क्या जनता का बीजेपी से मोहभंग हो गया?

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- Author, श्रवण गर्ग
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी डोट कोम के लिए
दिल्ली विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी को भारी बहुमत मिला और भाजपा को करारी हार. लेकिन क्या अरविंद केजरीवाल अच्छा शासन दे पाएंगे. क्या इन परिणामों को लोगों का भाजपा के प्रति मोहभंग माना जाए.
इन्हीं सवालों के जवाब तलाशता एक विश्लेषण
देश की राजनीति केवल एक साल से कम समय में ही इस तरह से करवट बदलने लगेगी, कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था.

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दिल्ली के फ़ैसले ने समूचे देश का मूड बदल दिया है और केंद्र में सत्तारुढ़ नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार के लिए चिंताओं के पहाड़ खड़े कर दिए हैं.
सवाल किए जा रहे हैं कि अरविंद केजरीवाल को जो प्रचंड बहुमत प्राप्त हुआ है उसमें कितना हिस्सा आम आदमी पार्टी के हक़ का है, और कितना भारतीय जनता पार्टी के ख़िलाफ नाराज़गी का है?
क्या देश की जनता का आठ-नौ महीनों में ही मोदी सरकार से मोहभंग हो गया?
'मोदी सरकार से मोहभंग'

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अगर लोकसभा चुनावों और कांग्रेस-शासित राज्यों में भाजपा को मिला समर्थन मनमोहन सिंह के प्रति जनता की नाराज़गी का प्रतीक था तो क्या दिल्ली के फ़ैसले को भी मोदी सरकार के ख़िलाफ़ मतदाताओं का विद्रोह समझना चाहिए?
कांग्रेस और भाजपा दोनों का ही सफ़ाया हो गया और दोनों ही ऊपरी तौर पर अपना दुख अलग-अलग तरीक़ों से व्यक्त कर रही हैं.
कांग्रेस इस बात से ज़्यादा ख़ुश है कि भाजपा दिल्ली में सरकार नहीं बना पाई वरना मोदी सरकार पूरी तरह से अनियंत्रित हो जाती.
'कांग्रेस-मुक्त भारत' का संकल्प 'विपक्ष-मुक्त' भारत में बदल जाता. अब ऐसा नहीं हो पाएगा.
मतदाताओं की समझ

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आम आदमी पार्टी की जीत ने मरते हुए विपक्ष को वेंटीलेटर से उठाकर सांस लेने के लिए ख़ुद के पैरों पर खड़ा कर दिया.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देश की राजधानी के सात रेस कोर्स पर निवास करते रहे जो कि असली दिल्ली नहीं थी.
वे दिल्ली और उसके मतदाताओं को समझ नहीं पाए. उन्होंने भी वही ग़लती की जो वर्ष 1989 में राजीव गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस ने की थी.
वर्ष 1984 में प्राप्त हुए प्रचंड बहुमत के अहंकार के दम पर कांग्रेस ने तब विश्वनाथ प्रताप सिंह पर वैसे ही आक्रमण किए थे जैसे कि भाजपा ने अपने चुनाव प्रचार के दौरान दिल्ली में केजरीवाल पर किए. नतीजा सामने है.
अहंकार की शिकार

प्रधानमंत्री ने अपने उस आक्रामक प्रचार में दिल्ली की ज़रूरत के मुताबिक़ कोई परिवर्तन नहीं किया जो लोकसभा और विधानसभा चुनावों के दौरान सोनिया और राहुल के ख़िलाफ़ अपनाई गई थी.
कहा जा सकता है कि भाजपा अपने अनियंत्रित अहंकार और अतिरंजित आत्मविश्वास की शिकार बन गई.
अपनी अप्रत्याशित जीत के बाद अरविंद केजरीवाल ने आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ताओं को अगर अहंकार से परहेज़ करने की सलाह दी है तो उसे मतदाताओं की भाजपा के प्रति व्यक्त हुई नाराज़गी के अर्थ में ही समझना चाहिए.
राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के विचारक एमजी वैद्य ने कहा है कि दिल्ली के नतीजे भाजपा के प्रति विरोध की जीत है.
उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि पार्टी जनता के मूड को भांपने में असमर्थ रही.
शासक जब-जब भी अपनी प्रजा का मूड समझने में विफल रहते हैं जनता उन्हें उचित और समुचित सज़ा देती है. दिल्ली में वैसा ही हुआ है.
गणित बदल गए

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वर्ष 2014 में मिले व्यापक जन-समर्थन को भाजपा ने अपनी विचारधारा के पक्ष में जनादेश मान लिया और उसके बाद जिस तरह सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की शुरुआत की गई, उसने सारे गणित बदल दिए.
नरेंद्र मोदी ने इस दौरान मौन क़ायम रखा. उन्होंने अपनी पार्टी और उसके क़रीबी संगठनों के उन तत्वों के ख़िलाफ़ सार्वजनिक रूप से कुछ नहीं कहा जो सांप्रदायिक ध्रुवीकरण में जुटे थे और प्रधानमंत्री के विकास के एजेंडे में बारूद भर रहे थे.
दिल्ली में आम आदमी पार्टी की जीत को देश के लिए इन मायनों में एक बड़ी उपलब्धि माना जा सकता है कि भारतीय जनता पार्टी अब अपने अंदर भी झांकेगी, आत्म-विश्लेषण करेगी, अंदरुनी प्रजातंत्र को बढ़ावा और असहमति को सम्मान देगी.
जिन नेताओं और कार्यकर्ताओं को लगातार हाशिए पर डाला जा रहा था उन्हें वापस पार्टी और संगठन की मुख्यधारा में लाएगी. दिल्ली चुनावों के दौरान भाजपा ने यह सब नहीं किया.
गुड गवर्नेनस दे सकेंगे केजरीवाल?

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अगर ऐसा होता है तो नरेंद्र मोदी दिल्ली चुनाव परिणामों को हथियार बना कर देश को वास्तव में 'गुड-गवर्नेन्स' दे सकेंगे. दूसरी ओर विपक्षी पार्टियां भी दिल्ली से प्रेरणा लेकर अपनी-अपनी ज़मीन को नए सिरे से मज़बूत करने में जुट जाएंगी.
बिहार में उसकी शुरुआत हो चुकी है. जिन भी राज्यों में अब चुनाव होने वाले हैं वहां विपक्षी दलों के हालात निश्चित ही पहले जैसे नहीं रहने वाले हैं.
यह देश की राजनीति के लिए एक शुभ संकेत होगा.
इस तरह के सवाल अभी से पूछना ठीक नहीं रहेगा कि केजरीवाल मतदाताओं से किए गए सारे वायदों को पूरा कर पाएंगे या नहीं.
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