर का दर्जा पाने के लिए अनिवार्य सात सीटें भी नहीं मिलेंगी तो उन्होंने कहा कि वो भाजपा की कम सीटें आने की सूरत में इसे विधान सभा में 'लीडर ऑफ़ दी ऑपोज़िशन' का दर्जा देने के लिए तैयार हैं.
'आप' के नेता कुमार विश्वास ने ट्वीट करते हुए कहा, "अगर भाजपा को सात से भी कम सीटें मिलेंगी तब भी इसे 'लीडर ऑफ़ दी ऑपोज़िशन' का दर्जा दिया जाएगा. राजनीति आम सहमति से चलती है."
मजबूत विपक्ष!

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दूसरी तरफ पिछले साल आम चुनाव में इसी तरह की भारी जीत के बाद कांग्रेस को ख़ास विपक्षी पार्टी का दर्जा देने में भाजपा किस तरह से कतरा रही थी, ये सब को मालूम है.
कांग्रेस को 44 सीटें मिली थीं. इसे 'लीडर ऑफ़ दी ऑपोज़िशन' का दर्जा हासिल करने के लिए 55 सीटें हासिल करनी थीं.
लीडर ऑफ़ दी ऑपोज़िशन का दर्जा अहम होता है क्योंकि इसे कई समितियों में शामिल किया जाता है.
लेकिन इससे भी बढ़ कर लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका महत्वपूर्ण होती है. अच्छी संख्या से विपक्ष मज़बूत भी होता है.
'आप' की चुनौतियां

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भाजपा सरकार ने सुप्रीम कोर्ट की सलाह पर नियम बदले और संसद में कांग्रेस को ये दर्जा दिया.
दिल्ली विधानसभा में एक प्रभावी विपक्ष के बिना 'आप' की चुनौतियां और भी बढ़ जाती हैं.
विशेषज्ञ कहते हैं कि 'आप' की तरफ से मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार अरविंद केजरीवाल को विधान सभा में फूँक फूँक कर क़दम उठाना पड़ेगा.
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