मोदी का तिलिस्म अभी टूटा नहीं है!

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- Author, आकार पटेल
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिन्दी डॉटकॉम के लिए
एक राजनेता के तौर पर 14 साल के करियर में नरेंद्र मोदी पहली बार 10 फरवरी को एक चुनाव हारे.
उनकी भारतीय जनता पार्टी को दिल्ली में एक नई सी पार्टी ने बुरी तरह हरा दिया.
प्रधानमंत्री 2001 में उस वक़्त एकपूर्णकालिक राजनेता बने थे जब उन्हें गुजरात में अचानक मुख्यमंत्री बना दिया गया था.
देश का यह सूबा पहले से ही उनकी पार्टी को वोट करता रहा था और 1995 से ही भाजपा को यहां बहुमत हासिल था.
उस वक़्त आंतरिक गुटबाज़ी झेल रहे केशुभाई पटेल को हटाकर मोदी को मुख्यमंत्री पद की ज़िम्मेदारी दी गई थी.
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ठीक अगले साल गुजरात ने एक दंगा देखा और इसके बारे में काफ़ी कुछ कहा सुना गया क्योंकि टेलीविज़न पर इसकी विस्तृत रिपोर्टिंग हुई थी.
दंगों के कुछ महीने बाद 2002 के आखिर में मोदी की कमान में पहला चुनाव हुआ और पार्टी को तीसरी जीत मिली.
साल 2007 और 2012 में मोदी अपनी सफलता को दोहराते रहे. उन्हें दोनों बार बड़ा बहुमत मिला.
विधानसभा चुनावों में मिली जीत से मोदी को लगा कि इसके पीछे उनका ख़ुद का करिश्मा, विकास का एजेंडा और कुल मिलाकर एक समझदार नेता की उनकी छवि है न कि भाजपा की राजनीति को गुजरातियों का परंपरागत समर्थन.
जादुई जीत

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इस विचार को मोदी समर्थकों ने बढ़ावा दिया, ख़ासकर राष्ट्रीय मीडिया ने. उनमें से कई लोग मोदी को एक अद्वितीय नेता की तरह देखते हैं.
उन्हें लगता है कि मोदी न केवल सुलझे और प्रेरक वक्ता हैं बल्कि एक ऐसे व्यक्ति भी हैं जो अलग सोच रखता है और उसे साकार भी करता है.
उनकी ये छवि पहले देश के फलक पर पेश की गई फिर दुनिया भर में लोगों ने उन्हें इस रूप में देखा.
एक हद तक कहा जा सकता है कि 2014 की जादुई जीत दिलाने में इस छवि का काफ़ी कुछ योगदान रहा था.
भारत का मीडिया

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ऐसा पहली बार हुआ है कि दिल्ली में मिली हार ने उन्हें परेशानी में डाल दिया है.
एक ऐसे व्यक्ति के तौर पर जो खुद को 'रॉक स्टार' की तरह देखा जाना पसंद करते हैं और जिनके समर्थक उन्हें मसीहा समझते हैं, हाल में खुद के बारे में हो रही मीडिया कवरेज को देख-सुनकर खुश नहीं होंगे.
दंगों की कवरेज के बाद से ही मोदी ने भारत की मीडिया को 'बाज़ारू' समझा है लेकिन पश्चिमी मीडिया उनके बारे में क्या सोचता है, इसे लेकर वे हमेशा मोहित रहे हैं.
सूट प्रसंग

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ब्रिटेन के अख़बार 'डेली टेलीग्राफ़' ने उनकी हार को लेकर व्यंग्य करते हुए सुर्खी लगाई, "क्या भारत के सबसे ताक़तवर प्रधानमंत्री को नामधारी पट्टी वाले कोट की क़ीमत की वजह से तो हार का सामना नहीं करना पड़ा?"
कुछ लोग जो उन्हें पसंद करते थे, मोदी के सूट प्रसंग के बाद निराश हुए. हालांकि 2001 से ही उन्हें जानने वाले लोगों के लिए यह मोदी के किरदार का ही हिस्सा था.
दस साल पहले जब मैं अहमदाबाद के एक अख़बार के लिए काम करता था तो गुजरात सरकार ने मोदी की एक तस्वीर जारी की थी जिसमें उनका पूरा सचिवालय ही उनके साथ था.
शायद कच्छ के रण के बियाबान में हुई बैठक की उस तस्वीर में कोई तीन दर्जन लोग रहे होंगे जिनमें राज्य के ज़्यादातर वरिष्ठ नौकरशाह भी थे.
'फ़ैशन आइकन'

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उस तस्वीर के पीछे कच्छ के रण की बेपनाह खूबसूरती को दिखाने के अलावा और कोई मक़सद नहीं रहा होगा.
फ़ोटो फ़्रेम में उन्होंने उन्होंने काउब्वॉय स्टाइल में हैट, जैकेट और धूप का चश्मा पहन रखा था.
मुझे संदेह है कि बराक ओबामा का उन्हें 'फ़ैशन आइकन' कहने वाली बात को मोदी समझ पाए होंगे.
हालांकि उस सूट को लेकर गुजरातियों के एक तबके के बीच अच्छी राय बनी है.
वोट शेयर

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पिछले महीने एक ख़बर आई थी कि सूरत में कुछ लोग हीरे जड़े अपने जूते दिखा रहे थे. मोदी के नाम वाले मंदिरों की भी ख़बरें सुर्खियों में आती रहीं.
मुझे लगता है कि पार्टी का काडर वोट अभी भी उसके साथ है इसलिए उनका वोट शेयर गिरा नहीं है.
इस तरह के समर्थन के भरोसे भाजपा भारत के किसी भी राज्य का चुनाव तक़रीबन जीत सकती है.

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लेकिन अरविंद केजरीवाल के वोटों में 20 फ़ीसदी के इज़ाफ़े ने बीजेपी को हरा दिया.
यह शायद इसलिए हो पाया कि मोदी ने बड़े और फ़ौरी बदलाव का वायदा पूरे देश से किया और केजरीवाल ने भी दिल्ली वालों से कुछ ऐसा ही वायदा किया.
मुझे नहीं लगता कि आगे के लिए मोदी ने इन मतदाताओं को गंवा दिया है.
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