‘अब क्या फांसी दे दोगे मोदी जी को?’

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    • Author, शालू यादव
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली

सूरत में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का वह सूट नीलाम हो गया है, जिस पर उनका ख़ुद का नाम लिखा है.

मोदी के इस सूट की क़ीमत करीब 10 लाख रुपए बताई जा रही है, जिसकी नीलामी का पैसा गंगा की सफ़ाई में लगाया जाएगा. नीलामी में इस सूट की बोली 4 करोड़ से ऊपर लगी.

अब कहा जा रहा है कि नरेंद्र मोदी इसकी नीलामी विवाद से बचने के लिए कर रहे हैं.

सूट विवाद मोदी की छवि पर हावी है? पढ़ें विश्लेषण

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2014 के आम चुनावों से पहले देश ही नहीं बल्कि दुनिया भर में मोदी की छवि एक चाय बेचने वाले विनम्र नेता की थी, जो रंक से राजा बनने वाला था.

और फिर नौ महीनों के राज में उनके दस लाख का सूट सुर्ख़ियों में छाने लगा.

तो क्या राजा बनने के बाद वो अपनी चाय वाले की छवि से ज़रूरत से ज़्यादा आगे बढ़ गए?

जनता भूल जाएगी?

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विज्ञापन और इमेज से जुड़े मामलों के जानकार भरत डाभोलकर कहते हैं, ''शुरू में मोदी जी अपनी बहुत अच्छी छवि बनाने में कामयाब रहे थे. एक ग़रीब आदमी की राजनीतिक ऊंचाई तक पहुंचने की छवि आज़ाद भारत में बहुत कम नेता बना पाए हैं और मोदी जी उनमें से एक हैं. यह सूट 10 लाख का हो न हो, पर इतने अच्छे और महंगे सूट पहनना उस छवि के ख़िलाफ़ था. प्रधानमंत्री बनने के बाद उनकी जीवनशैली में जो बदलाव आया, उससे मोदी के ब्रैंड को झटका ज़रूर लगा है.''

लेकिन उनका यह भी कहना है कि जनता की याद्दाश्त बहुत कमज़ोर होती है और आमतौर पर ऐसे विवाद 10-15 दिन में भुला दिए जाते हैं.

जाने-माने ऐड-मैन प्रहलाद कक्कड़ मोदी का बचाव करते हैं.

वह पूछते हैं, ''तो क्या हुआ अगर एक चाय बेचने वाले ने सत्ता में आने के बाद एक महंगा सूट पहन भी लिया? अब क्या उन्हें इसके लिए फांसी दे दी जाए? इस देश की जनता की एक पुरानी आदत है. जब भारत की क्रिकेट टीम मैच जीत जाती है तो जनता उसकी वाह-वाही करने लगती है और अगर वही टीम हार जाए तो जनता खिलाड़ियों के घर पथराव करने पहुंच जाती है. बेवजह मोदी के सूट को लेकर एक बवाल बनाया जा रहा है.’

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यह भी सच है कि नेताओं की छवि उनके बयानों से ही नहीं बल्कि उनके पहनावे से भी बनती है.

आत्ममुग्ध हरकत या..?

तो फिर नरेंद्र मोदी का नाम उनके सूट पर लिखा होना ज़्यादा बड़ी ग़लती थी या सूट का दाम?

प्रहलाद कक्कड़ ने कहा, ''मुझे लगता है कि उनके सूट पर उनका ही नाम होना विपक्षी पार्टियों का एक हथियार बन गया, जिससे वो उनकी छवि पर वार कर सकें. उनकी आलोचना यह कहकर की गई कि वे आत्ममुग्ध आदमी हैं, जिन्हें ख़ुद से बहुत प्यार है.

कक्कड़ के मुताबिक़, ''यह ज़रूर है कि भाजपा के पास इस आलोचना का कोई जवाब नहीं था, पर सच्चाई यह है कि यह मोदी जी का आयडिया नहीं था. किसी ने उन्हें ये सूट भेंट किया और उन्होंने बस यह समझकर पहन लिया कि वह अनोखा है.''

दूसरी ओर, भरत डाभोलकर कहते हैं कि हर इंसान का ख़ुद से प्यार करना लाज़मी है, लेकिन एक नेता का सार्वजनिक तौर पर ऐसा करना विवादास्पद हो सकता है.

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उन्होंने कहा, ''कहीं न कहीं मोदी जी की ओर से एक ग़लत संदेश गया कि मैं वैसे तो खादी के कुर्ते पहनना पसंद करता हूं लेकिन जब मैं ओबामा जैसे दिग्गजों से मिलूंगा तो डिज़ाइनर सूट पहनूंगा. चाहे वो अपनी निजी ज़िंदगी में कितनी ही महंगी चीज़ें पहनें या इस्तेमाल करें, लेकिन जनता यह ज़रूर याद रखती है कि एक बड़ा नेता सार्वजनिक ज़िंदगी में अपना आचरण कैसा रखता है.''

उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जिस तरह महात्मा गांधी ने ब्रिटेन की महारानी से मुलाकात के समय भी धोती ही पहनने का फ़ैसला किया, उसी तरह मोदी जी को अपने उस बयान पर कायम रहना चाहिए था कि वह एक सादगीपसंद नेता हैं.

इस दौरान कुछ टिप्पणियां ऐसी भी हुईं कि अच्छे दिन केवल नरेंद्र मोदी के लिए आए हैं, आम जनता के लिए नहीं.

बहरहाल, यह विवाद उनकी छवि के लिए कितने अच्छे दिन लाया, उसका निर्णय जनता पर ही छोड़ दें, तो बेहतर है.

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