बजटः वो तीन चीज़ें, जिन्हें सुधारना ज़रूरी है

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- Author, सुनील जैन
- पदनाम, फ़ाइनेंशियल एक्सप्रेस के संपादक
वित्त मंत्री अरुण जेटली शनिवार को संसद में वर्तमान सरकार का पहला पूर्ण बजट पेश करने जा रहे हैं.
उद्योग जगत उम्मीद करता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले नौ महीनों में उद्योग व्यापार को लेकर जो बातें कही हैं, उन्हें अमल में लाया जाएगा.
लोगों का मानना है कि मोदी की अगुवाई में पिछले दिनों काफ़ी काम हुए हैं, लेकिन बहुत सी ऐसी बातें भी हैं, जिन्हें किया जाना बाक़ी है.
शायद इसीलिए एचडीएफ़सी बैंक के प्रमुख दीपक पारेख ने कहा था, "निवेशकों में बेचैनी बढ़ रही है."
श्रम क़ानून, भूमि अधिग्रहण विधेयक, कोयला खनन क्षेत्र, सब्सिडी, टैक्स नीति आदि ऐसे कई क्षेत्र हैं जिनमें सुधार लाकर ही ऊंची विकास दर हासिल की जा सकती है.
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दुनिया की अर्थव्यवस्था में भारत दसवें स्थान पर और चीन दूसरे स्थान पर है.
आंकड़े बताते हैं कि भारत की विकास दर चीन की दर से ज़्यादा है. लेकिन हमें इन आंकड़ों पर भरोसा नहीं करना चाहिए क्योंकि वो थोड़ा गड़बड़ लग रहे हैं.
चीन की बराबरी करने के लिए भारत को निवेश पर ख़ास ध्यान देना होगा क्योंकि 2008 से 2010 के बीच जब भारत में निवेश दर 38 फ़ीसदी तक पहुंच गया था तो विकास दर भी नौ प्रतिशत से अधिक हो गई थी.
लेकिन उसके बाद निवेश दर में गिरावट आई है और आज यह 30 प्रतिशत के आस पास है. इससे विकास दर भी दो-ढाई फ़ीसदी नीचे आ जाएगा.
निवेश पर ध्यान

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भारत को सबसे पहले अगले दस साल तक निवेश की दर 38 फ़ीसदी तक रखना होगा.
निवेश बढ़ाने के लिए कई उपाय करने होंगे, मसलन- माहौल बनाने वाले सूचकांकों को ठीक करना होगा और नियामक तंत्रों को दुरुस्त करना होगा.
अभी मोदी सरकार को नया भूमि अधिग्रहण विधेयक पास करने में ही काफ़ी दिक़्क़तों का सामना करना पड़ रहा है. सवाल यह है कि परियोजनाओं के लिए ज़मीन ही नहीं मिलेगी तो कौन और क्यों निवेश करेगा.
आर्थिक रूप से चीन से मुक़ाबला करने में भारत के सामने कई दिक़्क़तें हैं.
सबसे बड़ी चुनौती है श्रम क़ानूनों में बदलाव करना, जिससे मज़दूरों की उत्पादकता बढ़े.
दूसरी बड़ी चुनौती है कि ज़मीन अधिग्रहण में आाने वाली कठिनाइयों को दूर करना.
यूपीए जैसी नीतियां?

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निवेशकों के प्रति भारत सरकार की नीतियं से भी दिक़्क़तें बढ़ती हैं. सिर्फ़ यूपीए सरकार ही नहीं, मोदी सरकार की नीतियां भी निवेश को हतोत्साहित करने वाली हैं.
इसे इस बात से समझा जा सकता ह कि सुनील मित्तल की कंपनी भारती एयरटेल और विटोरियो कोलावो की वोडाफ़ोन ने कहा है कि जब तक उन्हें स्पेक्ट्रम नहीं मिलता, वे निवेश नहीं करेंगी.
ये ऐसी कंपनियां हैं जो एक साल में आठ से 10 अरब डॉलर (लगभग 62,000 करोड़ रुपए) का निवेश कर सकती हैं, लेकिन इन्हें स्पेक्ट्रम नहीं दिया गया. ये फ़ैसला मोदी सरकार का है.
तेल और गैस क्षेत्र की बड़ी कंपनियां रिलायंस और भारत पेट्रोलियम ने भी कहा कि वो अगले दो सालों में 60,000 करोड़ रुपए का निवेश कर सकते हैं, लेकिन सरकार ने अभी तक गैस की क़ीमतें नहीं बढ़ाई हैं.
मोबाइल हैंडसेट बनाने वाली कंपनी नोकिया ने यहां संयंत्र लगाया, सरकार ने उसे भारी भरकम टैक्स का नोटिस थमा दिया, वो कंपनी भी बंद हो गई है.
इसी तरह वोडाफ़ोन जैसी बड़ी कंपनियों पर हज़ारों करोड़ रुपए का टैक्स थोप दिया गया. हालांकि इस मामले में वोडाफ़ोन को राहत मिली है, लेकिन 20,000 करोड़ रुपए का टैक्स का मामला अभी भी चल रहा है. यह निवेश में एक बड़ी रुकावट है.
तेल और गैस क्षेत्र

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भारत भारी मात्रा में तेल व गैस आयात करता है. सरकार 10 या 11 डॉलर प्रति यूनिट की दर से गैस ख़रीद कर उस पर सब्सिडी देती है.
गैस आधारित हमारे ऊर्जा संयंत्र अपनी क्षमता का लगभग 20 फ़ीसदी ही काम कर पाते हैं. यह बहुत बड़ा नुक़सान है.
सरकार जब तक अपनी औद्योगिक नीतियां ठीक नहीं करेंगी, ऊंची विकास दर हासिल करना मुश्किल है.
(बीबीसी संवाददाता ज़ुबैर अहमद की सुनील जैन से बातचीत के आधार पर)
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